गांव में खेती का सबसे पहला नियम कभी ये था कि बीज अपना होना चाहिए. बीज मतलब सिर्फ एक दाना नहीं, अगली फसल का भरोसा, अगली पीढी की रोटी और किसान की आजादी. लेकिन अब कई राज्यों से जो खबरें आ रही हैं, वो सीधा डर पैदा करती हैं. बुवाई के सीजन से पहले देसी बीजों की भारी किल्लत. और किसान मजबूरी में कंपनियों के हाइब्रिड बीजों पर टिकते जा रहे हैं.
किसान के बीजों पर कॉरपोरेट का कब्जा? मिट्टी अपनी, पसीना अपना... बीज उधार का
देसी बीजों की किल्लत बढ़ रही है और किसान तेजी से हाइब्रिड बीजों पर निर्भर हो रहे हैं. क्या भारत की खेती अब बीज के जरिए कॉरपोरेट कंट्रोल की तरफ जा रही है?


अब जरा इस तस्वीर को समझिए. खेत आपका, पानी आपका, मेहनत आपकी. लेकिन बीज किसी कंपनी के गोदाम से आएगा. अगली बार भी वही कंपनी देगी. कीमत वही तय करेगी. किस्म वही तय करेगी. और अगर कल को वही बीज नहीं मिला तो आपकी खेती वहीं अटक जाएगी. यानी खेती धीरे धीरे वैसी चीज बनती जा रही है, जिसमें किसान मालिक कम और ग्राहक ज्यादा होता जा रहा है.
ये कोई छोटा बदलाव नहीं है. ये खेती के DNA में बदलाव है. और इसी बदलाव का नाम आज की भाषा में धीरे धीरे उभर रहा है, ‘सीड कैपिटल’. यानी बीज अब खेती की शुरुआत नहीं, खेती का बाजार बनता जा रहा है. जहां बीज एक कृषि संसाधन नहीं, निवेश और मुनाफे का हथियार बन चुका है.
आज की यह स्टोरी सिर्फ किसानों की नहीं है. यह हर उस भारतीय की है जो रोज थाली में चावल, गेहूं, दाल, सरसों का तेल, सब्जी और फल देखता है. क्योंकि अगर बीजों की विविधता खत्म हुई, तो देश की फूड सिक्योरिटी भी साइलेंट तरीके से कमजोर हो जाएगी. और सबसे बुरी बात ये है कि यह खतरा बिना शोर किए, बिना बवाल किए, धीरे धीरे अंदर ही अंदर बढ़ रहा है.
सबसे पहले समझिए, देसी बीज आखिर हैं क्या?
देसी बीज यानी वो बीज जो पीढियों से किसानों ने खुद बचाए, खुद सुधारे, खुद तैयार किए. इसे आप ऐसे समझिए जैसे गांव की अपनी भाषा. हर गांव, हर इलाके की मिट्टी, पानी, तापमान और मौसम के हिसाब से एक बीज खुद को ढाल लेता है. यही देसी बीजों की असली ताकत होती है.
देसी बीजों को कई लोग “लैंडरेस” भी कहते हैं. मतलब लोकल किस्में. इनका फायदा यह होता है कि ये सूखा सह सकती हैं, ज्यादा पानी झेल सकती हैं, कुछ कीटों से लड़ सकती हैं, और सबसे जरूरी बात, किसान इन्हें हर साल अपने खेत से निकालकर अगली बार बो सकता है.
यानी देसी बीज किसान को बार बार बाजार के चक्कर में नहीं डालते. वो खेती को आत्मनिर्भर बनाते हैं.
फिर हाइब्रिड और कंपनी वाले बीज क्या हैं?
हाइब्रिड बीज सुनने में बहुत वैज्ञानिक लगते हैं. और कुछ मामलों में हैं भी. ये दो अलग किस्मों को क्रॉस करके तैयार किए जाते हैं ताकि ज्यादा पैदावार मिले, फसल जल्दी तैयार हो, और बाजार में एक जैसी क्वालिटी आए.
लेकिन खेल यहां से शुरू होता है.
