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चीन की आबादी 61 सालों में पहली बार घटी, क्या नुकसान होने वाला है?

चीन की जनसंख्या में आई कमी की असली कहानी क्या है?

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चीन की जनसंख्या में आई कमी की असली कहानी क्या है? (AFP)

कभी वन-चाइल्ड पॉलिसी के नाम पर ज़्यादती करने वाला चीन अपने ही जाल में उलझ गया है. एक समय चीन की सरकार एक से ज़्यादा बच्चा पैदा करने वालों पर ज़ुर्माना लगाती थी, नौकरी से निकाल देती थी, एक्स्ट्रा बच्चे को उठाकर ले जाती थी, और भी बहुत सारे तिकड़म अपनाए जाते थे. वही सरकार अब हाथ जोड़कर कह रही है, ज़्यादा बच्चे पैदा करो. सपोर्ट हम करेंगे. थोड़ा बहुत खर्च भी उठा लेंगे. इसके बावजूद लोग बच्चा पैदा करने के लिए तैयार नहीं हैं. 61 सालों में पहली बार चीन की आबादी घट गई है. 2021 में चीन की जितनी आबादी थी, 2022 में उसमें साढ़े आठ लाख की कमी आई है. जन्म-दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. इसका असर ये हुआ है कि बुजुर्ग आबादी बढ़ती जा रही है. नए मानव संसाधनों की संख्या में कमी आई है. इससे सोशल सिक्योरिटी और हेल्थकेयर जैसी सुविधाओं पर भार बढ़ेगा. सरकार को उसमें ज़्यादा निवेश करना होगा. इसके बरक्स वाले समय में इंडस्ट्रीज़ में काम करने वाले घट जाएंगे. इसका असर आउटपुट पर और फिर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. चीन में ये चिंता लंबे समय से जताई जा रही है. इसी वजह से 2016 में सरकार ने वन-चाइल्ड पॉलिसी को खत्म कर दिया था. हालांकि, इसका बहुत फायदा देखने को नहीं मिल रहा है.

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तो, आइए जानते हैं,

- चीन की जनसंख्या में आई कमी की असली कहानी क्या है?
- इस कमी से चीन की सरकार परेशान क्यों है?
- और, आबादी घटने के नुकसान क्या हैं?

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शुरुआत इतिहास से.

01 अक्टूबर 1949 को माओ ज़ेदोंग की कम्युनिस्ट क्रांति सफ़ल हो गई. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (CCP) ने च्यांग काई-शेक की कुओमितांग (KMT) को फ़ारमोसा द्वीप पर खदेड़ दिया. माओ CCP का सर्वेसर्वा था. इसलिए, चीन की कमान उसके हाथों में आई. माओ का मानना था कि जितने ज़्यादा लोग होंगे, चीन उतना ही ज़्यादा ताक़तवर होगा. उसके दिमाग में कुछ और प्लान भी चल रहे थे. जैसे, चीन से सटे इलाकों पर कब्ज़ा करना. इसके लिए बड़ी संख्या में सैनिकों की ज़रूरत थी.
खेतों और फ़ैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ाना. इसके लिए सस्ते कामगारों की कमी नहीं पड़नी चाहिए.

1949 से पहले कई दशकों तक चीन में अशांति थी. अकाल, सिविल वॉर, विश्व युद्ध और महामारी के चलते लोग कीड़े-मकोड़ों की तरह मर रहे थे. स्थायी सरकार आने के बाद लोगों को इनसे निजात मिली. चीन में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हुईं. लोगों को बढ़िया इलाज मिला. इससे लोगों का जीवन लंबा हुआ.

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माओ को ये भरोसा था कि चीन की जनसंख्या चाहे कितनी भी बढ़ जाए, उसके लिए संसाधनों की कमी नहीं पड़ेगी. उसने कहा था, ‘दुनिया में इंसान से ज़्यादा क़ीमती चीज़ कुछ भी नहीं.’

माओ का ये कथन मानवीय हित से नहीं जुड़ा था. वो ये मानता था कि जितने ज़्यादा लोग होंगे, प्रोडक्शन उतना ज़्यादा होगा. जनसंख्या बढ़ने से फायदा ही फायदा होगा. इसलिए, उसने जनसंख्या नियंत्रण पर रोक लगा दी. गर्भनिरोधक दवाओं का आयात बंद कर दिया. कई जगहों पर सरकार ने अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रचार भी किया. इसके नतीजे में चीन की जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी. लेकिन जब ये सरकार पर भारी पड़ने लगा, तब माओ ने बर्थ कंट्रोल की वकालत शुरू की. शहरी इलाकों में दो और गांवों में तीन बच्चे पैदा करने की बात कही गई. हालांकि, इसको लेकर गंभीरता नहीं बरती गई.

