10वीं तक जुटाए मेरे पुण्यों का फल मुझे सरकारी को-एड स्कूल में एडमिशन मिलने से मिल गया था. 11वीं में मैंने कॉमर्स ली. आर्टस इसलिए नहीं ली, क्योंकि दिमाग में ये बेवकूफी भरी थी कि आर्टस तो लड़कियां लेती हैं और साइंस इसलिए नहीं ली, क्योंकि फिजिक्स, मैथ्स की इंग्लिश वाली किताबें देखकर फटने लगती थी. कॉमर्स के ठीक बराबर में साइंस स्ट्रीम वालों की क्लास थी. उसी क्लास में पढ़ती थी कोमल गुप्ता. ये बदला हुआ नाम नहीं है. क्यों बदले नाम. इत्ते प्यार से मन ही मन पुकारते थे उसे. कोमल साइंस सब्जेक्ट्स से पढ़ाई कर रही थी. लंबी थी. ऑफकोर्स खूबसूरत भी थी ही. उसके बालों की एक लट गाल की पुच्ची लेती रहती. कुल मिलाकर ये कि हमको भा गई. लगा कि अब तो इसी के साथ दिन बहुरने चाहिए. ये वो दौर था, जब मेरी कॉमर्स क्लास के दानिश को हिना से मुहब्बत हो गई थी. उस वक्त मेरी नजर में दानिश दिलेर था. दिलेर इसलिए क्योंकि वो हिना के लिए हाथ काट लेता था, ब्लेड से. भलभल खून गिरता था. हिना देखती तो कहती, 'या अल्लाह दानिश तुम पागल हो. आई लव यू.' सबक ये मिला कि लव यू चाहिए तो खून बहाओ विकास त्रिवेदी. पर ऑमलेट देखकर उल्टी करने वाला मैं खुद को काटने की बात से ही पसीने से तर हो जाता. पर मैं फैसला कर चुका था कि खून से कोमल का नाम लिखना है उस दीवार पर, जिसपे अपनी क्लास से निकलते हुए कोमल की नजर पड़े. फैसला सच करने में काम आया दानिश. हिना के साथ डेट पर जाने को लेकर दानिश ने एक बार फिर कलाई काट ली, हल्के से. दानिश का खून बह रहा था. मैंने बिना देर किए मॉर्डन सुदामा की तरह दानिश का बहता खून लेने के लिए अंजुरी बढ़ा दी. दानिश का गीला खून लेकर दीवार पर इंग्लिश में लिख दिया K.
K यानी कोमल
आते-जाते कोमल की नजर पड़ी या नहीं. ये मुझे कभी नहीं मालूम चल पाया. पर उसके बाद वो देख मुस्कुराने लगी थी. दानिश का खून काम कर रहा था. हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे खूबसूरत सबक मुझे उस रोज दानिश के खून के 'इस्तेमाल' से समझ आया. लेकिन वो हिंदू-मुस्लिम ही क्या, जिनके बीच पंगे न हों. दानिश खून के इस्तेमाल से मुझ पर एक रोज खौल पड़ा. बोला, 'हट स्याले, तू कोमल से प्यार नहीं करता. करता होता तो ब्लेड से हाथ काटने से न कतराता.' इत्ता सुनकर 11वीं में पढ़ रहा रुएं की मूंछों वाला मेरे अंदर का 'मर्द इन प्रोसेस' जाग गया. मैंने आव देखा न ताव. ब्लेड ली और लगा दी कलाई पर. ब्लेड छुआई भर ही थी कि फटने लगी. पैर कांपने लगे. दानिश मुझे देख रहा था. लिहाजा मैंने कम रिस्क लेते हुए हाथ की हथेली काट ली. सीधा हल्का सा चीड़ा. जिसको कसके दबाने पर मुश्किल से दो बूंद खून निकल पाया. खुद का खून निकालकर मैंने मुहब्बत का पहला मुकाम पा लिया, कमस कम दानिश की नजरों में. लेकिन हथेली की कटी खाल कई दिनों तक याद रही. उस जमाने में कमोड वाली टट्टी तो होती नहीं थी घरों में, जिसमें बटन दबाते ही गाड़ी की सर्विस सी हो जाती है. तब रहता था टट्टी में एक मग्घा. सीधे हाथ से इंसान खाता है, उल्टे हाथ से धोता है. हमने उल्टे हाथ की हथेली काटी थी. खाल निकली हुई थी. जब हगने के बाद धोते थे तो बहुत कल्लाता था. शरीर के कोमल अंगों की परवाह कोमल की याद दिलाती थी. हगते वक्त मेरी मुहब्बत मुझे कल्लाने लगती थी. कई दिनों में खाल पर पपड़ी पड़ी तो दर्द कुछ कम हुआ. कोमल से बात आगे न बढ़ पाई. हाय हैलो, BYE तक हो जाता था. एक रोज उसके पीछे खड़े हुए थे. उसे निहार ही रहे थे. वो कहीं जा रही थी कॉमर्स क्लास की मेरी दोस्त कामिनी के साथ. कामिनी को कोमल से मेरी मुहब्बत का पूरा किस्सा मालूम था. शायद उसने कोमल के कान में कहा- अरे एक बार उस बेचारे को टाटा तो बोल दे. कोमल गुस्से में पलटी और जोर से बोली-BYE बस.
लिल्लाह. न जाने कितने ही दिनों तक मैंने इस BYE बस को रिपीट किया. और सोचता रहा कि अबे यार तुम इतने बुरे हो. बहरहाल BYE बस की वजह से धीरे-धीरे कोमल मन से उतर गई. मुहब्बत चर्रा गई. एग्जाम आए. हम पास होकर बोर्ड क्लास 12वीं में पहुंचे. लेकिन कोमल अपना कोमल मन लिए 11वीं में ही रह गई. फेल हो गई बेचारी. BYE बस के बाद मेरी धधकी आत्मा को सुकूं मिल गया.पढ़िए ये वाली कैंपस कथाएं... स्टीफेंस कॉलेज में पढ़ने वाली एक बनारसी लड़की की डायरी मां कहती थी बड़ी होकर घास काटोगी, और वो सच हो गया

















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