हाइब्रिड बीजों का बड़ा हिस्सा ऐसा होता है कि किसान अगर उसका बीज बचाकर अगली बार बोए, तो वही रिजल्ट नहीं मिलता. पैदावार गिर जाती है. फसल कमजोर पड़ जाती है. मतलब किसान मजबूर हो जाता है कि हर सीजन नया बीज खरीदे.
यहीं से बीज का बाजार पैदा होता है. और यही बाजार धीरे धीरे ‘सीड कैपिटल’ में बदलता है.
‘सीड कैपिटल’ क्या है? ये शब्द डराता क्यों है?
सीड कैपिटल का मतलब है बीजों पर नियंत्रण को पूंजी की तरह इस्तेमाल करना. यानी बीज सिर्फ खेती का इनपुट नहीं, एक कॉरपोरेट एसेट बन जाता है. जिस पर पेटेंट हो सकता है, ब्रांडिंग हो सकती है, मार्केटिंग हो सकती है, सप्लाई चेन हो सकती है, और कीमत पर कंट्रोल हो सकता है.
जिस दिन बीज पूरी तरह बाजार के कब्जे में चला गया, उस दिन किसान की खेती का सबसे बुनियादी अधिकार कमजोर हो जाता है. यही वजह है कि दुनिया भर में बीजों पर नियंत्रण को कृषि की सबसे बड़ी रणनीतिक लड़ाई माना जाता है.
आपको लगेगा कि ये बात बहुत बड़ी हो गई. लेकिन असल में यही सच है. क्योंकि खेती में अगर पानी बंद हो जाए तो किसान किसी दूसरे स्रोत से पानी ढूंढ सकता है. अगर खाद महंगी हो जाए तो कुछ हद तक जैविक विकल्प खोज सकता है. लेकिन अगर बीज ही उपलब्ध नहीं होगा, तो खेती की शुरुआत ही नहीं होगी.
बीज मतलब खेती का स्टार्ट बटन.
पुराने भारत में बीज कैसे बचाए जाते थे?
भारत में खेती हजारों साल पुरानी है. और इस खेती का सबसे बड़ा विज्ञान किसानों के पास था. हर कटाई के बाद किसान कुछ हिस्सा अलग रखता था, वही बीज बनता था. गांव में बीजों की अदला बदली होती थी. रिश्तेदारों में बीज बांटे जाते थे. मेलों में बीज का लेनदेन होता था.
हर गांव में कुछ परिवार होते थे जो बीज संरक्षण में माहिर होते थे. ये लोग जानते थे कि कौन सा बीज ज्यादा टिकाऊ है, कौन सा जल्दी पकता है, कौन सा सूखे में बच जाता है.
इस व्यवस्था में किसान बाजार पर निर्भर नहीं था. खेती का ज्ञान लोकल था, और बीज भी लोकल था.
फिर बदलाव कहां से शुरू हुआ? हरित क्रांति ने क्या किया?
हरित क्रांति ने भारत को अकाल से बचाया, इसमें कोई शक नहीं. 1960-70 के दशक में हाई यील्ड वैरायटी यानी HYV बीज आए. गेहूं और चावल में उत्पादन बढ़ा. भारत ने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल की.
लेकिन हरित क्रांति का एक साइड इफेक्ट भी था. HYV बीजों के साथ ज्यादा पानी, ज्यादा रासायनिक खाद, ज्यादा कीटनाशक का पैकेज आया. किसान को उत्पादन तो मिला, लेकिन खेती धीरे धीरे महंगी होती गई. और कई जगह मिट्टी की सेहत बिगड़ने लगी.
और सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि देसी बीजों की परंपरा कमजोर पड़ गई. किसान ने धीरे धीरे अपनी किस्में छोड़ दीं. यानी उत्पादन बढ़ा, लेकिन जैव विविधता घटने लगी.
‘सर्टिफाइड बीज’ के नाम पर क्या खेल है?
आज खेती में एक शब्द बहुत चलता है, “सर्टिफाइड सीड”. सुनने में लगता है कि यह बहुत भरोसेमंद चीज है. सरकार और एजेंसियां इसकी क्वालिटी जांचती हैं. लेकिन असल खेल यह है कि खेती को धीरे धीरे इस दिशा में धकेला गया जहां किसान को लगे कि देसी बीज घटिया हैं और कंपनी वाला बीज ही असली है.
