दुनिया का सबसे विकसित ब्लॉक 'यूरोपियन यूनियन' इसी लीग में है. उसने वैक्सीन की रिसर्च और प्रॉडक्शन के लिए भारी फंडिंग दी. मगर वैक्सीन का ऑर्डर देने में थोड़ा पीछे रह गया. इसके चलते अब जहां ब्रिटेन, अमेरिका और इज़रायल जैसे देशों में वैक्सिनेशन प्रोग्राम स्पीड से चल रहा है, वहीं EU के हाथ खाली हैं. इससे EU बहुत भड़का हुआ है. भड़कने की एक वजह ये भी है कि वैक्सीन निर्माता EU में ही लगे प्लांट्स में तैयार वैक्सीन EU को न देकर विदेशी मार्केट में बेच रहे हैं. इसे रोकने के लिए EU एक ऐसा कदम उठाने जा रहा है, जिससे टेंशन बढ़ेगी. ख़ासतौर पर ब्रिटेन के साथ. क्या है ये मामला, विस्तार से बताते हैं.
शुरुआत बेसिक्स से करते हैं
दुनिया में इस वक़्त तीन लीडिंग कोरोना वैक्सीन हैं. पहली, फ़ाइज़र ऐंड बायोटेक. दूसरी, मोडेर्ना. तीसरी, ऑक्सफ़र्ड एस्ट्राज़ेनका. इनमें से सबसे सस्ती है, ऑक्सफ़र्ड एस्ट्राज़ेनका. बाकी दोनों वैक्सीन के मुकाबले इसे स्टोर करना भी आसान है. फ्रिज़ में रख दीजिए, तो कम-से-कम छह महीने तक ख़राब नहीं होगी. मगर कम कीमत और स्टोरेज़ की सहूलियत के इतर बाकी दोनों वैक्सीन्स के मुकाबले इसका इफ़ेक्ट कमज़ोर है. मसलन, फ़ाइजर बायोटेक की एफ़िकेसी 95 पर्सेंट है. मोडेर्ना की साढ़े 94 पर्सेंट. और, एस्ट्राज़ेनका की एफ़िकेसी है 62 से 90 पर्सेंट के बीच. इसका असर आपको मिले वैक्सीन की शुरुआती डोज़ की स्ट्रेन्थ और दोनों डोज़ेस के बीच के गैप पर निर्भर करता है.

मॉडर्ना, फ़ाइज़र और एस्ट्राज़ेनेका, कोरोना वैक्सीन की तीन अव्वल कंपनियां हैं.
ये तीनों वैक्सीन डिवेलप करने में अकेले मेडिकल कंपनियों ने मेहनत नहीं की थी. वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया बड़ी लंबी होती है. इसमें सालों लग जाते हैं. मगर कोरोना के मामले में दुनिया इतना लंबा इंतज़ार अफॉर्ड नहीं कर सकती थी. ज़रूरी था कि वैक्सीन की रिसर्च प्रक्रिया, इसके ट्रायल्स और निर्माण को रेकॉर्ड तेज़ी से पूरा किया जाए. इसके लिए भारी-भरकम फंड चाहिए था. ये फंड दिया सरकारों ने. सबने नहीं, कुछेक सरकारों ने. मसलन, यूरोपियन यूनियन, अमेरिका, ब्रिटेन. मोटा-माटी समझिए, तो दुनिया के सबसे रईस देशों ने. इसलिए कि वो ये फंड देना अफ़ॉर्ड कर सकते थे. कोरोना से हो रहा नुकसान उनके लिए अरबों डॉलर्स ख़र्च करने से ज़्यादा भारी था.
बड़े लंबे इंतज़ार के बाद नवंबर, 2020 में अच्छी ख़बरें आनी शुरू हुईं. फ़ाइज़र और बायोऐनटेक समेत कुछ मेडिकल कंपनियों के शुरुआती ट्रायल्स में वैक्सीन प्रभावी पाई गई थी. क़ायदे से तो वैक्सीन ख़रीद की प्रक्रिया ट्रायल डेटा आने के बाद शुरू होनी चाहिए थी. मगर सबसे पहले वैक्सीन ख़रीदने की कोशिश में लगे कई अमीर देशों ने मई 2020 में ही ऑर्डर देना शुरू कर दिया था.
ऐसा क्यों?
