27 जून 2008. तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल अपने मध्यप्रदेश दौरे पर थीं. इंदौर पहुंचने के साथ ही उन्होंने अपने एक ताबेदार को बापट चौक जाकर एक आदमी को बुला लाने का हुक्म दिया. महामहिम के आदेश के कुछ ही समय बाद वो आदमी उनके कमरे में था. नाम उदय देखमुख उर्फ़ भय्यूजी महाराज. कहते हैं कि भय्यूजी महाराज ने ही उनके राष्ट्रपति बनने की भविष्यवाणी की थी. उस समय प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति थीं और प्रोटोकॉल के चलते उन्होंने भय्यूजी के आश्रम जाने के बजाए उन्हें मिलने के लिए बुला लिया था. यह 2008 की बात है. उस समय तक उनकी ख्याति महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती इलाकों तक सिमटी हुई थी. भय्यूजी को राष्ट्रीय पहचान मिली 2011 में.
भय्यूजी महाराज कैसे बने राजनेताओं के चहेते आध्यात्मिक गुरु?
कई सूबों के मुख्यमंत्री भय्यूजी के भक्त हुआ करते थे.


अगस्त 2011. सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे जन लोकपाल बिल पास करवाने के लिए दिल्ली में आन्दोलन कर रहे थे. 16 अगस्त को उन्होंने जन लोकपाल बिल पास ना होने तक आमरण अनशन का एलान कर दिया. अन्ना के अनशन का हर बीतता दिन सरकार की विश्वसनीयता को जनता की नज़रों में खत्म कर रहा था. कांग्रेस ने इस संकट से उबरने के लिए अपने सबसे अनुभवी संकटमोचक प्रणब मुखर्जी को मैदान में उतारा हुआ था. मुखर्जी सियासी सौदेबाजी के मास्टर माने जाते थे. मुखर्जी के लिए टीम अन्ना से डील करना पेचीदा साबित हो रहा था. इधर अन्ना के अनशन को एक सप्ताह होने को था. भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी यूपीए सरकार के लिए इससे बुरी स्थिति नहीं हो सकती थी. आखिर टीम अन्ना से अनबन के बाद प्रणब मुखर्जी को अपने पैर पीछे खींचने पड़े. उनकी जगह कमान सौंपी गई विलासराव देशमुख को.

अन्ना हजारे के साथ भय्यूजी महाराज
विलासराव देशमुख अन्ना हजारे की तरह महाराष्ट्र से आते थे. उनके अन्ना के साथ व्यक्तिगत संबंध काफी अच्छे बताए जाते थे. उन्होंने अन्ना हजारे को मनाने के प्रयास किए लेकिन अन्ना अपनी मांग पर अड़े रहे. आखिरकार विलासराव देशमुख ने अपना तुरुप का पत्ता चल दिया. उन्होंने इंदौर से भय्यूजी महाराज को दिल्ली बुला लिया. देशमुख और भय्यूजी महाराज का संबंध एक दशक से ज्यादा पुराना था. 2000 के साल में वो भय्यूजी महाराज के आश्रम के पहले वीवीआईपी विजिटर थे. तब से दोनों के बीच करीबी संबंध थे.
इधर अन्ना हजारे और भय्यूजी के बीच के ताल्लुकात भी एक दशक पुराने थे. 2000 के साल में भय्यूजी की संस्था सूर्योदय मिशन ने पारनेर में गरीब लड़कियों का सामूहिक विवाह करवाया था. अन्ना हाजरे भी इस आयोजन में पहुंचे थे. दोनों के बीच यहां से शुरू हुए संबंध वक्त के साथ और प्रगाढ़ होते चले गए. 2010 की गुरू पूर्णिमा को भय्यूजी महाराज ने अन्ना हजारे को इंदौर बुलवाया था. यहां अन्ना हजारे को 'सूर्योदय मानवता सेवा पुरस्कार' दिया गया. इस मौके पर अन्ना हजारे ने कहा था कि उन्हें कई बार लोगों ने सम्मानित करने के लिए बुलाया लेकिन सम्मान देने वाले लोगों या संस्थाओं के संदेहास्पद होने की वजह से उन्होंने किसी भी किस्म का सम्मान ग्रहण नहीं किया. वो भय्यूजी के चरित्र के बारे में निश्चिंत हैं, इसलिए वो उनकी संस्था द्वारा दिए जा रहे सम्मान को ग्रहण कर रहे हैं.
अन्ना हजारे और भय्यूजी के बीच की यह करीबी विलासराव देशमुख के लिए बहुत मददगार साबित हुई. उन्होंने भय्यूजी के मार्फ़त अन्ना को अनशन तोड़ने के लिए मना लिया. आखिरकार 28 अगस्त, 2011 को अन्ना हजारे ने अपना 12 दिन लम्बा अनशन खत्म किया. भय्यूजी महाराज अन्ना और सरकार के बीच मध्यस्थता करने के चलते राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए थे.

सितंबर 2011 में नरेंद्र मोदी ने सद्भावना उपवास किया. तब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे. व्रत खुलवाने के लिए कई संतों को बुलाया गया. न्योता पाने वालों में भैय्यूजी भी शामिल थे.
सितम्बर 2011. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूबे में सद्भावना का माहौल खड़ा करने के लिए तीन दिन के सद्भावना उपवास की घोषणा की थी. यह उपवास 17 सितंबर, 2011 को मोदी के 61वें जन्मदिन के दिन शुरू होना था. 19 सितम्बर को साबरमती आश्रम के सामने इस उपवास का भव्य समापन होना था. बीजेपी के आला नेता इस मौके पर अहमदाबाद पहुंचे हुए थे. अगले दिन के अखबारों में नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर छपी. इसमें वो सफेद कपड़े पहने हुए एक आदमी के हाथों नीम्बू पानी पी रहे थे. फोटो का कैप्शन था, 'अाध्यात्मिक गुरु भय्यूजी महाराज के हाथों नीम्बू पानी पीकर उपवास तोड़ते नरेंद्र मोदी'.
2011 के साल में भय्यूजी महाराज इंदौर से उठकर राष्ट्रीय सियासत के फलक पर आ गए थे. राजनेताओं, सिने-कलाकरों में वो काफी लोकप्रिय हैं. आशा भोसले, लता मंगेशकर, प्रतिभा पाटिल, विलासराव देशमुख, मोहन भागवत, शिवराज चौहान, आनंदीबेन पटेल जैसे नाम उनके आश्रम की विजिटरबुक में दर्ज हैं. उनके सियासी रसूख को इस तरह समझा जा सकता है कि इसी साल मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया है.
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