यहां एक मनोवैज्ञानिक बदलाव हुआ. पहले किसान कहता था, “हमारे गांव का बीज सबसे अच्छा है.” अब किसान कहता है, “कंपनी वाला बीज ही चलेगा, वरना रिस्क है.” यानी भरोसा खेत से हटकर ब्रांड पर चला गया.
और जब भरोसा ब्रांड पर चला जाता है, तब कीमत भी ब्रांड तय करता है.
देसी बीजों की किल्लत की खबरें क्यों आ रही हैं?
कई राज्यों में यह शिकायत सुनाई दे रही है कि देसी किस्मों के बीज मिल नहीं रहे. इसके पीछे कई वजहें हैं.
- पहली वजह है कि देसी बीजों की सप्लाई चेन खत्म हो गई. गांव में जो बीज बचाने वाली परंपरा थी, वह कमजोर हो गई.
- दूसरी वजह है कि खेती अब बाजार के हिसाब से होने लगी है. किसान को वही फसल चाहिए जो मंडी में बिके, प्रोसेसिंग कंपनियों को चाहिए, या निर्यात में जाए.
- तीसरी वजह यह है कि सरकारी बीज निगम और कृषि विभागों का ध्यान भी ज्यादा पैदावार वाली किस्मों पर गया. कई जगह देसी किस्में सरकारी सिस्टम से बाहर होती गईं.
- चौथी वजह, और सबसे बड़ी वजह, यह है कि कंपनियों ने मार्केटिंग के जरिए किसानों के दिमाग में यह बैठा दिया कि देसी बीज पुराने जमाने की चीज है.
यानी देसी बीज धीरे धीरे खेती के “स्टाइल आउट” हो गए.
जैव विविधता खत्म होने का मतलब क्या है?
यहां पर एक खतरनाक बात समझिए. अगर आप किसी गांव में जाएं और पूछें कि पहले कितनी किस्म की धान बोई जाती थी, तो बुजुर्ग बताएंगे कि 10-20 किस्में थीं. कहीं सुगंधित, कहीं मोटा चावल, कहीं जल्दी पकने वाला, कहीं पानी में टिकने वाला.
आज कई जगह एक या दो किस्मों पर खेती सिमट गई है. इसे कहते हैं मोनोकल्चर. यानी एक ही किस्म पर निर्भरता. मोनोकल्चर का मतलब यह है कि अगर उस किस्म पर कोई बीमारी आ गई, या मौसम बदल गया, तो पूरा उत्पादन एक झटके में गिर सकता है.
यह वही खतरा है जो दुनिया में आयरलैंड के आलू अकाल जैसी घटनाओं में देखा गया था. जब एक ही किस्म पर निर्भरता ने लाखों लोगों को भूख में धकेल दिया. भारत में यह खतरा धीरे धीरे बढ़ रहा है.
फूड सिक्योरिटी पर इसका सीधा असर कैसे पड़ेगा?
फूड सिक्योरिटी का मतलब सिर्फ अनाज का उत्पादन नहीं. इसका मतलब यह भी है कि संकट के समय देश के पास विकल्प हों. अगर जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा बढ़ेगा, तो सूखा सहने वाली देसी किस्में बहुत काम आएंगी. अगर बाढ़ बढ़ेगी, तो पानी में टिकने वाली देसी किस्में जरूरी होंगी.
लेकिन अगर ये किस्में खत्म हो गईं, तो संकट में हमारे पास विकल्प कम होंगे. यही वजह है कि FAO जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन बार बार कहते हैं कि कृषि में बायोडायवर्सिटी (biodiversity) बचाना जरूरी है.
भारत में भी नीति आयोग और कृषि से जुड़े कई शोध यह बताते हैं कि क्लाइमेट चेंज के दौर में लचीली किस्मों (resilient varieties) का महत्व बढ़ेगा. यानी आज देसी बीजों की किल्लत सिर्फ बाजार की समस्या नहीं, कल की राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी है.
किसानों की लागत क्यों बढ़ रही है? बीज का रोल क्या है?
खेती में लागत बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, लेकिन बीज सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक बन चुका है. पहले किसान के लिए बीज लगभग मुफ्त होता था. अपने खेत से बचाया हुआ.
