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महाश्वेता देवी के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी किताब 'जंगल के दावेदार' का ये अंश!

महाश्वेता देवी को पद्म विभूषण से नवाजा जा चुका है.

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1979 में उन्हें बिरसा मुंडा पर आधारित उनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया.
14 जनवरी को साहित्यकार महाश्वेता देवी की 95वीं जयंती है. महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी, 1926 को ढाका में हुआ था. उनके पिता मनीष घटक भी कवि और उपन्यासकार थे, और मां धरित्री देवी भी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं. महाश्वेता देवी बचपन से ही साहित्य और समाजसेवा के माहौल में रहीं. 1979 में उन्हें बिरसा मुंडा पर आधारित उनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. 1986 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया. 1996 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार और रमन मैगसेसे पुरस्कार और 2006 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. आज उनके जन्मदिन पर पढ़िए उनकी 'जंगल के दावेदार' उपन्यास का ये अंश.

जंगल के दावेदार

पुराने पुरखे बोलने लगे, ‘‘सबके ऊपर स्वर्ग के भगवान की जय! पृथिवी के भगवान बीरसा की जय! हम धरती के आबा से प्रार्थना करते हैं- हमारे तीरों और हमारे फरसों में धार रहे, तेजी बनी रहे. हमारे दुश्मनों की बन्दूकों, गोलियों और तलवारों का नाश हो!’’ अब सब लोग हाथ जोड़कर बोलने लगे: हे धरती के आबा, राह के जितने काँटे दुश्मनों की हिंसा, द्वेष...हमारी पीड़ाएँ दुःख के दिन, दुःस्वप्न... सारे रोग- सारे पाप और अँगरेज सरकार... सारे काँटे दूर हों! दूर हों! दूर हों! अब प्रचारक लोग एक साथ बोले: हे आबा! हे बीरसा! तुम्हारे धर्म में जैसे बताया है, उसी तरह हमारे होरोमो-रोया-जी (शरीर-विदेह, सत्ता-प्राण-आत्मा-मन) आकाश से पृथ्वी तक फैल जाएँ! नानक बोले: हे धरती के आबा! एक तुम ही हमारे त्राता हो. हमें पवित्र करो! बीरसा ने आकाश की ओर हाथ उठाए. ऊपर की ओर ताका. उसके बाद कहना शुरू किया, ‘‘बड़ा शुभ दिन है. मेरा युग शुरू हो रहा है. आज जमींदार लोग मुण्डा लोगों को देखकर हँसते हैं। लेकिन उनका समय खतम हो रहा है. हमारा समय आ गया है.’’ बीरसा का स्वर भीषण और गम्भीर था.
‘‘हमारा युग आ गया है. तुम लोगों को मैं देश लौटा दूँगा. हमारे राज में खेत-खेत के बीच में मेड़ें नहीं होंगी. पूरी धरती सबकी है. पूरी खेती एक साथ होगी. सारी खेती सबकी होगी. अगर उठाकर हाथ में कोई फसल दे भी दो तो भी मेरे राज में कोई मुण्डा अकेले मालिक न होगा. मेरे राज में लड़ाई न रहेगी. धर्म का राज होगा. हमारे पुरखों ने जिस तरह धर्म के अनुसार राज किया, अपने राज में हम वैसे ही राज करेंगे. लाठियों और हथियारों से राज नहीं चलाएँगे.’’
करमी की आँखें बन्द होने लगीं. कलेजे में ठण्डी हवा बहने लगी थी. जलवाही पवन! सूखे की तपन शान्त करनेवाली! कलेजे में वर्षा हो रही थी. खेतों में धान के पौधे खड़े हो रहे थे- ‘‘बीरसा, तू बोलता रह, तू सचमुच भगवान है!’’ ‘‘जमींदार जमीन छीनकर अपनी मिल्कियत जमाना चाहते हैं. जिनका हक है, जमीन उन्हें ही मिलेगी. जिनके शरीर से दूध की धार की तरह रक्त बहेगा, जमीन उन्हें ही मिलेगी. ‘‘सारे दुश्मनों को भगा देंगे! अँगरेज, राजा, जमींदार...इस देश में जितने शैतान हैं, पिशाच हैं, सबको भगाएँगे. ‘‘मुण्डा लोगों को दुश्मनों का सामना करना होगा, नहीं तो सैकड़ों बरसों में भी देश को वापस नहीं पा सकेंगे. भयंकर लड़ाई होगी, तभी दुश्मनों का राज खतम होगा, नहीं तो नहीं. आज तमाम लोग हँसते हैं; हजारों मुण्डा लोगों के दिन रोने में बीत जाते हैं. अपना राज हो जाने पर ही मुण्डा हँस सकेंगे. ‘‘सावधान रहो तुम सब लोग.’’ बीरसा थोड़ा-थोड़ा हिलने लगा. इस माघ की ठण्डक में भी उसके माथे से पसीना बह रहा था. करमी को लगा कि उसका मुँह सूखा है और दोनों भौंहों के बीच की रेखा चिरस्थायी हो गई है, और तीखी नाक के नथुनों के दोनों ओर की रेखाएँ ओठों के कोनों के बराबर तिरछी होकर झुक रही है. करमी को लगा कि उसके जन्म के बाद की चौबीस होलियाँ नहीं बीती है, अभी बीरसा अपने बाप-दादा- परदादा की उमर के मुण्डाओं से भी जैसे बुजुर्ग हो गया है! लगता था- मेरा जवान बेटा नई सगाई कर, नई बहू लाकर गृहस्थी बसाएगा. लेकिन नियति ऐसी है कि मुण्डा लोगों के सारे दारिद्र्य-वंचन-अनाहार का बोझ उसने अपने कन्धों पर ले लिया है. ‘‘सावधान हो जाओ तुम लोग. इस धरती का महाप्रलय में नाश होगा. मैं धरती फोड़कर पाताल का जल बहा दूँगा. पहाड़ों को तोड़कर बराबर कर दूँगा. दुश्मनों की फौजें कहीं भी भागें, मैं खींचकर सामने ला खड़ा करूँगा. वे भागेंगी कहाँ?
