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बिहार के गांव की इस महिला को मिला तो पद्मश्री ने भी इज्जत कमाई है

बउआ देवी, जिनकी पेंटिंग विदेशों में भी पहचानी जाती हैं, लेकिन खुद उन्हें विदेश पसंद नहीं आता.

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फोटो - thelallantop
दिल्ली के किशनगढ़ इलाके में जब मिथिला के लोक कलाकार बउआ देवी से मिलने पहुंचा, गोरख पांडेय की पंक्तियां दिमाग में घूम रही थी: गालिब-मीर की दिल्ली देखी, देख के हम हैरान हुए/उनका शहर लोहे का बना था फूलों से कटता जाए है. संकरी गलियों के बीच बने बउआ देवी के मकान के सामने सबसे पहले नज़र लोहे के दुकान पर पड़ी. कामगार, मजदूर लोहे से खिड़की, ग्रिल बनाने में लगे हैं. बगल में सब्जियों, चाय-अंडे के ठेले लगे हैं. भले ही मिथिला की अमराइयां, ताल-तालाब, हरसिंगार और गेंदे के फूल की क्यारियां यहां नहीं हो, पर मिथिला के लोक का एक रंग ज़रूर दिखता है. बिहार की बोली-वाणी सुनाई पड़ जाती है. पद्मश्री पुरस्कारों के लिए जोड़-तोड़ होता रहा है. और अब यह कोई ख़बर नहीं है. बिना किसी जोड़-तोड़ और शोर के जब बउआ देवी जैसे लोक कलाकारों को इस पुरस्कार से नवाज़ा जाता है तब पुरस्कार की गरिमा बढ़ जाती है. Madhubani सदियों से मिथिला की महिलाएं अरिपन, कोहबर, मछली, सांप, सूर्य, चंद्र आदि दीवारों पर उकेरती रही हैं. पर 1960 के दशक में आए अकाल (1967) ने इस कला को मिथिला से बाहर पहुंचाया. औपचारिक शिक्षा से वंचित और बिना किसी नेटवर्क के गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जैसी कलाकार इसे देश-विदेश लेकर गईं (इन चारों को मिथिला/मधुबनी पेंटिंग में योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया और अब सिर्फ उनकी स्मृति शेष है). गंगा देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जहां कछनी (लाइन) शैली में सिद्धहस्त थीं, वहीं सीता देवी भरनी शैली में. हालांकि बाद के दशकों में दलित कलाकारों के दख़ल से इस शैली में विस्तार आया और गोदना शैली भी इससे जुड़ गई. Madhubani 2 बउआ देवी बताती हैं कि उन्होंने सिर्फ पांचवी तक पढ़ाई की. याद कर वह बताती हैं कि जब अकाल के दौरान पुपुल जयकर और भास्कर कुलकर्णी जितवारपुर आए तब उन्होंने इनकी पेंटिंग देख कर कहा था. ‘लड़की तुम बहुत आगे जाओगी.’ असल में भारत सरकार ने मिथिला क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी) की महिलाओं को कागज पर इन चित्रों को उकेरने को प्रेरित किया ताकि आमदनी के स्रोत के रूप में यह कला विकसित हो सके. बाद के वर्षों में यह कला मिथिला के सामंती समाज में स्त्रियों के लिए आज़ादी और समाजिक न्याय के अवसर लेकर आए.
यह पेंटिंग मिथिला की लोक संस्कृति का हिस्सा है. बउआ देवी कहती हैं कि खुद उन्होंने अपनी दादी, देवकी देवी से इस कला को सीखा था. मधुबनी जिले के राजनगर सिमरी गांव में जन्मी बउआ देवी जब गौने के बाद जितवारपुर आईं तब उनकी कला में निखार आया. इसी गांव की सीता देवी और जगदंबा देवी मिथिला पेंटिंग को वर्षों से साध रही थीं.