अब किसान को बीज खरीदना पड़ता है. और कई हाइब्रिड बीजों की कीमत सामान्य बीज से कई गुना ज्यादा होती है. और यह सिर्फ बीज तक नहीं रुकता. कई हाइब्रिड बीजों के साथ एक पूरा पैकेज आता है. ज्यादा खाद, ज्यादा पानी, ज्यादा कीटनाशक. यानी बीज महंगा, और उसके साथ खेती का पूरा खर्च महंगा.
यही वजह है कि किसान की कमाई बढ़े या न बढ़े, लागत जरूर बढ़ती जा रही है. और जब लागत बढ़ती है, तो कर्ज बढ़ता है. यह खेती का सबसे खतरनाक चक्र है.
कंपनियों का पक्ष क्या है? वो क्या तर्क देती हैं?
यहां एकतरफा कहानी नहीं है. कंपनियों के पास भी अपने तर्क हैं, और कुछ मामलों में वो गलत भी नहीं हैं. कंपनियां कहती हैं कि भारत की आबादी बढ़ रही है. खेती की जमीन सीमित है. इसलिए उत्पादन बढ़ाना जरूरी है.
वो कहती हैं कि हाइब्रिड बीज ज्यादा उत्पादन देते हैं, किसानों को फायदा होता है, और बाजार को स्थिर सप्लाई मिलती है. वो यह भी कहती हैं कि रिसर्च और डेवलपमेंट महंगा काम है. नई किस्में बनाने में सालों लगते हैं. इसलिए बीज की कीमत में उनका निवेश जुड़ा होता है.
यह भी सच है कि कुछ क्षेत्रों में हाइब्रिड बीजों ने किसानों की आय बढ़ाई है. खासकर सब्जियों और कुछ नकदी फसलों में. समस्या यहां नहीं है कि हाइब्रिड बीज मौजूद हैं.
समस्या यह है कि विकल्प खत्म होते जा रहे हैं.
असली खतरा क्या है? खतरा कॉरपोरेट बीज नहीं, कॉरपोरेट निर्भरता है
खेती में टेक्नोलॉजी आना बुरा नहीं. समस्या तब होती है जब किसान के पास विकल्प न रहे. अगर किसान के पास देसी बीज भी हों, सरकारी सिस्टम से सस्ते विकल्प भी हों, और कंपनी के बीज भी हों, तो यह बाजार का संतुलन है.
लेकिन अगर देसी बीज गायब हो जाएं और किसान मजबूरी में सिर्फ कंपनी पर निर्भर हो जाए, तो यह नियंत्रण की स्थिति बन जाती है. और नियंत्रण का मतलब है कीमत, शर्तें, सप्लाई, और भविष्य की खेती पर प्रभाव.
यही ‘सीड कैपिटल’ का असली मतलब है.
सरकार और नीति का रोल क्या है?
भारत में बीजों को लेकर Seeds Act और कई तरह के नियम हैं. सरकार के पास बीज निगम हैं, कृषि विश्वविद्यालय हैं, ICAR जैसी संस्थाएं हैं. लेकिन पिछले कुछ दशकों में सरकारी सिस्टम की कमजोरी साफ दिखी है.
कई जगह सरकारी बीज समय पर नहीं पहुंचते. कई जगह गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं. और किसानों को भरोसा नहीं होता. जब सरकारी सिस्टम भरोसा खो देता है, तो निजी कंपनियां खाली जगह भर देती हैं.
और यही हुआ है. सरकार ने MSP, खरीद, फसल बीमा जैसी चीजों पर तो फोकस किया, लेकिन बीजों की बायोडायवर्सिटी और देसी बीजों की संरक्षण नीति उतनी मजबूत नहीं बन पाई जितनी बननी चाहिए थी.
कुछ राज्यों में सीड बैंक और कम्युनिटी सीड इनिशिएटिव हुए हैं, लेकिन वो बड़े स्तर पर नहीं फैल पाए. यहां सरकार की भूमिका निर्णायक होनी चाहिए, क्योंकि बीज सिर्फ बाजार का मुद्दा नहीं, पब्लिक गुड है.
