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नीतीश के बिहार में उस शिक्षक को पुलिस ने पीटा, जिन्होंने एक गांव की तरक्की के लिए जीवन खपा दिया

लॉकडाउन के नियमों का पालन करने के बावजूद उनके साथ घटना हुई.

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बिहार के सीवान ज़िले का पंजवार आदर्श ग्राम में आता है. पिछले कई दशकों में गांव ने खूब तरक्की की है और गांव वाले इसका श्रेय घनश्याम शुक्ल (तस्वीर) को देते हैं. फोटो: The Lallantop
बिहार. नीतीश कुमार के कथित 'सुशासन' वाला राज्य. नालंदा वाला राज्य, जहां से चाणक्य निकले. चाणक्य शिक्षक थे. उनका अपमान हुआ था. अब यहां फिर एक शिक्षक का अपमान हुआ है. एक बुजुर्ग शिक्षक, जिसने एक गांव की तरक्की के लिए जीवन खपा दिया.
सीवान ज़िले का पंजवार गांव. इन दिनों कोरोना वायरस का हॉट स्पॉट बना हुआ है. यहां पिछले दिनों गांव के एक सम्मानित बुजुर्ग शिक्षक को लॉकडाउन के दौरान पुलिस ने पीटा. एक दिन में दो बार. वो शिक्षक, जिन्होंने गांव में कई संस्थाएं, स्कूल-कॉलेज खुलवाए. जिन्हें गांववाले 'गुरुजी' या 'मास्टर साहब' कहते हैं. नाम घनश्याम शुक्ल
. उम्र करीब 72 साल. लॉकडाउन के दौरान वो गांववालों की मदद में जुटे हैं. उस दौरान भी वो मदद ही कर रहे थे, जब ये घटना हुई. स्थानीय पुलिस-प्रशासन ने इस घटना के बाद माफी मांगी है. हालांकि गांव के कई लोगों में पुलिस को लेकर आक्रोश है, क्योंकि घटना को हुए कई दिन बीत गए और अब पूरी बात पता चली है.
रिपोर्ट के मुताबिक, घटना 12 अप्रैल की है. गांव के निवासी और 'आखर' संस्था से जुड़े संजय सिंह ने 'दी लल्लनटॉप' को बताया,
11 अप्रैल को एक बूढ़ी महिला गांव में भटक रही थी. उसकी मानसिक स्थिति सही नहीं लग रही थी. गुरुजी प्रभा प्रकाश डिग्री कॉलेज में अकले रहते हैं. उन्होंने महिला को देखा, तो उसे कुछ खाने को दिया और पानी पिलाया. उन्होंने कहा कि घर पर चलकर आराम कर लो. अगले दिन 12 अप्रैल को वो कॉलेज से आकर महिला को आगे छोड़ने निकले. तभी रास्ते में बिहार मिलिट्री पुलिस (BMP) ने उन पर लाठियां बरसाईं, जिससे उन्हें चोट आईं और खून निकलने लगा.
दी लल्लनटॉप चुनाव यात्रा के दौरान घनश्याम शुक्ल से हमने बात की थी. वो बातचीत आप स्टोरी के नीचे देख सकते हैं. फोटो: The Lallantop
दी लल्लनटॉप चुनाव यात्रा के दौरान घनश्याम शुक्ल से हमने बात की थी. वो बातचीत आप स्टोरी के नीचे देख सकते हैं. फोटो: The Lallantop

'दूसरी बार दूध लेने गए, फिर पीटा गया'
गांववालों का कहना है कि गुरुजी ने ये बात छिपाकर रखी. संजय सिंह आगे बताते हैं,
उसी दिन कुछ घंटों के अंतराल पर वो दूध लेने निकले. लॉकडाउन की सारी शर्तों के साथ. सोशल डिस्टेंसिंग और मुंह पर गमछा लपेटकर. रास्ते में स्थानीय पुलिस ने उन्हें रोक लिया. गुरुजी ने अपने बारे में बताया, लेकिन फिर डंडे चले.
उनका आरोप है कि कोरोना वायरस के चलते पंजवार गांव 4 अप्रैल को सील किया गया, लेकिन 10 दिनों तक होम डिलीवरी नहीं हुई. ऐसे में दूध लेने के लिए तो आदमी निकलेगा ही. उनका कहना है कि लॉकडाउन के सारे नियमों का पालन करने के बावजूद एक बूढ़े शिक्षक को क्यों पीटा गया?
कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज, जिसे घनश्याम शुक्ल ने शुरू किया. फोटो: The Lallantop
कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज, जिसे घनश्याम शुक्ल ने शुरू किया. फोटो: The Lallantop

