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किस्सा बुलाकी साव-7, हंटरवाली ने शहर में दौड़ाकर डायरेक्‍टर पर हंटर चलाया

लड़की नाबालिग थी, केस ख़तरनाक हो गया. इसी बीच उसकी बहन की लाश घर में पाई गई.

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Avinash Das अविनाश दास

अविनाश दास पत्रकार रहे. फिर अपना पोर्टल बनाया, मोहल्ला लाइव  नाम से. मन फिल्मों में अटका था, इसलिए सारी हिम्मत जुटाकर मुंबई चले गए. अब फिल्म बना रहे हैं, ‘आरा वाली अनारकली’ नाम से. पोस्ट प्रोडक्शन चल रहा है. कविताएं लिखते हैं तो तखल्लुस ‘दास दरभंगवी’ का होता है. इन दिनों वह किस्से सुना रहे हैं एक फकीरनुमा कवि बुलाकी साव के, जो दी लल्लनटॉप आपके लिए लेकर आ रहा है. किस्सों की छह किस्त आप पढ़ चुके हैं. जिन्हें आप यहां क्लिक कर पा सकते हैं.
 हाजिर है सातवीं किस्त, पढ़िए.


बेला पैलेस दरभंगा राज का ही एक जर्जर होता हुआ हिस्‍सा है. मुझे किसी ने बताया कि वहां एक रंगकर्मी अपने एकांत में रहता है. मैंने सा‍इकिल उठाई और चल पड़ा. मेरे गांव से उस जगह की दूरी लगभग सात किलोमीटर थी. बड़ा सा लोहे का फाटक हाथ लगाने पर भीतर की तरफ खुल गया. अंदर घुसे. कोई नहीं था. इतना लंबा-चौड़ा बरामदा कि आंखों की चौहद्दी छोटी पड़ जाए. बरामदे में लकड़ी का सिर्फ एक सोफा पड़ा था. बिना गद्दे का. थोड़ी देर वहीं खड़े रहे. तभी एक कमरे से एक आकर्षक काया निकली. उसने नाम भी नहीं पूछा और कहा - अंदर आ जाओ.
आवाज़ में ग़ज़ब का सम्‍मोहन था. हम पीछे-पीछे उनके कमरे में गए. एक कोने में बड़ा सा पलंग था और वहीं पास में छोटा सा एक स्‍टूल रखा था. स्‍टूल पर पानी का एक सीसे वाला जग रखा था. दीवार पर नंगी स्‍त्री की एक बड़ी सी आधुनिक पेंटिंग टंगी थी. कमरे में एक ताखा (रैक) था, जिस पर कुछ इंद्रजाल कॉमिक्‍स रखे थे. उन्‍होंने एक कॉमिक्‍स उठाया और कमरे से बाहर आ गए. बरामदे में रखे सोफे पर बैठ गए. मैं भी उनके बगल में बैठ गया. फिर वे कॉमिक्‍स पढ़ने लगे. न उन्‍होंने कुछ पूछा, न मैंने कुछ कहा. थोड़ी देर के बाद मैं उठ कर खड़ा हो गया. उन्‍होंने कॉमिक्‍स से बिना नज़र हटाए कहा - फिर आना. जीवन और जीवन की हलचल से इतना निर्लिप्‍त व्‍यक्ति देख कर पहली बार मैं भरपूर तृप्ति से भर उठा था.
लौटते में नरगोना पैलेस के पास बुलाकी साव मिल गया. वह श्‍यामा मंदिर की तरफ से आ रहा था. उसने पूछा तो मैंने बताया कि आज उनसे मिल आया. बुलाकी साव ने बताया कि वह ग़ज़ब का आदमी है. राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से पढ़ कर आया, तो दरभंगा में बड़ा सा ड्रामा उसने तैयार किया. अस्‍सी के दशक के आख़ि‍री सालों में करीब पचास हज़ार रुपये के बजट का ड्रामा मायने रखता था. राजमैदान में ओपेन एयर थिएटर बना कर जो ड्रामा किया गया, उसका नाम था - ऑपरेशन रोहान्‍स क्‍लब. एक और नाटक उसने लगभग इसी बजट में किया, थैंक्‍यू मिस्‍टर ग्‍लाड. छोटे शहर में यह बड़ी बात थी. उससे भी बड़ी बात यह हुई कि जो लड़की मुख्‍य नायिका बनी, उससे उसने आर्य समाज मंदिर में जाकर शादी कर ली.
हंगामा हुआ. लड़की के घर वाले लड़की को घर ले गए. बाद में कोर्ट मुकदमा हुआ, तो लड़की ने बयान दिया कि डायरेक्‍टर ने धोखे से ब्‍याह रचाया था. चूंकि लड़की नाबालिग थी, केस ख़तरनाक हो गया. इसी बीच उसकी बहन की लाश घर में पायी गई. उन दिनों निर्मला कौर दरभंगा की एसपी थी, जो हंटरवाली के नाम से मशहूर थी. कहते हैं कि उसने शहर में दौड़ा दौड़ा कर डायरेक्‍टर पर हंटर चलाया था. बाद में सब कुछ सैटल हो गया और उस शख्‍स ने रंगकर्म की रोशनी से अलग अपने लिए एकांत का अंधेरा चुना.
मैं बुलाकी साव से उनकी कहानी सुन कर उदास हो गया. हम गांव की ओर लौट रहे थे. बुलाकी साव मेरी साइकिल के पीछे करियर पर बैठा था. मेरी उदासी भांप कर मुझे सामान्‍य करने के लिए उसने एक दूसरी कथा सुनायी. इस कथा में लय भी थी और साहस का एक नया राग भी. वह कथा को लय में गाता रहा और मैं साइकिल चलाता रहा.

जिस गली में खुले पंछी उस गली में वो लोग कहते हैं कि है सूरजमुखी सी वो कथा इतनी है कि एक दिन खेत खाली था गांव का बनिया था जिसका नाम काली था देखने में चतुर चोट्टा और जाली था सब तरफ मशहूर था कि वो मवाली था हाथ में खुरपी, बगल में ढेर आलू के स्‍वाद मुंह में था बहुत मीठे सतालू केे उन दिनों चर्चे थे सूबे भर में लालू के बढ़े काली के कदम ज्‍यों कदम भालू के थी अकेली वो मगर दस के बराबर थी यूं तो सीधी थी मगर ऊबड़ थी खाबड़ थी भेड़ि‍यों के लिए वह खूनी जनावर थी वाह क्‍या तेजी से खुरपी ठीक सर पर थी चीख़ निकली और फौरन प्राण निकले थे उधर से ही गांव के मेहमान निकले थे कान से होते हुए कुछ कान निकले थे लोग आये और फिर फरमान निकले थे पुलिस थाने, अदालत, फिर जेल की कोठी मिल रही थी बिना सब्‍ज़ी-दाल की रोटी कुछ बरस के बाद लौटी खुली थी चोटी मगर चेहरे पर वही अंगार थी मोटी आज भी देखो उसे तो अनकही सी वो लोग कहते हैं कि है सूरजमुखी सी वो

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बुलाकी साव के किस्सों की पिछली छह कड़ियां यहां हैं-
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