भारत में बीज बाजार कितना बड़ा है? और इसमें किसका दबदबा है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि बाजारों में है. बीज उद्योग भी तेजी से बढ़ रहा है. कई रिपोर्ट्स के अनुसार भारत का बीजों का बाजार लगातार बढ़ रहा है और इसमें निजी कंपनियों का हिस्सा मजबूत होता गया है.
बीज उद्योग में मल्टीनेशनल कंपनियां, बड़े भारतीय कॉरपोरेट, और क्षेत्रीय कंपनियां शामिल हैं. यानी यह सिर्फ गांव का मामला नहीं. यह एक बड़ा बिजनेस सेक्टर है.
और जहां बिजनेस बड़ा होता है, वहां नियंत्रण की लड़ाई भी बड़ी होती है.
‘पेटेंट’ और IPR का डर क्या है?
बीजों पर पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार (intellectual property rights) यानी IPR की बहस भारत में पुरानी है. भारत में Plant Variety Protection and Farmers’ Rights Act (PPVFR) जैसे कानून हैं जो किसानों के अधिकारों की बात करते हैं. यह कानून कहता है कि किसान को बीज बचाने और इस्तेमाल करने का अधिकार है.
लेकिन व्यावहारिक समस्या यह है कि बाजार में जो बीज ज्यादा बिकते हैं, वो ब्रांडेड होते हैं. और ब्रांडेड सिस्टम धीरे धीरे किसान को निर्भरता में ले जाता है.
पेटेंट का डर इसलिए भी है क्योंकि दुनिया में कई देशों में कंपनियों ने बीजों पर पेटेंट लेकर किसानों को कानूनी मामलों में उलझाया है. भारत में कानून किसानों को सुरक्षा देता है, लेकिन कानूनी सुरक्षा और बाजार की मजबूरी दो अलग चीजें हैं.
किसान कोर्ट में अधिकार जीत भी ले, तो खेत में बीज कहां से लाएगा? यही असली सवाल है.
यह संकट पैदा कैसे हुआ?
यहां एक सीधी chain है. हरित क्रांति आई. उत्पादन बढ़ा, HYV बीज आए. रासायनिक खेती बढ़ी. देसी बीज बचाने की परंपरा कमजोर हुई. सरकारी बीज सिस्टम कमजोर पड़ा. कंपनियों ने हाइब्रिड और ब्रांडेड बीजों का बाजार बनाया. किसानों को तुरंत फायदा दिखा, इसलिए भरोसा बढ़ा. धीरे धीरे देसी किस्में गायब होती गईं.
अब विकल्प घट गए. और अब किसान मजबूरी में कॉरपोरेट बीजों पर निर्भर होता जा रहा है. यानी यह संकट अचानक नहीं आया. यह धीरे धीरे बनाया गया सिस्टम है.
किसान की आजादी क्यों घटती जा रही है?
किसान की आजादी का मतलब सिर्फ जमीन होना नहीं है. किसान की आजादी का मतलब है कि वो तय कर सके कि क्या बोएगा, किस बीज से बोएगा, किस लागत पर बोएगा, और किस जोखिम के साथ बोएगा.
- जब बीज कंपनी के हाथ में चला जाता है, तो किसान की फैसला लेने की ताकत कम होती है.
- कंपनी तय करती है कौन सी किस्म आएगी.
- कंपनी तय करती है कीमत क्या होगी.
- कंपनी तय करती है बीज कब मिलेगा.
- कंपनी तय करती है पैकेज में कौन सा कैमिकल जुड़ा होगा.
- और किसान सिर्फ खरीददार बनकर रह जाता है.
यह सिर्फ गांव की समस्या नहीं, मिडिल क्लास की भी कहानी है
यहां एक बात शहर वालों को समझनी चाहिए. आज टमाटर महंगा हो जाए तो खबर बनती है. प्याज महंगा हो जाए तो सरकार हिल जाती है. लेकिन ये कीमतें खेत से निकलती हैं. और खेत की शुरुआत बीज से होती है.
अगर बीज महंगा होगा, तो फसल महंगी होगी. अगर फसल महंगी होगी, तो सब्जी महंगी होगी. अगर सब्जी महंगी होगी, तो आपके किचन का बजट बिगड़ेगा. और अगर डायवर्सिटी घट गई, तो जलवायु संकट के समय सप्लाई में झटके लगेंगे. इससे महंगाई बढ़ेगी. RBI बार बार कहता है कि फूड इन्फ्लेशन भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है.