फिर आया साल 1958. इस साल द ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की नीति लागू की गई. दरअसल, माओ के मन में लंबे समय से एक प्लान चल रहा था. वो चीन को कृषि-प्रधान से उद्योग-प्रधान देश बनाना चाहता था. वो भी एक झटके में. इसके लिए उसने कई तुग़लकी फ़रमान जारी किए. मसलन, किसानों की ज़मीनों को नेशनलाइज़ कर दिया गया. किसानों को फसल उपजाने का क़ोटा मिला. उसी के आधार पर सरकार उन्हें खाना देती थी. किसान अपने ही खेतों में मज़दूर बनकर रह गए. सरकार को बस नतीजे से मतलब था. स्थानीय अधिकारी क़ोटा पूरा करने के लिए बीज तक उठाकर ले जाते थे. रही-सही कसर ख़राब मौसम ने पूरी कर दी. पूरे देश में भयानक अकाल पड़ा. 1958 से 1961 के बीच चीन में अकाल के कारण चार से पांच करोड़ लोग मारे गए.

चीन में खेती करती महिला (AFP)

खेतों के साथ-साथ शहरी फ़ैक्ट्रियों में उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया जा रहा था. जब मज़दूरों की कमी पड़ी, तब किसानों को खेतों से उठाकर फ़ैक्ट्रियों में भर्ती किया गया. उन्हें इस काम के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था. इससे स्टील की क़्वालिटी ख़राब हुई. औद्योगीकरण का प्लान फ़ेल हो गया. इस नाकामी को लेकर माओ की आलोचना होने लगी. कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर भी विरोध के स्वर उठे. कहा गया कि संख्या से अधिक ज़रूरी चीज है, विशेषज्ञता.

उधर, जनसंख्या अपनी रफ़्तार से बढ़ रही थी. लेकिन ग्रेट लीप फ़ॉवर्ड की नाकामी ने संसाधनों की भारी किल्लत पैदा कर दी थी. सरकार को लगा कि अब नहीं हो पाएगा. 1970 में चीन में फ़ैमिली प्लानिंग की बात शुरू हुई. लोगों को दो बच्चों की लिमिट रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया. .

1976 में माओ की मौत हो गई. उसके बाद के शासकों ने माओ की नीतियों को खारिज करना शुरू कर दिया था. चीन की खराब आर्थिक स्थिति के लिए माओ को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा था. चीन की पॉलिटिक्स में बहुत बड़ा टर्न आ रहा था.

माओ के कार्यकाल में चीन की पॉपुलेशन 54 करोड़ से बढ़कर 94 करोड़ तक पहुंच गई थी. ऐसे में जनसंख्या नीति में बदलाव तय था. वही हुआ भी. 1978 में सरकार ने एक प्रस्ताव पास किया. इसके तहत शादीशुदा जोड़ों को अधिकतम एक बच्चा पैदा करने के लिए कहा गया. ये वॉलंटियरी था. यानी, ये लोगों की इच्छा पर निर्भर था. बढ़ावा देने के लिए कई प्रांतों ने अपने यहां अलग-अलग तरह के प्रयोग भी किए. सिचुआन प्रांत में ऐसे कपल्स को अधिक राशन दिया जाता था, जिन्होंने एक से अधिक बच्चा पैदा न करने की शपथ ली हो. 1979 के साल में, जिनके पास एक बच्चा था, वैसे कपल्स को ‘सर्टिफ़िकेट ऑफ़ ऑनर’ दिया गया. ताकि वे और बच्चे पैदा न करें. सरकार का इरादा ये था कि जनसंख्या को कंट्रोल किया जाए ताकि संसाधनों की कमी न हो.

फिर 25 सितंबर 1980 को वन-चाइल्ड पॉलिसी को अनिवार्य बना दिया गया. उसके बाद ये सरकार की नीति का हिस्सा बन गया. कहा गया कि बर्थ कंट्रोल हर चीनी नागरिक का कर्तव्य है. इसके बाद सरकारी मशीनरी आक्रामक होकर अपने मिशन में जुट गई. इसका खामियाजा ये हुआ कि सही मकसद से बनाई गई नीति चीनी जनता के लिए अभिशाप बन गई.

कैसे? समझते हैं.

