ये कहानी एक रात की है. उस रात अब्राहम लिंकन अपने 11 साल के बेटे विली लिंकन की कब्र पर गए होते हैं. ये सारे भूत उसी कब्रिस्तान में रहते हैं. विली का भूत भी वहीं रहता है. इन भूतों में पादरी भी है, सैनिक भी, रेपिस्ट भी है और रेप विक्टिम भी. समाज के कई वर्गों से आते हैं ये भूत.20 फरवरी 1862 को अब्राहम लिंकन के तीसरे बेटे विली की मौत हुई थी. विली का भूत बार्डो में चला जाता है. तिब्बती बुद्ध प्रथा में बार्डो मौत और पुनर्जन्म के बीच की अवस्था होती है. इसी बार्डो में सारे भूत रहते हैं. पर इन भूतों को यकीन होता है कि वो अभी मरे नहीं हैं और फिर से अपने जीवन में वापस आ सकते हैं. इनको लगता है कि ये आशा छोड़ देने पर matterlightblooming phenomenon हो जाएगा. ये उनकी अपनी भाषा है. इसके मुताबिक उनको पता नहीं चलेगा कि अगले जन्म में क्या हो सकता है. ये पढ़ के मुझे अपनी नानी की याद आ गई. नानी डेथ बेड पर थीं. डॉक्टर ने कह दिया था कि इंतजार करिए बस. लोग मंत्र जाप कर रहे थे. बुढ़ापे के दोस्त मित्र कह रहे थे कि अब माया छोड़ो तारा. मुक्ति पाने की कोशिश करो. पर नानी ने कहा कि मुझे यही जीवन चाहिए. माया ही जीवन है. माया ही खुशी है. इसके बिना कहां कुछ है. कौन जानता है कि अगले जीवन में क्या मिलेगा. फिर कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई. मुझे डेथ बेड पर पड़े रहने का वक्त उसी बार्डो की तरह लगा.
विली के भूत की दोस्ती तीन लोगों से होती है. पूरे उपन्यास में ये तीनों लोग हर चैप्टर की शुरुआत में कुछ न कुछ बोलते हैं. इनमें से एक है हैंस वॉलमैन. इनकी सिर्फ एक इच्छा है. अपनी बीवी से सेक्स करने की, जो कि ये नहीं कर पाए थे. मौत के वक्त भी इनके दिमाग में यही ख्याल था. हैंस नंगे रहते हैं और उनको परमानेंट इरेक्शन यानी कि लिंग में तनाव रहता है. ये कोई सुखद स्थिति नहीं है. बहुत पीड़ादायक होगा ये. दूसरे हैं रोजर बेविंस तृतीय. इनकी कई आंखें हैं, कई नाक कान हैं. अपने गे प्रेमी को लेकर इन्होंने आत्महत्या कर ली थी. पर इनको लगता है कि आखिरी वक्त में इन्होंने डिसीजन बदल लिया था. तीसरे हैं पादरी थॉमस जो अब तक पता नहीं कर पाए हैं कि जिंदगी में सबसे बड़ा पाप क्या किया था. पादरी लोगों को सिन यानी कि पाप से बड़ा लगाव रहता है. वो पूरे जीवन इससे जूझते रहते हैं. पर ये तीनों लोग विली को समझाते हैं कि ये जगह बच्चों के लिए ठीक नहीं है. कहते हैं कि विली को ये जगह छोड़ देनी चाहिए. मतलब अगले जीवन में प्रवेश कर जाना चाहिए.

लिंकन अपने बेटे की कब्र पर जाया करते थे.
रात को प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन आते हैं और बेटे की कब्र पर रोते हैं. कहते हैं कि मैं फिर आउंगा. बच्चे का मन बदल जाता है. वो वहीं रहना चाहता है. ये सुन के सारे भूत उसे बचाने की कोशिश करते हैं और लिंकन के शरीर में घुस जाते हैं. सब अपनी बातें बोलते हैं और लिंकन के जवाब भी सुनते हैं. ये चीज़ जबर्दस्त है. अमेरिकी कल्चर में कई ऐसी कहानियां चलती हैं जिनमें लिंकन को महामानव के तौर पर बताया जाता है. ऐसा माना जाता है कि लिंकन मरे नहीं हैं, आज भी जिंदा हैं. कभी उनको वैंपायर हंटर दिखाते हैं, कभी सुपरहीरो. एक फिल्म भी आई थी इसी थीम पर. उन्हीं लिंकन के माध्यम से भूत सारी बातें कहते हैं. और तब हमें अहसास होता है कि रेपिस्ट, हत्यारे, सैनिक, आत्महत्या करने वाले और सारे अपराधी क्रूर लोग भी इंसान होते हैं. सबके मन में वही दर्द होता है. तब लगता है कि हम किसी की मौत पर खुश नहीं हो सकते. चाहे कानून की नज़र में वो कितना भी गलत क्यों न हो.