पहली बार भास्कर कुलकर्णी ने (70 के दशक में) 14 रुपए में तीन पेंटिंग (बउआ देवी कागद कहती हैं) ख़रीदा था. इसमें उन्होंने शंकर, काली, दुर्गा को उकेरा था. बाद के वर्षो में भी बउआ देवी धार्मिक, मिथक और लोक प्रतीकों के इर्द-गिर्द ही रचती रही. ख़ास कर उनकी पेंटिंग में ‘नाग-नागिन’ का चित्रण अनेक बार होता है. उल्लेखनीय है कि नाग पंचमी मिथिला में धूम-धाम से मनाया जाता है. मिथिला में सावन के महीने में नाग पंचमी से शुरु होकर पंद्रह दिनों तक ‘मधुस्रावनी’ का पर्व नव विवाहिता मनाती हैं. इस दौरान लोक कथाओं का पाठ होता है और विषहारा की पूजा की जाती है. नाग-नागिन की पेंटिंग का जिक्र होने पर वे मैथिली में नागदेवी बिषहारा का मंत्र मुंहजबानी सुनाती हैं. वाल-वसंत का किस्सा सुनाती हैं. modi presented this painting to mayor of Hanover नाग के चित्रण को लेकर ही उन्हें 1985-86 में राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था. फिर इस कला को लेकर वह हासेगेवा, जापान लगातार जाती रही. यूरोप के कई शहरों-लंदन, पेरिस बारसिलोना, स्पेन में भी कला प्रदर्शनी में उन्होंने भाग लिया.
फ्रांस के चर्चित कला समीक्षक विको, जिन्होंने 70 के दशक में ‘द वूमन पेंटर्स ऑफ मिथिला’ नामक किताब लिखा था, का जिक्र करने पर उनके चेहरे पर स्मृति की रेखा उभर आती हैं. वह कहती हैं कि पहली बार पेरिस विको ने ही उन्हें बुलाया था. वह कहती हैं कि पता नहीं अब वे ज़िंदा हैं भी या नहीं.
बउआ देवी कहती हैं कि वह अकेले एक कदम भी शहर में नहीं चल सकती. हम त अतय हेराय जेबै. हम नय तै हिंदी जनैत छी, नय अंग्रेजी. सच पूछि त हमरा विदेश मे बढ़िया कहियो नहिं लागल (मैं तो यहां खो ही जाऊंगी. मैं ना तो हिंदी जानती हूं, ना अंग्रेजी. सच पूछिए तो मुझे विदेश में कभी अच्छा नहीं लगा). अपने बेटे-बेटियों के साथ वह दिल्ली रहती हैं, जो मिथिला पेंटिंग से जुड़े हुए हैं पर जितवारपुर गांव उनसे छूटा नहीं है. वहां आना-जाना लगा रहता है. वह कहती हैं कि जब 12 -13 साल की थी तब से वह ‘लिखिया’ करती रही हैं, पर उनका मन अब भी नहीं भरा है. पर वह जोड़ती हैं ‘अब कलाकार कम और बिजनेसमैन ज्यादा हो गए हैं.’ साथ ही वह बिहार में एक भी मिथिला पेंटिंग के म्यूजियम के नहीं होने का भी जिक्र करती हैं. Baua devi क़रीब 75 वर्ष की बउआ देवी पिछले ही महीने बड़ौदा से सूर्यग्रहण, अर्धनारीश्वर की वृहद पेंटिंग बना कर लौटी हैं.
यह पूछने पर कि कोहबर, भगवती, नाग-नागिन का चित्रण करते हुए उनके मन में क्या उमड़-घुमड़ रहा होता है. वह कहती हैं, “बचपन से सुनती आ रही गीतों, प्रार्थनाओं की पंक्तियां गूंजती रहती हैं.”
शायद Schopenhauer ने पहली बार कहा था. All arts aspire to the condition of music (सभी कला अंतिम परिणति में संगीत हो जाना चाहती है). बउआ देवी के भरनी शैली में बनाए ज्यामितीय आकृतियों में ढले रंग बातें करती प्रतीत होती हैं. ऐसा लगता है किसी संगीत साधक की ध्वनि इनमें रची-बसी हैं. सीता देवी, जगदंबा देवी, गंगा देवी और महासुंदरी देवी के बाद बउआ देवी मिथिला पेंटिंग का पंचम स्वर हैं.
ARVIND-DAS_170216-045146 दी लल्लनटॉप के लिए ये आर्टिकल लिखा है अरविंद दास ने. उन्होंने मीडिया पर 90 के दौर में बाजार के असर पर पीएचडी की है. जेएनयू से. देश विदेश घूमे हैं. खुली समझ के आदमी हैं. पेशे से पत्रकार हैं. करण थापर के साथ जुड़े हैं. जेएनयू की पाठशाला में पढ़े हैं. 

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