> नंबर एक. चीन के समाज में लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है. वहां मान्यता है कि लड़की पराया धन है. शादी के बाद वो दूसरे घर चली जाएगी. इसलिए बुढ़ापे में देखभाल के लिए लड़के ही काम आएंगे. वन-चाइल्ड पॉलिसी से क्या हुआ? जिन कपल्स को पहली संतान लड़की होती थी, वे या तो उसे मार देते या कहीं दूर छोड़ आते थे. उनका इरादा ये होता था कि सरकार को इसकी जानकारी हाथ न लगे. ऐसे कपल्स तब तक लड़कियों को अपने से दूर करते रहे, जब तक कि उन्हें लड़का नहीं हो गया. उन बच्चियों का क्या हुआ, उनके माता-पिता को कभी मालूम नहीं चल सका. कई बच्चियों को देह व्यापार में धकेल दिया गया.
इसके अलावा, चीन के सेक्स रेशियो में भी भयानक असमानता आई. वर्तमान में चीन में महिलाओं की तुलना में 03 करोड़ 70 लाख अधिक पुरुष हैं. यानी, उन्हें जीवनभर कोई पार्टनर नहीं मिलेगा.

> नंबर दो. अगर किसी कपल के एक से अधिक बच्चे हुए और ये बात सरकारी अधिकारियों को पता चलती तो वे पूरे दल-बल के साथ धावा बोलते थे. इसके लिए ज़ुर्माने की व्यवस्था थी. लाखों में. जो समर्थ थे, वे तो ज़ुर्माना देकर बच्चों को बचा लेते थे. जो ग़रीब थे, उनके पास कोई चारा नहीं होता था. अधिकारी ऐसे बच्चों को अपने साथ ले जाते थे. एक से अधिक बच्चे पैदा करने पर नौकरी छीन ली जाती थी. कई मामलों में जेल भी भेज दिया जाता था. जबरन गर्भपता और नसबंदी की व्यवस्था तो आम थी. एक अनुमान के मुताबिक, चीन में वन चाइल्ड पॉलिसी लागू रहने के दौरान लगभग 30 करोड़ गर्भपात कराए गए.

> जुड़वां बच्चे पैदा करने पर सरकार ने कोई नियम नहीं लगाया था. इसलिए, लोग दवाओं या ऑपरेशन के जरिए एक साथ कई बच्चे पैदा कराने की कोशिश करते थे. इसका सीधा भार महिलाओं पर पड़ता था. महिलाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर किसी का ध्यान नहीं था. ये उनके लिए बेहद ख़तरनाक साबित हुआ. आंकड़ों में भी इस बिंदु को गोल कर दिया गया.

> वन-चाइल्ड पॉलिसी की आड़ में उइग़र मुस्लिमों की मान्यताओं को खत्म करने की कोशिश भी की गई. चीन सरकार पर आरोप लगते हैं कि उइग़रों के नरसंहार की साज़िश रचने का आरोप लगता रहा है.

क्या वन-चाइल्ड पॉलिसी से सिर्फ़ नुकसान ही हुआ? नहीं. कई मायनों में फायदा भी हुआ. चीन अपने यहां जनसंख्या विस्फ़ोट को काबू करने में कामयाब रहा. लोगों को अधिक संसाधन उपलब्ध हुए. सरकार को नीतियां बनाने में आसानी हुई. इसी वजह से चीन विकास की राह पर आगे बढ़ पाया. लेकिन इसके पीछे जो क़ीमत वहां के लोगों ने चुकाई, क्या वो जायज थी? क्या उसका कोई हल निकाला जा सकता था? विकास और मानवीय अधिकारों में से किसे चुना जाना चाहिए?

खैर, 2014 से चीन सरकार ने वन-चाइल्ड पॉलिसी में ढील देना शुरू कर दिया. जो भी कपल अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे, उन्हें दो बच्चा पैदा करने की छूट दी गई.
2015 में वन-चाइल्ड पॉलिसी को आधिकारिक तौर पर खत्म कर दिया गया. सभी शादीशुदा जोड़ों को दो बच्चे पैदा करने की छूट मिल गई.
2021 में चीन की जनगणना जारी हुई. इसमें पता चला कि पिछले 10 सालों में सिर्फ 01 करोड़ 20 लाख बच्चे पैदा हुए. ये 1961 से अब तक का सबसे निचला रिकॉर्ड था. इससे सरकार परेशान हुई. तब पोलितब्यूरो ने दो बच्चों की लिमिट को खत्म करने का ऐलान किया. कहा कि अब कपल तीन बच्चे पैदा कर सकते हैं.

चीन को ये कदम क्यों उठाना पड़ा था?

इसकी तीन वजहें थीं.

नंबर एक. आबादी का असंतुलन. चीन में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है. अनुमान है कि 2050 तक एक-तिहाई लोग लेबर फ़ोर्स से बाहर हो जाएंगे. यानी वे प्रोडक्शन नहीं कर पाएंगे. सरकारी इन्सेंटिव पर उनकी निर्भरता बढ़ जाएगी. चीन दुनिया का मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बन चुका है. अगर युवाओं की आबादी घटी तो लेबर फ़ोर्स कम हो जाएगा.