पुलिस का क्या कहना है
पंजवार गांव रघुनाथपुर थाने के अंतर्गत आता है. थाने के SHO मनोज प्रभाकर ने 'दी लल्लनटॉप' को बताया,
सूचना मिली थी कि कई लोग गांव से भाग रहे हैं. वहां के पोस्ट पर BMP का एक गार्ड था. उसे पता चला कि दो व्यक्ति जा रहे हैं. वो घनश्याम शुक्ल को पहचानता नहीं था. पुलिस को भी उनके बारे में जानकारी नहीं थी कि वो गांव के इतने सम्मानित व्यक्ति हैं. बाद में जब पता चला, तो मैंने व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनसे माफी मांगी. आत्म-ग्लानि भी हुई. हमें लगा कि ये ग़लत हुआ है.
गांव में मैरी कॉम स्पोर्ट्स एकैडमी है. यहां हॉकी खेलने वाली लड़कियां. फोटो: The Lallantop
गांव में मैरी कॉम स्पोर्ट्स एकैडमी है. यहां हॉकी खेलने वाली लड़कियां. फोटो: The Lallantop

मैंने उन्हें माफ कर दिया है: घनश्याम शुक्ल
बाद में पुलिस ने घनश्याम शुक्ल के लिए पास जारी किया. हमने घनश्याम शुक्ल से संपर्क किया. उन्होंने पहले तो कहा कि लॉकडाउन में लोगों के लिए सामान पहुंचाने का काम कर रहे हैं. थोड़ा-सा समय मांगने पर उन्होंने घटना बताई.
घनश्याम शुक्ल ने कहा,
मैं कॉलेज में बैठा हुआ था. मैंने देखा एक महिला गिरीं और पानी मांगने लगीं. बाद में मैं उन्हें रास्ता बताने ले जा रहा था, तभी बीएमपी वालों ने रोक लिया और मारा. घाव हो गया. खून बहा. मैंने गांव में ये किसी से नहीं बताया.
दूध लेने निकला, तो थानेदार खड़े थे. फिर पैरों पर लाठियां मारीं. मैं सत्याग्रह के लिए तैयार था कि अब आप हमारी हत्या ही कर दीजिए. लेकिन क्वारंटीन वाले लोगों को मदद की ज़रूरत थी. इसलिए मैं पीछे हटा. मैंने उन लोगों को माफ कर दिया है. अब काम कर रहा हूं. मुझे बुरी तरह चोट आई. बाद में थानेदार ने आकर माफी मांगी. भावुक हो गए.
घनश्याम शुक्ल कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता क्वारंटीन किए गए लोगों की मदद करना है इसलिए मैंने ये बात ज़्यादा नहीं बताई. फोटो: संजय सिंह
घनश्याम शुक्ल कहते हैं कि उनकी प्राथमिकता क्वारंटीन किए गए लोगों की मदद करना है इसलिए मैंने ये बात ज़्यादा नहीं बताई. फोटो: संजय सिंह

घनश्याम शुक्ल के बारे में
पंजवार गांव ने बीते कुछ दशकों में काफी तरक्की की है. गांववाले इसका श्रेय घनश्याम शुक्ल को देते हैं. उन्होंने पंजवार में तमाम संस्थाएं खोलने के लिए मेहनत की. अपने दम पर. लड़कियों की पढ़ाई के लिए 80 के दशक में गर्ल्स हाई स्कूल खुलवाया. अपने पैसे जोड़-जोड़कर. अब वो बढ़कर कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज हो गया है. रजिस्ट्रेशन के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गए. उन्होंने यहां बिस्मिल्लाह खान संगीत विद्यालय, भोजपुरी साहित्य-संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए 'आखर' संस्थान, लड़कियों के लिए मैरीकॉम स्पोर्ट्स एकेडमी जैसी संस्थाएं खड़ी करने में पसीना बहाया.
पंजवार आदर्श गांव होने के बावजूद इस समय ये गांव कोरोना का हॉट स्पॉट बन गया है. 23 मामले सामने आ चुके है. इसे सील कर दिया गया था. यहां कोरोना का पहला मामला 3 अप्रैल को सामने आया था. दो लोग खाड़ी देशों से लौटे थे, जिनमें से एक पॉजिटिव पाया गया.



सीवान के पंजवार जैसा गांव आपने बिहार में देखा नहीं होगा 

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