‘‘जीत हमारी ही होगी. उस दिन तुम लोग छाती फुलाकर, हाथ उठाकर, मूँछें ऐंठकर आनन्द मनाओगे. जो लोग मुझे न मानेंगे वे मिट्टी हो जाएँगे. जो लोग मुझे मानेंगे मैं उनका खयाल रखूँगा.’’
अँजुली-भर पानी लेकर बीरसा ने सबकी ओर छिड़का. बोला, ‘‘कल से हम हर ओर जाएँगे. उलगुलान के लिए पुरखों का आशीर्वाद चाहिए. कल सब चुटिया जाएँगे. हमारे पुरखे उसी पूर्ती मुण्डा चुटिया ने जिस जगह सिंबोङा की पूजा के लिए बेदी बनाई थी, वहीं रघुनाथ राजा ने तीन सौ बरस पहले मन्दिर बनवाया था. जो मन्दिर बनवाया था, उस मन्दिर से तुलसी लेंगे. मन्दिर से तुलसी लेंगे. ‘‘और... .’’ करमी उठकर खड़ी हो गई. ‘‘तुम क्या कह रही हो!’’ ‘‘कनू का बाप कहेगा.’’ सुगाना उठ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘और वहाँ तुम्हारी पट्टी है. ताँबे की पट्टी पर लिखा है, जिसे दिकू छोटा नागपुर कहते हैं, रेकड किया हुआ है वहाँ मुण्डा लोगों का पूरा अधिकार है. वह पट्टी मन्दिर में है, हमें लेनी होगी. तुम धरती के आबा हो. मैं तुम्हारा बाप होकर भी तुम्हारा बीरसाइत हूँ. वह पट्टी लेनी होगी.’’ ‘‘लेंगे. कल हम बोर्तोदि जाएँगे. वहाँ से चुटिया जाने के लिए तीन दलों मंे बँट जाएँगे. पहले दल के सिरे पर होंगे बनगिरि के रोकन मुण्डा. दूसरे दल के आगे होंगे मेरे बड़े भाई कोम्ता. मैं तीसरे दल के आगे रहूँगा. आज सब जान रखो, धर्म में रहने से वे देखते हैं! पहान के पैर पकड़कर हम बलि न देंगे. रोग-भोग में डाइन-ओझा-देओंरा के पास नहीं जाएँगे. लेकिन पुरखों ने जो बताया है कि स्वर्ग में सिंबोङा, धरती पर पंचायत, बीच में है सरकार- यही बात याद करके हम चलेंगे. मैं धरती का आबा, सिंबोङा को नहीं चाहता. सरकार हम बना लेंगे. लेकिन कुछ लोगों की पंचायत बनेगी जो समाज को देखेगी. कल हम सब जाएँगे. पुरखों को मालूम होगा कि मुण्डा सिर्फ सोते ही नहीं हैं, बँधकर मार नहीं खाते, वे जाग गए हैं!’’ सब बीरसाइत एक साथ गाने लगे: सिरमारे फिरून राजा जय! घरतिर पुड़ोइ राजा जय! 2 अब सब चुप हो गए। औरतें गुनगुनाकर गाने लगीं: सिरमारे फिरून राजा जय! घरतिर पुड़ोइ राजा जय! करमी नहीं गई; कोई बीरसाइत औरत नहीं गई. ‘‘पहले घर आकर बता जाना, बाप’’- करमी ने बीरसा से कहा था. वे लोग यहाँ आएँगे, इस आशा में करमी ने घर-द्वार लीप-पोत डाला. बीरसा चालकाड़ आकर नई कोठरी में रहता था. आँगन के उस ओर और भी कोठे बन गए थे. तमाम घरों में नई-नई कोठरियाँ बन गई थीं. पहले मुण्डा लड़के- लड़कियाँ, ब्याह के पहले तबीयत होने पर, गिटिओरा में रहते थे. अब बीरसा के प्रभाव से बहुत-से पुराने रीति-रिवाजों के साथ गिटिओरा में रहना भी खत्म हो गया था. इसीलिए जिसके कई लड़के होते उसे ही कमरे की जरूरत होती. करमी के घर के चारों ओर नए-नए कमरे थे. बीरसा के धर्म में सबके लिए साफ रहना जरूरी था. घर-घर में लकड़ी के तख्त थे. तख्त पर चटाई बिछाई जाती थी. बीरसा के कमरे के फर्श और दीवारों को करमी ने एक बार गेरू से लीप दिया. फिर गेरू को सुखाकर राख के रंग की मिट्टी को कूची से उस पर लेपा. सूखकर सब चमकने लगा. बृहस्पतिवार को बीरसा का जन्मदिन था. उस दिन कोई जीव-हत्या नहीं की जाती. जाल काटकर करमी ने दो खरगोश छोड़ दिए, उसके बाद पलाश के पेड़ के नीचे चटाई के आसन पर बैठ गई. बीरसा इसी राह आएगा.

पुस्तक -जंगल के दावेदार

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लेखक - महाश्वेता देवी

प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन

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मूल्य – 293/-पेपरबैक

भाषा – हिंदी

पृष्ठ – 284

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आईएसबीएन - 10 : 8183611532

आईएसबीएन -13 : 978-8183611534

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