यानी बीज का संकट सीधे आपके मासिक खर्च का संकट है.
किसान को कैसे “ग्राहक” बनाया गया?
यह बदलाव सिर्फ नीति और बाजार से नहीं हुआ, यह दिमाग से हुआ. पहले किसान खुद को उत्पादक मानता था. अब किसान खुद को उपभोक्ता की तरह देखने लगा है. कंपनियों की मार्केटिंग ने किसान को यह सिखाया कि खेती का मतलब इनपुट खरीदना है. जितना महंगा इनपुट, उतनी आधुनिक खेती.
यह सोच खतरनाक है. क्योंकि यह किसान की आत्मनिर्भरता को कमजोर करती है. और जब किसान आत्मनिर्भर नहीं रहता, तो गांव की सामाजिक संरचना भी बदलती है. बीज बचाने वाले बुजुर्गों की भूमिका खत्म होती है. गांव का ज्ञान खत्म होता है.
और जब ज्ञान खत्म होता है, तो बाजार का नियंत्रण बढ़ता है.
देसी बीज खत्म होने का पर्यावरण पर असर क्या होगा?
देसी बीजों की विविधता सिर्फ खेती की विविधता नहीं, प्रकृति का संतुलन भी है. जब आप एक ही किस्म बड़े इलाके में बोते हैं, तो कीटों का हमला बढ़ता है. क्योंकि कीट को एक जैसा भोजन मिल जाता है.
फिर किसान ज्यादा पेस्टीसाइट डालता है. इससे मिट्टी और पानी प्रदूषित होता है. मधुमक्खियां और परागण करने वाले कीड़े घटते हैं. यह चक्र खेती को और कमजोर करता है.
यानी बायोडायवर्सिटी खत्म होने का मतलब सिर्फ बीज खत्म होना नहीं, पूरा इकोसिस्टम कमजोर होना है.
WHO और Lancet जैसी संस्थाएं कई बार यह बता चुकी हैं कि पेस्टीसाइट एक्सपोजर और एनवायरमेंटल टॉक्सिटी पब्लिक हेल्थ के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं. भारत में भी पेस्टीसाइट अवशेषों को लेकर बहस समय समय पर उठती रही है.
देसी बीज बनाम हाइब्रिड बीज: कौन बेहतर है?
यह सवाल अक्सर बहस में बदल जाता है. लेकिन सच यह है कि दोनों की जगह है. देसी बीज का फायदा यह है कि वो टिकाऊ होते हैं, कम लागत में चलते हैं, और लंबे समय में resilient यानी लचीले होते हैं.
हाइब्रिड बीज का फायदा यह है कि कई मामलों में उत्पादन ज्यादा देता है, एक जैसी गुणवत्ता (uniform quality) देता है और बाजार के लिए उपयुक्त होता है. समस्या तब होती है जब संतुलन खत्म हो जाता है.
खेती में विविधता ही असली सुरक्षा है. अगर किसान के पास 5 विकल्प होंगे, तो वह मौसम के हिसाब से चुन सकता है. अगर सिर्फ 1 विकल्प होगा, तो वह जुए की तरह खेती करेगा.
क्या सच में कॉरपोरेट कब्जा हो सकता है?
सीधी बात यह है कि कब्जा बंदूक से नहीं होता, निर्भरता से होता है. अगर किसान के पास देसी बीज नहीं होंगे, सरकारी विकल्प नहीं होंगे, सीड बैंक नहीं होंगे, तो बाजार का कंट्रोल अपने आप कंपनी के हाथ में चला जाएगा.
कंपनी को कब्जा करने के लिए कुछ करना नहीं पड़ेगा. किसान खुद मजबूरी में उनके पास जाएगा. और यही सबसे खतरनाक कब्जा होता है, जो दिखता नहीं, लेकिन चलता रहता है.
भारत में देसी बीज बचाने की कोशिशें कहां हो रही हैं?
कुछ राज्यों में कम्युनिटी सीड बैंक की पहल हुई है. कई NGO और किसान समूह देसी किस्मों को बचाने में लगे हैं. कुछ जगह मिलट यानी मोटे अनाज की वापसी ने देसी बीजों को नया जीवन दिया है.