क्योंकि उनके पास पैसा था. कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन, जापान, समझिए तो इन अमीर देशों ने मिलकर वैक्सीन ख़रीद को हाइज़ैक कर लिया. ऐसा नहीं कि इन्होंने एक ही वैक्सीन का ऑर्डर दिया हो. ज़्यादा-से-ज़्यादा वैक्सीन डोज़ हासिल करने के लिए इन्होंने कई अलग-अलग वैक्सीन के ऑर्डर दिए. जो बड़ी कंपनियां अभी वैक्सीन विकसित करने की प्रक्रिया में ही थीं, उनसे भी करार कर लिया.
मसलन, अमेरिका. उसने 2020 ख़त्म होने तक आधा दर्जन दवा निर्माताओं को 100 करोड़ वैक्सीन डोज़ का ऑर्डर दे दिया था. जबकि उसकी जनसंख्या करीब 33 करोड़ ही है. कनाडा ने अपने हर नागरिक के लिए वैक्सीन की दस डोज़ेस ऑर्डर कीं. ऑस्ट्रेलिया ने प्रति नागरिक पांच डोज़ के हिसाब से ऑर्डर दिया.

अमीर देशों ने अपनी ज़रूरत से कई गुणा ज़्यादा वैक्सीन्स ऑर्डर कर दीं. वो भी मई-जून के महीने में. इसका असर बाकी ग़रीब देशों पर पड़ा.
सोचिए, ज़्यादातर वैक्सीन ऐसी हैं, जिनमें एक आदमी को दो ही डोज़ चाहिए. मतलब इन अमीर देशों ने पैसों के सहारे न केवल पहले वैक्सीन पाने का बंदोबस्त किया. बल्कि ज़रूरत से कहीं ज़्यादा ख़रीदकर वैक्सीन की होर्डिंग भी कर ली. पता है, 2021 के आख़िर तक फ़ाइज़र जितने डोज़ बनाएगा, उसका आधे से ज़्यादा हिस्सा चार-पांच अमीर देश नवंबर 2020 तक ही ख़रीद चुके थे. सभी लीडिंग वैक्सीन निर्माताओं को मिलाएं, तो उन्होंने 2021 में 1,250 करोड़ डोज़ उपलब्ध करवाने का वायदा किया था. इनमें से आधे से ज़्यादा डोज़ अमीर देश ऑलरेडी ख़रीद चुके हैं.
पैसों के सहारे अपनी आबादी के लिए जल्द-से-जल्द वैक्सीन हासिल करने की ये दौड़ कहलाती है- वैक्सीन नैशनलिज़म. इस क्रूर राष्ट्रवाद के चलते दुनिया में कोविड-19 वैक्सीन के वितरण का बैलेंस गड़बड़ा गया है. गरीब देश पीछे छूट गए हैं. उन्हें वैक्सीन मिलने में सालों लगने वाले हैं.
मगर क्या पैसे के सहारे जल्द इम्यूनाइज़ होने की कोशिशें कामयाब हो जाती हैं?
जवाब है, नहीं. इसकी सबसे बड़ी मिसाल है- यूरोपियन यूनियन. उसने फ़ाइज़र और एस्ट्राज़ेनका को वैक्सीन विकसित करने के लिए मोटी फंडिंग दी. सबसे ज़्यादा फंडिंग दी एस्ट्राज़ेनका को. EU ने उसे 3,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का फंड दिया था. उसे उम्मीद थी कि इतना सब कुछ करने के बाद उसको सबसे पहले वैक्सीन भी मिल जाएगी.
मगर फिर EU से एक चूक हो गई. वो वैक्सीन ऑर्डर देने की गलाकाट रेस में थोड़ा पीछे रह गया. ब्रिटेन ने जहां मई 2020 में ही वैक्सीन का ऑर्डर दे दिया था, वहीं EU मेडिकल कंपनियों से महीनों तक बातचीत में लगा रहा. उसने एस्ट्राज़ेनका को ऑर्डर दिया अगस्त 2020 में. और मॉडेर्ना और फ़ाइज़र से ख़रीद का करार किया नवंबर 2020 में. इस देरी की वजह ये है कि EU कोई एक देश नहीं है. वो 27 देशों का एक साझा ब्लॉक है. इनमें से हर देश की आर्थिक हैसियत बराबर नहीं है. ऐसे में EU की कोशिश थी, सस्ती दरों पर वैक्सीन ख़रीदना. इसीलिए नेगोशिएन्स लंबे खिंच गए.

यूरोपियन यूनियन को अपने सभी सदस्यों का ख्याल रखना होता है.