नंबर दो. चीन में अधिकतर लोगों के पास एक संतान है. वहां अब इस सिस्टम को मान्यता मिल चुकी है. जिनकी पहली संतान बेटा है, वो दूसरा बच्चा पैदा करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे. चीन में छोटी फ़ैमिली का कल्चर बढ़ गया है. इसलिए, वे दूसरा बच्चा पैदा करने से हिचकते हैं. 2016 में सरकार ने टू-चाइल्ड पॉलिसी लागू की थी. ताकि जनसंख्या-वृद्धि की दर को बढ़ाया जा सके. लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ.

नंबर तीन. चीन में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है. शहरी लोग खुले माहौल में जीना पसंद करते हैं. बंदिशों से परे. शहरों में बच्चों की परवरिश महंगी होती जा रही है. कोविड और रूस-यूक्रेन वॉर के दौर में शहरों में जीवनयापन महंगा और मुश्किल हुआ है.

चीन की सड़कों पर घूमता एक परिवार (AFP)

हाल के समय में चीन सरकार ने ज़्यादा बच्चे पैदा करने पर टैक्स में छूट और दूसरी सुविधाएं देने की शुरुआत की है. लेकिन ये सतत नहीं है. जानकार मानते हैं कि सिर्फ पॉलिसी के स्तर पर छूट देने से फायदा नहीं होगा. इसके लिए सरकार को चाइल्डकेयर के साथ-साथ कामकाजी महिलाओं को अलग से मदद देने पर विचार करना होगा.

आज हम ये सब क्यों बता रहे हैं?

जैसा कि हमने ऐपिसोड की शुरुआत में बताया, चीन में पिछले 61 सालों में पहली बार जनसंख्या में कमी आई है. नेशनल स्टेटिस्टिक्स ब्यूरो ऑफ़ चाइना की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 की तुलना में 2022 में चीन की आबादी साढ़े आठ लाख कम हो गई. इसका मतलब ये हुआ कि कम बच्चे पैदा हुए और ज़्यादा लोगों की मौत हुई. यूएन की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा. और, यही रफ़्तार कायम रही तो 2050 तक चीन की आबादी घटकर 131 करोड़ और 2100 तक 80 करोड़ रह जाएगी.

इसके अलावा, 2022 में 65 साल से ऊपर के लोगों की संख्या 21 करोड़ तक पहुंच गई. 16 से 59 की उम्र के लोगों की संख्या फिलहाल 86 करोड़ के करीब है. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ेगी, वे वर्कफ़ोर्स से बाहर होते जाएंगे. इसके बरक्स उनकी जगह भरने वाले कम होंगे. जन्म-दर में कमी का ये सीधा नुकसान होगा.

जब युवा कम और बुजुर्ग ज़्यादा होंगे, तब क्या होगा?

इसके तीन मुख्य नुकसान होंगे.

- पहला. वर्कफ़ोर्स में कमी आएगी. चीन 1990 के दशक में युवा आबादी वाला देश था. इसी की बदौलत उसने मैन्युफ़ैक्चरिंग इंडस्ट्री में लंबी छलांग लगाई. चीन के आर्थिक विकास में इसी युवा आबादी ने मदद की. बाहर की कंपनियां चीन में इसलिए आईं, क्योंकि वहां उन्हें सस्ता लेबर मिला. जब युवाओं की संख्या घटेगी, तब लेबर महंगा होगा. ऐसे में विदेशी कंपनियां दूसरे देशों में शिफ़्ट कर सकतीं है.

- दूसरी बात, सरकार का खर्च बढ़ेगा. एक तरफ कमाने वाली और टैक्स देने वाली आबादी कम होगी, वहीं दूसरी तरफ़, बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जाएगी. बुजुर्गों को हेल्थकेयर, पेंशन और दूसरी सुविधाओं की ज़रूरत पड़ेगी. इसका भार सरकार के खजाने पर पडे़गा.

- तीसरी बात, खर्च करने की क्षमता घटेगी. जानकारों का कहना है कि, युवा आबादी मार्केट में ज़्यादा खर्च करती है. खर्च के आधार पर मांग और सप्लाई का संतुलन बना रहता है. चीनी अधिकारी जनसंख्या में कमी की आशंका लंबे समय से जता रहे थे. मगर, समस्या उनके अनुमान से बहुत पहले सामने आकर खड़ी हो गई है. हालांकि, अभी चीन के पास आबादी के असंतुलन को पटरी पर लाने का समय है.

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