सरकार ने भी “श्री अन्न” के नाम पर मोटे अनाज को प्रमोट किया, जिससे कुछ पारंपरिक खेती को बढ़ावा मिला. लेकिन यह लड़ाई अभी बहुत छोटी है. क्योंकि बाजार की ताकत बहुत बड़ी है.
खेती में biodiversity क्यों राष्ट्रीय सुरक्षा जैसा मुद्दा है?
आज दुनिया में युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं होते. युद्ध सप्लाई चेन पर भी होते हैं. अगर किसी देश की खेती कुछ कंपनियों और कुछ किस्मों पर निर्भर हो जाए, तो वह देश कमजोर हो जाता है.
आप कोविड के समय देख चुके हैं कि सप्लाई चेन टूटते ही बाजार कैसे हिल गया था. अब सोचिए, अगर किसी कारण से बीज सप्लाई बाधित हो जाए. या कोई बीमारी किसी खास किस्म को तबाह कर दे. तो पूरे देश की फसल प्रभावित हो सकती है.
इसलिए बीजों की विविधता को कई विशेषज्ञ “इंश्योरेंस पॉलिसी” मानते हैं.
आने वाले समय में क्या हो सकता है? भविष्य का संभावित सीन
क्लाइमेट चेंज के साथ भारत में अनिश्चित मौसम बढ़ेगा. कहीं सूखा, कहीं बाढ़, कहीं गर्मी की लहर. ऐसे में खेती को ज्यादा resilient बनाना होगा. अगर देसी किस्में बचीं, तो किसान के पास विकल्प होंगे. अगर देसी किस्में खत्म हो गईं, तो किसान एक पतली पाइपलाइन में फंस जाएगा.
और अगर कंपनियां उस पाइपलाइन की गेटकीपर बन गईं, तो खेती पूरी तरह कॉरपोरेट शर्तों पर चलेगी. इसका मतलब यह नहीं कि खेती खत्म हो जाएगी. खेती चलेगी. लेकिन किसान का हिस्सा घट सकता है और जोखिम बढ़ सकता है.
और जब किसान संकट में होगा, तो गांव से शहर पलायन बढ़ेगा. इससे शहरी बेरोजगारी बढ़ेगी. और सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी. यानी बीज की कहानी सिर्फ खेत की नहीं, देश की सामाजिक स्थिरता की कहानी है.
सरकार को क्या करना चाहिए? नीति स्तर पर समाधान
यहां सरकार को सिर्फ सब्सिडी और MSP से आगे जाकर सोचना होगा. सरकार को देसी बीजों के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर सीड बैंक बनाने होंगे. हर जिले में कम्युनिटी सीड बैंक की संरचना होनी चाहिए.
कृषि विश्वविद्यालयों और ICAR जैसी संस्थाओं को सिर्फ नई किस्में बनाने पर नहीं, पुरानी किस्में बचाने पर भी उतना ही निवेश करना चाहिए. सरकारी बीज निगमों की विश्वसनीयता बढ़ानी होगी ताकि किसान को भरोसा मिले कि सरकारी बीज समय पर और सही गुणवत्ता में मिलेगा.
और सबसे जरूरी बात, नीति को यह मानना होगा कि सीड डायवर्सिटी एक public asset है, सिर्फ बाजार की कमोडिटी नहीं.
कंपनियों के लिए क्या सीमा होनी चाहिए?
कंपनियों का कृषि में होना गलत नहीं है. लेकिन उन्हें एकाधिकार की तरफ जाने से रोकना जरूरी है. किसी भी बाजार में जब मोनोपॉली बनती है, तो कीमतें बढ़ती हैं और उपभोक्ता का नुकसान होता है. खेती में उपभोक्ता किसान है.
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सीड मार्केट में कॉम्पिटीशन रहे. और देसी बीजों का इकोसिस्टम मजबूत रहे. यानी कंपनियों को रोकना नहीं, संतुलन बनाना जरूरी है.
किसान क्या कर सकते हैं? जमीन पर व्यावहारिक सलाह
किसान के लिए सबसे पहली सलाह यह है कि हर साल कुछ हिस्सा देसी बीजों को बचाने की कोशिश करें. भले ही पूरा खेत हाइब्रिड से बो रहे हों, लेकिन कुछ हिस्सा देसी किस्म के लिए रखें.