देरी केवल ऑर्डर देने में नहीं हुई. वैक्सीन के इस्तेमाल को मंज़ूरी देने में भी लेट हुआ. EU ने सुरक्षा और प्रभाव संबंधी लंबे-चौड़े आकलन के बाद दो वैक्सीन्स को हरी झंडी दी. 21 दिसंबर, 2020 को उसने फ़ाइज़र को अप्रूवल दिया. मोर्डेना को मंज़ूरी मिली 6 जनवरी, 2021 को. और, एस्ट्राज़ेनका को अप्रूवल मिलना अभी भी बाकी है.
इस देरी का असर अब EU को भारी पड़ रहा है. मेडिकल कंपनियों की तरफ से उसे एक-के-बाद-एक बुरी ख़बरें मिल रही हैं. पहली बुरी ख़बर आई फ़ाइजर से. उसने कहा कि EU के कोटे वाले वैक्सीन उत्पादन में फिलहाल कमी आई है. ऐसे में अगले कुछ हफ़्तों तक EU की सप्लाई भी कम रहेगी.
EU ने सोचा, चलो इधर से होने वाली देरी की भरपाई एस्ट्राज़ेनका से कर लेंगे. EU ने उसे 40 करोड़ वैक्सीन डोज़ का ऑर्डर दिया था. इसमें से 8 करोड़ डोज़ उसे मार्च 2021 के आख़िर तक मिलनी थी. मगर यहां भी EU को बुरी ख़बर मिली. कंपनी ने कहा कि उसके बेल्ज़ियम प्लांट में कुछ गड़बड़ आई है. इसके कारण उत्पादन गिरा है. ऐसे में उसके वैक्सीन सप्लाई में 60 पर्सेंट तक गिरावट आएगी.
एस्ट्राज़ेनका की अनुभवहीनता भारी पड़ गई
एस्ट्राज़ेनका की तरफ से हुई इस गड़बड़ की एक बड़ी वजह अनुभवहीनता है. उसके पास वैक्सीन निर्माण का बहुत कम अनुभव है. इसके अलावा फ़ाइज़र और मोडेर्ना के मुकाबले उसकी वैक्सीन निर्माण प्रक्रिया जटिल भी है. वो दोनों कंपनियां आधुनिक जेनेटिक टेक्नॉलज़ी का इस्तेमाल करती हैं. वहीं एस्ट्राज़ेनका चिंपैंज़ी से निकाले गए कोल्ड वायरस इस्तेमाल करता है. इन्हें इंसानी किडनी कोशिकाओं में विकसित किया जाता है. ये कोशिकाएं बायोरिएक्टर्स कहलाने वाले बड़े टैंक्स में ग्रो की जाती हैं.

एस्ट्राज़ेनका की अनुभवहीनता बहुत सारी उम्मीदों पर भारी पड़ गई.
अगर तापमान और ऑक्सिजन स्तर में जरा भी फ़र्क आया, तो विकसित की जा रही कोशिकाओं की संख्या प्रभावित हो सकती है. ऐसा हुआ, तो वैक्सीन भी कम बनेंगी. यही हुआ एस्ट्राज़ेनका के बेल्ज़ियम स्थित प्लांट में. वहां दिसंबर से उत्पादन घटना शुरू हुआ. एस्ट्राज़ेनका ने शुरुआत में ये बात छुपाई. जनवरी आते-आते प्रॉडक्शन काफी लुढ़क गया. तब जाकर 22 जनवरी को एस्ट्राज़ेनका ने EU के आगे हाथ खड़े कर दिए.
इस घटनाक्रम से EU भड़क गया. उसने कहा, ऐसे कैसे नहीं दोगे. तुमको देना ही होगा. इसपर एस्ट्राज़ेनका ने कहा कि वैक्सीन बनाना घर बनाने जैसा नहीं है. कि दीवार छोटी हो गई, तो और ईंटें जोड़ दो. ये एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया है. एक प्रॉडक्शन साइकल में कितने डोज़ बनेंगे, इसकी गारंटी नहीं ली जा सकती. मगर EU इन तर्कों से संतुष्ट नहीं है.
उसे ये भी लग रहा है कि एस्ट्राज़ेनका ने शायद बेल्ज़ियम प्लांट में बने वैक्सीन्स की जमाख़ोरी की. उन्हें बाकी देशों को बेचा. एस्ट्राज़ेनका इन आरोपों से इनकार करता है. उसका दावा है कि उसने EU के कोटे वाले वैक्सीन किसी और को नहीं दिए. वो तो बस जर्मनी स्थित प्लांट में ब्रिटेन के कोटे वाले वैक्सीन की पैकिंग करता है.
