अभिषेक कुमार बीएचयू में पढ़ते हैं. ऐसा उनने दावा किया है. पढ़ते क्या हैं पॉलिटिकल साइंस. फिर पढ़ें, प्रोडिकल साइंस नहीं लिखा है. एक बार फिर से पढ़ लें इंटायर पॉलिटिकल साइंस भी नहीं लिखा है. अभिषेक ने हमें ये कैंपस किस्सा लिख भेजा है. उतना ही उजड्ड किस्सा जित्ता बनारस. पढ़ें फिर आगे की कहेंगे. जब सारा भौकाली अंदर का अंदरे रह गया टैग के जैसे नाम बदलते-बदलते भले स्टेशन के बोर्ड पर, कागज-पत्तर में, साइनबोर्ड पर 'वाराणसी' छपा हो, जनता के दिमाग दिल बोली में 'बनारस' अजर अमर अविनाशी है. हमारे लिए बनारस मतलब अद्भुत, देव नगरी, मोक्ष का धाम टाइप का शहर था. ‘काशी का अस्सी’ किताब जब हाथ में पहुंची तब पता चला कि ये शहर और भी बहुत कुछ है, तमाम मायाओं से ऊपर उठ चुका है.
नया-नया बीएचयू आना हुआ था. अभी तक थोड़ा बहुत इंटरनेट में आंख ढुकाने से पता चला था कि बनारस में गंगा जी हैं, उसके किनारे पर घाट हैं, जहां शाम को गंगा-आरती होती है और सबसे भयंकर बात कि रात को अघोरी नाचत हैं घाटों पर नरमुंड लेके. फोटू-वोटो सर्च कर के देखा तो फट गई. हमरी आंख, ई बरगद के डंडी जैसा बाल, भभूत में नहाया बॉडी, हाथ में नरमुंड. कसम से सामने दिख जाए तो कंठा रेगिस्तान हो जाए.
बनारस में बकैती को 'बकचोदी' कहते हैं. 'बतकुच्चन परमो धर्म:', रूबरू होना हो तो कुछ दिन गुजारिए बनारस में. हॉस्टल के कमरे में सनातनी परंपरा टनाटन रपेटा मार रही थी. पहिले सिलेबस, फिर क्लास, फिर गरल सखियों से घूम-फिर के भौकाली मारने पर आ गया. इस नगरी का अहम कर्म है भौकाली मारना. इहां पैंट टाइट करने से पहले भौकाली टाइट करना सिखाया जाता है.अघोरियन के ऊपर बात पहुंच चुकी थी. एकदम टीवी चैनल के जईसा डिबेट चल रहा था. 'हम तो गये थे बारह बजे के बाद अस्सी घाट पर, कुच्छो तो नहीं था उंहा पर' अंशुआ अपना बात रक्खा. 'बेट्टाउ सब तीन बजे में शुरू होता है, हरीशचन्दर घाट पर. हम अप्पन दुई नैनन से वाच किये हैं' मंत्री ने बताया तो सब मुंह खोलकर उसकी तरफ देखने लगे. मंत्री का असली नाम मृत्युंजय पांडे था. घर गोरखपुर और बनारस का पुराना आशिक. एक-एक गली में बौउख चुका था ससुर.. बनारस सबको नया नाम देता है. ई नगरी में कोई ओबामा पान खाके थूकते हुए मिल जाएं, कोई बड़ी बात नहीं. बिल गेट्स उधारी पर चाय पीते मिल सकते हैं तो विजय मालिया भूजा खाते.
'यूट्यूब पर वीडियो नहीं देखे हो, ई साला कैसे आग भभूका मारता है, अघोरी लोग तब नरमुंड नचा-नचा के काला जादू करता है' दूबे जी अपना ग्यान उड़ेल दिए थे. 'ऐ बबुआ जिगर चाहिए जिगर उ सब देखने के लिए, तुम सब लोग पोगो देखो' मंत्री सीना ठोक के बोला. अब लौंडा बनारस का पानी पीते ही हो जाता है फैन्टम. जिगर की बात हो और लौंडा चुप्प रह जाये, असम्भव है साधो! अंशुआ पोगो का नाम सुनके भड़क गया. बोला 'चलो बे, आज दिखाइए दो'. 'अबे मरना है का, पैंट में मूत दोगे देख के' दूबे गरिया के बोला. 'हम तैय्यार हैं, जो हो जाए.'तब तक दो बज चुका था. अंशु, हम, दूबे और मंत्री पैदल ही निकल गए. दूबे और मंत्री वीडियो देख के भौकाली मार गए थे. डर रहे थे कि अगर सच में दिख गया तो खुदै फट जायेगी और नहीं दिखा तो अंशुआ फाड़ देगा. ढाई बजे तक हम लोग अस्सी वाले रस्ते पर पहुंच गये थे. एकदम सुनसान, एक कुत्ता भी न दिख रहा था, घाट पर एकदम मरघट जैसा सन्नाटा, तभी बिजली गुल. सामने सीढ़ी पर जो दिखा, फिर बिना एक-दूसरे की तरफ देखे भागमभाग शुरू. सीढ़ी पर आग जल रही थी, थोड़ी-थोड़ी देर में उसमे भभूका उठ रहा था. हमरी देह के अंदर का सब कुछ सूख गया था. मुसीबत छप्पर फाड़ के आई थी. हम भागके रस्ते पर आये तो देखा तीन बमपिलाट सांड़ रस्ता रोके खड़े हैं. 'एक तरफ खाई, दूजे तरफ कुआं' साक्षात था. मंत्री भुनभुना रहा था, 'बाप हमको हनुमान चालीसा रटने को बोले थे तब हमको हनी सिंह का गाना पसन्द आ रहा था'. सांड़ ने रपेटा तो हम फिर घाट की तरफ भागे. दौड़ते-दौड़ते कुछ नहीं दिख रहा था. तब तक बिजली आ चुकी थी. घबराते-घबराते आंख खोली.गौर से देखा तो एक आदमी आग पर लिट्टी सेंक रहा था. इसी को हम लोग अघोरी समझ बैठे थे. हम हंसने को हुए कि दूबे धीरे से लजा के बोला, 'ऐ भाई चलो हॉस्टल वापिस, पैंट भीग गया है.'