दूसरी सलाह यह है कि गांव स्तर पर सीड एक्सचेंज की परंपरा को फिर से जिंदा करें. यह काम किसान समूह और सहकारी समितियां कर सकती हैं. तीसरी सलाह यह है कि खेती में विविधता रखें. सिर्फ एक फसल पर निर्भरता जोखिम बढ़ाती है.
चौथी सलाह, किसान को अपने इलाके के कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग से संपर्क रखकर यह पूछना चाहिए कि देसी किस्मों के प्रमाणित विकल्प कहां मिल सकते हैं.
और सबसे जरूरी सलाह यह है कि खेती को सिर्फ पैदावार के खेल की तरह न देखें. खेती को लागत और जोखिम के गणित की तरह देखें. क्योंकि ज्यादा उत्पादन हमेशा ज्यादा मुनाफा नहीं होता.
आम आदमी क्या कर सकता है? शहर वालों के लिए भी रोल है
आप सोचेंगे कि शहर का आदमी बीज बचाने में क्या करेगा. लेकिन शहर का उपभोक्ता अगर सिर्फ चमकदार और यूनिफॉर्म सब्जी खरीदता रहेगा, तो किसान बाजार के दबाव में वही उगाएगा जो कंपनियां चाहती हैं.
अगर उपभोक्ता स्थानीय, मौसमी और पारंपरिक किस्मों को प्राथमिकता देगा, तो बाजार में मांग बनेगी. और मांग बनेगी तो किसान भी देसी किस्मों की तरफ लौटेगा.
यानी आपकी थाली भी सीड डायवर्सिटी का चुनाव करती है.
इसके अलावा शहरी मध्यम वर्ग को यह समझना चाहिए कि फूड इनफ्लेशन सिर्फ सरकार की नाकामी नहीं, खेती की सप्लाई चेन का संकट भी है. और बीजों को लेकर निर्भरता उसी संकट की जड़ में है.
असली कहानी क्या है?
बीज की लड़ाई असल में खेती की ओनरशिप की लड़ाई है. भारत में किसान पहले अपने संसाधनों का मालिक था. अब वह धीरे धीरे इनपुट बायर बनता जा रहा है. खेती में जमीन उसके पास है, लेकिन नियंत्रण उसके हाथ से फिसल रहा है.
और जब नियंत्रण फिसलता है, तो किसान का आत्मविश्वास टूटता है. फिर वह खेती को जोखिम मानने लगता है. यही कारण है कि गांव के युवा खेती छोड़कर शहर भागते हैं.
बीज का संकट सिर्फ खेती का संकट नहीं. यह गांव के भविष्य का संकट है.
और यही वजह है कि यह मुद्दा आज जितना कृषि नीति का है, उतना ही सामाजिक नीति का भी है.
बीज बचा तो देश बचा, बीज गया तो खेती उधार की हो जाएगी
भारत की खेती आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उत्पादन कितना बढ़ेगा. सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसान का नियंत्रण कितना बचेगा. अगर देसी बीज खत्म होते गए, तो खेती एक बंद सिस्टम बन जाएगी. जहां किसान हर सीजन बाजार से शुरुआत करेगा. और बाजार का मतलब होगा कीमतों की अनिश्चितता, कर्ज का बढ़ना और जोखिम का बढ़ना.
कंपनियां जरूरी हैं, टेक्नोलॉजी जरूरी है, लेकिन खेती का भविष्य सिर्फ कॉरपोरेट बीजों पर टिक गया तो यह देश के लिए वैसा ही खतरा होगा जैसा बिजली के लिए सिर्फ एक कंपनी पर निर्भर होना.
बीजों की विविधता भारत की कृषि बीमा पॉलिसी है. इसे बचाना किसान की मजबूरी नहीं, सरकार की जिम्मेदारी और समाज की जरूरत है. क्योंकि आज अगर बीज उधार का हो गया, तो कल आपकी थाली भी उधार की हो जाएगी. और तब यह संकट सिर्फ गांव में नहीं रहेगा. यह पूरे देश के घरों में दस्तक देगा.
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