इसपर EU ने एस्ट्राज़ेनका को वैक्सीन डिवेलप करने में दिए गए फंड की याद दिलाई. कहा कि उसे EU से मिली फंडिंग और सपोर्ट का सम्मान करते हुए ऑर्डर्स पूरे करने चाहिए.
EU के भड़कने की वजह क्या है?
वजह है, उसपर बना प्रेशर. वहां के लोग वैक्सीन ख़रीद और अप्रूवल में EU द्वारा की गई देरी से नाराज़ हैं. लोगों को ये बात खल रही है कि ब्रिटेन, अमेरिका, इज़रायल और UAE जैसे देश वैक्सिनेशन में उनसे कहीं आगे हैं. अभी तक EU की प्रति 100 लोगों की आबादी में केवल दो को वैक्सीन की पहली डोज़ मिली है. वहीं अमेरिका और ब्रिटेन में ये औसत सात और 11 का है. वैक्सिनेशन में पीछे रहने के लिए लोग लीडरशिप को जिम्मेदार मान रहे हैं. ऐसे में EU लीडरशिप अपना गला बचाने के लिए दवा कंपनियों पर ब्लेम शिफ़्ट कर रही है.

EU कोरोना वैक्सीन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है.
EU की सबसे बड़ी खुन्नस है ब्रिटेन से. फ़ाइज़र ने EU की सप्लाई घटा दी. मगर वो ब्रिटेन के साथ हुआ करार निभा रहा है. उसका ब्रिटेन के साथ 10 करोड़ वैक्सीन डोज़ का कॉन्ट्रैक्ट है. इसके तहत हर हफ़्ते 20 लाख डोज़ ब्रिटेन को भेजे जा रहे हैं. EU का कहना है कि सबको वैक्सीन मिल रही है, बस उसी का कोटा क्यों गायब हो गया.
अपने यहां वैक्सीन की कमी पूरी करने के लिए EU ने अब बाकी देशों से भिड़ने का मन बना लिया है. वहां EU के भीतर उत्पादित वैक्सीन्स के एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध की बात चल रही है. PPE किट के मामले में EU पहले भी ऐसा कर चुका है. अगर उसने कोरोना वैक्सीन में भी ये किया, तो इसका सीधा असर ब्रिटेन पर पड़ेगा.
इन सबका असर ब्रिटेन पर कैसे पड़ेगा?
ब्रिटेन ने अब तक अपने लिए वैक्सीन की करीब 36 करोड़ डोज़ का ऑर्डर दिया है. ये ऑर्डर सात अलग-अलग कंपनियों को दिए गए हैं. इनमें से केवल तीन- मॉडेर्ना, फ़ाइज़र और एस्ट्राज़ेनका को ही अभी इस्तेमाल की मंज़ूरी मिली है. इन तीन में से भी केवल दो- फ़ाइज़र और एस्ट्राज़ेनका ने ही वैक्सीन सप्लाई शुरू की है.
अगर EU ने अपने यहां वैक्सीन एक्सपोर्ट पर बैन लगाया, तो फ़ाइज़र के बेल्ज़ियम स्थित प्लांट में बन रही वैक्सिन्स ब्रिटेन को नहीं मिल सकेंगी. उसके वैक्सिनेशन्स प्रोग्राम को बड़ा झटका लगेगा. इसीलिए 26 जनवरी को ब्रिटेन ने EU को चेतावनी भी दी. कहा कि वैक्सीन नैशनलिज़म उसे महंगा पड़ेगा. उसने EU को भाईचारे की याद दिलाई.

यूके ने अपने नागरिकों के लिए कई गुणा ज़्यादा वैक्सीन ऑर्डर कर रखी हैं और उसकी निर्बाध सप्लाई जारी है.
मगर फिर एक बड़ी दिलचस्प स्थिति बनी. पता चला कि EU एस्ट्राज़ेनका पर दबाव बना रहा है. कह रहा है कि तुम्हारे ब्रिटेन प्लांट पर तो बढ़िया प्रॉडक्शन हो रहा है. तो वहां बन रही वैक्सीन से हमारा कोटा पूरा करो. EU की इस डिमांड के बाद ब्रिटेन चुप हो गया है. उसने दोबारा भाईचारे और सीमा पार से सहयोग की कोई अपील नहीं की है.