ये वो वक्त था जब अमेरिका में सिविल वॉर चल रहा था. दास प्रथा के खिलाफ. बेटे के मरने के दो हफ्ते बाद अब्राहम लिंकन ने एक दास प्रथा के व्यापारी को फांसी दी थी. उस दौर में हजारों लोग मारे गए थे. तब समझ आता है कि ये आदमी कैसे इन चीजों से निपट रहा होगा. लिंकन कभी क्रूर नहीं रहे थे. कभी तानाशाही प्रवृत्ति नहीं थी, न ही क्रांति का जोश कि सबको मार दो. पर उन्हें लोगों को मारना पड़ा था. ये वक्त कैसा होगा. क्या चल रहा होगा इस आदमी के दिमाग के अंदर.जॉर्ज की किताब की शुरुआत आसान नहीं है. समझ में ही नहीं आता कि क्या हो रहा है. क्योंकि कहीं बताया नहीं गया है कि कौन बोल रहा है. लगे रहने पर पता चलता है कि अच्छा ये मामला है. शुरुआत में तो मैंने तुरंत जजमेंट बना लिया कि यार इतनी बोरिंग किताब है, कैसे बुकर दे दिया. इससे अच्छी तो अरुंधति रॉय की मिनिस्ट्री ऑफ हैपिनेस थी. उसमें तो कितने लोगों को दुख-दर्द जोड़ा गया है. पर धीरे-धीरे पढ़ते-पढ़ते पता चला कि नहीं, ये वाली अरुंधति की किताब से भी ज्यादा दुख समेटे हुए है. हालांकि इस तरीके से तुलना नहीं की जा सकती. तुलना की जा सकती है लिखने के स्टाइल पर.
जॉर्ज का तरीका अनूठा है. कहीं-कहीं हंसी आ जाती है तो कहीं-कहीं आंख में पानी भी आ जाता है.अंग्रेजी आसान है. अगर अरुंधति की पहली किताब द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स से तुलना करें तो बहुत ही आसान. पर दिक्कत होती है वहां, जहां पर जॉर्ज इतिहास का सहारा लेते हैं. ये हिस्टॉरिकल फिक्शन है. मतलब ऐतिहासिक घटनाओं को उठाकर उसमें अपनी कल्पना मिला देना. इस कहानी की शुरुआत तो जॉर्ज ने 90 के दशक में ही कर दी थी. अपने मन में. जब अमेरिका में घूमते वक्त उनको किसी ने बताया था कि लिंकन अपने बेटे की कब्र पर जाया करते थे. ये कहानी उनके दिमाग में उमड़ते घुमड़ते रही. 2012 में जॉर्ज ने इस पर काम करना शुरु किया. और सारी चीजें जुड़ती चली गईं. जॉर्ज ने इस किताब में लिंकन की बॉयोग्राफी और सिविल वॉर से जुड़ी किताबों की कई लाइन्स भी कोट किया है. सारी चीजों को बांधते चले गए हैं.
ये किताब जल्दबाजी में पढ़ने के लिए नहीं है. जो लोग धीरे-धीरे पढ़ना जानते हैं, वो बहुत कुछ महसूस करेंगे पढ़ते हुए. जो लोग जल्दबाजी में पढ़ेंगे वो बार्डो में चले जाएंगे. समझ नहीं आएगा कि आगे बढ़ें कि लटके रहें. इस उपन्यास में रिवर्ट बैक का इस्तेमाल हुआ है. आमतौर पर ये गलत माना जाता है. हालांकि इस किताब में बहुत सारे पात्र अपनी भाषा बोलते हैं, जो कि टूटी-फूटी अंग्रेजी भी हो गई है कई जगह. पर ये प्रयोग कुछ समझ नहीं आया.
'लिंकन इन द बार्डो' बुक का रिव्यू 'दी लल्लनटॉप' के लिए ऋषभ ने किया है.











