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अयोध्या के फैसले में आया निहंग सिख और गुरु गोबिंद सिंह का ज़िक्र

अयोध्या में 1992 के पहले भी सांप्रदायिक घटनाएं हुई थीं, कोर्ट ने उन पर क्या कहा?

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अयोध्या, फैसले वाली जमीन को जाने का रास्ता | India Today
इतिहासकारों के हवाले से हमें 1855 में जो कुछ हुआ, उसके बारे में पता है. नवाबों का शासन था. कुछ मुसलमानों के बाबरी मस्जिद पर जमा होकर हनुमानगढ़ी मंदिर पर क़ब्ज़े का ज़िक्र आता है. उनका दावा था कि वहां मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाया गया था. बदले में हिंदू वैरागियों के पलटवार और खून-खराबे के ज़िक्र आते हैं.
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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ज़िक्र 1856-57 के एक दंगे का भी आया. ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर बताया गया कि इसकी आग हनुमानगढ़ी और बाबरी मस्जिद तक फिर पहुंची. अब तक हिंदू और मुसलमान दोनों पूजापाठ के लिए इस जगह का इस्तेमाल करते थे. जब विवाद हुआ तो मस्जिद के बाहर रेलिंग लगा दी गई. उस बंटवारे का मकसद ये तय करना नहीं था कि किसके अधिकार में कौन सी जगह आती है, रेलिंग बस मौके पर शांति बनाए रखने के लिए लगाई गई थी.
इस बात के सबूत और जड़ 28 नवंबर, 1858 को अवध के थानेदार शीतल दुबे की रिपोर्ट में मिलते हैं. जिसमें एक निहंग सिख का ज़िक्र आया. लिखा गया कि 'पंजाब के निहंग सिख फ़कीर खालसा ने हवन किया और गुरु गोबिंद सिंह की पूजा की. साथ ही मस्जिद परिसर में श्री भगवान के प्रतीक का निर्माण किया, मौके पर 25 सिख भी सुरक्षा के लिए मौजूद थे.'
Nihang Singh
थानेदार शीतल दुबे की रिपोर्ट

बाद के कागजातों से ये जानकारी मिलती है कि जब निहंग सिंह फकीर को समन किया गया तो उसने हर जगह के निरंकार से जुड़े होने जैसी बातें कही थीं.
सैय्यद मोहम्मद खातीब मस्जिद के मुअज्जिम थे. उनकी अर्जी का ज़िक्र आया. अर्जी में लिखा था कि मेहराब और इमाम के खड़े होने की जगह के पास चबूतरा बनाया गया. उस पर प्रतिमा की तस्वीर बिठाई गई. एक गड्ढ़ा बनाकर मुंडेर को पक्का किया गया. आग जलाकर पूजा और हवन शुरू कर दिया गया. पूरी मस्जिद में कोयले से राम-राम लिख दिया गया.
Syed Mohammad Khateeb मस्जिद के मुअज्ज़िम की अर्जी का हिस्सा  

इसी अर्जी में फिर वैरागियों का ज़िक्र भी आया, जिन्होंने चबूतरे को बड़ा करने का काम किया था. शहर कोतवाल से मौके पर आने, निर्माण को गिराने, हिंदुओं को बाहर निकालने, प्रतीकों को हटाने और दीवारों को साफ़ करने की बात कही गई थी.
2010 में आए इलाहाबाद कोर्ट के फैसले में 1856-57 की रेलिंग का ज़िक्र आता है. साथ ही इस चबूतरे का भी. जिसे हिंदू राम चबूतरा कहने लगे.
इसके बाद की सांप्रदायिक घटना के तार साल 1934 से जुड़े हैं. 1934 में बक़रीद का समय था. इलाके के किसी गांव में गोकशी को लेकर दंगे हुए. बाबरी मस्जिद को भी नुकसान पहुंचा, बाद में ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत करवाई. जिसकी जानकारी पीडब्ल्यूडी के दस्तावेजों में है. कोर्ट के फैसले में सरकारी रिकार्ड्स का विस्तार से ज़िक्र किया गया है. जिनके आधार पर ये स्थापित्त होता है कि 1992 के पहले भी अयोध्या में हिंसा भड़क चुकी थी.

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