एक आशंका ये भी है कि EU कमिटमेंट तोड़ने वाली मेडिकल कंपनियों पर कार्रवाई करे. उसने इसके संकेत भी दिए हैं. EU के प्रेशर के बीच 29 जनवरी को एस्ट्राज़ेनका ने एक बड़ा चौंकाने वाला काम किया. उसने EU के साथ अपने क़रार की कॉपी रिलीज़ की. मेडिकल कंपनियां और सरकारें अपने क़रार और बहुत गुप्त रखती हैं. ऐसे में आप समझ सकते हैं एस्ट्राज़ेनका ने कितने दबाव में इसे पब्लिक किया होगा.
क्या है इस कॉन्ट्रैक्ट में?
इसमें लिखा है कि एस्ट्राज़ेनका सप्लाई के लिए 'बेस्ट एफ़र्ट' करेगा. कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक-
एस्ट्राज़ेनका उत्पादन प्रक्रिया के सुनियोजित संचालन के लिए बेस्ट एफ़र्ट करेगा. ताकि वैक्सीन की अनुमानित सप्लाई और डिलिवरी शेड्यूल से जुड़ा जो क़रार हुआ है, उसका पालन हो सके.मुमकिन है कि EU इस क़ानूनी लड़ाई में जीत जाए. मगर क्या वो एस्ट्राज़ेनका को उसके ब्रिटेन स्थित प्लांट से वैक्सीन सप्लाई के लिए मज़बूर कर सकेगा? ऐसा होना बड़ा मुश्किल है. इसलिए कि ब्रिटेन का भी एस्ट्राज़ेनका के साथ क़रार है. वो अपने यहां बन रही वैक्सीन EU को देने पर राज़ी नहीं होगा. ऐसे में EU को वैक्सीन तो नहीं मिलेगी, उल्टा ब्रिटेन से उसकी टेंशन बढ़ेगी.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अगर ये साबित हो जाए कि वो EU के हिस्से की सप्लाई ब्रिटेन में डायवर्ट कर रहा है, तो इसका मतलब होगा कि वो 'बेस्ट एफ़र्ट' का वादा तोड़ रहा है. ऐसे में उसपर क़ानूनी कार्रवाई हो सकती है. वो सप्लाई पूरी करने के लिए क़ानूनी तौर पर बाध्य हो सकता है.
क्या है इस घटनाक्रम का निचोड़?
EU असल में आदर्श स्थिति की मांग कर रहा है. उसने वैक्सीन कंपनियों द्वारा दिए गए 'पहले आओ, पहले पाओ' के तर्क की आलोचना की है. कहा है कि ये नियम कसाई की दुकान में चलता होगा, दवा ख़रीद में नहीं. बेशक़ वैक्सीन निर्माताओं का ये 'फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व' वाला तर्क बेहूदा है. क्योंकि पहले ऑर्डर देने वाले देश वही थे, जो ऑर्डर देना अफॉर्ड कर सकते थे. वैक्सीन के ट्रायल बिना, कोई डेटा आए बिना, उसमें पैसा लगाने का जुआ खेल सकते थे.

ग़रीब देशों में से सिर्फ गिनी को कुल 55 खुराकें मिली हैं.
मध्यम आय वर्ग और गरीब देशों के पास इतनी सहूलियत नहीं थी. इसीलिए वो वैक्सीन पाने में सबसे पीछे हैं. WHO और बाकी देशों की दया पर निर्भर हैं. पता है, दुनिया के सबसे गरीब 29 देशों में से केवल एक देश 'गिनी' में वैक्सिनेशन शुरू हो पाया है. वो भी पता है कितना? करीब सवा करोड़ की आबादी में से केवल 55 लोगों को वैक्सीन लग पाई है.
क्या ये आदर्श स्थिति है? नहीं. दवाई ज़रूरत के हिसाब से मिलनी चाहिए. जिसे ज़्यादा ज़रूरत हो, उसतक पहले पहुंचनी चाहिए. मगर दुनिया आदर्शों से नहीं चल रही. दुनिया चल रही है पावर और पैसे की होड़ से. EU ख़ुद इसी होड़ का हिस्सा है. और उसके साथ जो हो रहा है, वो भी इसी होड़ का साइड इफ़ेक्ट है.






















