पहली लिबरल फेमिनिस्ट्स में से एक
रमाबाई को हिंदुस्तान की पहली लिबरल फेमिनिस्ट्स में गिना जाता है. चितपावन ब्राह्मण परिवार में जन्मीं रमा ने संस्कृत की पढ़ाई की. बचपन में ही मां-बाप को अकाल में खो दिया. इसके बाद वो भाई के साथ पूरे देश में घूमती और पुराण की कथाएं सुनाकर काम चलाती रहीं. बताया जाता है कि रमा ने 3 साल में 4,000 किलोमीटर की यात्रा की. 22 की उम्र आते-आते रमा को संस्कृत के बीस हज़ार श्लोक रटे हुए थे. कन्नड़, मराठी, बांग्ला और हिब्रू जैसी 7 भाषाएं आती थीं.रमा की पढ़ाई लिखाई के स्तर से बंगाल के विद्वानों में हलचल मच गई. थियोसोफिकल सोसायटी के केशवचंद्र सेन ने उन्हें पंडिता की उपाधि दी. इसी बीच रमा ने बंगाल के एक कायस्थ वकील विपिन बिहारी मेधवी से शादी कर ली. मेधवी की जल्दी ही मृत्यु हो गई. रमा इसके बाद इंग्लैंड गईं और ईसाई बन गईं. जिस दौर में हिंदुस्तान में लड़कियां पढ़ने को तरस रही थीं. रमा ने अंतर्जातीय शादी की, धर्म छोड़ दिया और अपनी पढ़ाई-लिखाई से तमाम लोगों का मुंह बंद कर दिया. इसके बाद ज़्यादातर लोगों ने रमा की आलोचना की. मगर एक जगह से रमा को खुलकर समर्थन मिला, ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले दंपत्ति ने रमाबाई का खुलकर समर्थन किया.
शिक्षा और विधवाओं को लेकर काम
पति की मौत के कुछ साल बाद रमा पूना में बस गईं. यहां उन्होंने ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना की और लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया. ये संस्था बाल विवाह रोकने के लिए भी काम करती थी. 1882 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में शिक्षा के लिए एक कमीशन बनाया तो रमा ने उसके सामने कई सबूत रखे. उन्होंने लॉर्ड रिपन के सामने रिपोर्ट दी,“इस देश में 100 में से 99 पढ़े लिखे पुरुष स्त्री शिक्षा और उसे बराबरी का दर्जा देने से कतराते हैं. पढ़ी लिखी महिलाओं की छोटी सी गलती को बहुत बड़ा बनाकर उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है. हिंदुस्तान को सुधारना है तो महिला टीचर और डॉक्टर्स की गिनती बढ़ानी पड़ेगी.”रमा के ये सुझाव महारानी विक्टोरिया तक पहुंचे. महारानी ने रमा को ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि दी. रमा के सुझावों को अमल में लाते हुए लॉर्ड डफरिन के समय में महिलाओं की मेडिकल शिक्षा पर खास ध्यान दिया गया. और 1886 में आनंदीबेन जोशी पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनीं. डॉ. जोशी की इसके 6 महीने बाद ही मृत्यु हो गई.
रमा ने शारदा सदन की मुखिया के तौर पर महाराष्ट्र में काफी काम किया. कर्नाटक के गुलबर्गा में एक स्कूल खोला. 1922 में मृत्यु तक वे तमाम आलोचनाओं के बाद भी वो विधवाओं के उत्थान के लिए काम करती रहीं.

अपनी बेटी के साथ रमाबाई
हिंदू धर्म की आलोचना और विवेकानंद से विवाद
रमा ने अपने ब्रिटेन प्रवास में एक किताब लिखी, 'द हाई कास्ट हिंदू विमेन’. इस किताब में एक हिंदू महिला होने के बुरे परिणामों की बात की गई थी. बाल विवाह, सती प्रथा, जाति और ऐसे तमाम मुद्दों पर लिखा गया था.वो अमेरिका गईं और वहां लेक्चर देना शुरु किया. वो रमाबाई एसोसिएशन के लिए फंड भी जमा कर रही थीं. ये करीब-करीब वही समय था जब स्वामी विवेकानंद भी हिंदू धर्म के महान पक्ष को दिखाते हुए अमेरिका में लेक्चर दे रहे थे. ऐसे में दोनों के बीच में टकराव होना तय था.
1893 में जब विवेकानंद ने शिकागो में ऐतिहासिक भाषण दिया तो रमाबाई ने लिखा,
”मैं अपनी पश्चिम की बहनों से गुज़ारिश करती हूं कि बाहरी खूबसूरती से संतुष्ट न हों. महान दर्शन की बाहरी खूबसूरती, पढ़े-लिखे पुरुषों के बौद्धिक विमर्श और भव्य प्राचीन प्रतीकों के नीचे काली गहरी कोठरिया हैं. इनमें तमाम महिलाओं और नीची जातियों का शोषण चलता रहता है.”इसके कुछ समय बाद विवेकानंद ने अपने एक पत्र में लिखा.
आज अगर हम देखें तो दोनों अपनी जगह ठीक थे. दोनों की बातें अपनी जगह ठीक थीं और दोनों के विरोध भी अपनी जगह ठीक थे. रमाबाई ने महिलाओं से जुड़े जो मुद्दे तब उठाए वो आज भी उतने प्रासंगिक है. वही विवेकानंद धर्म को जिस तरह से समझा रहे थे वो अपनी जगह पर सही था.“मिसेस बुल,
मैं उन स्कैंडल्स के बारे में सुनकर भौंचक्का हूं जिनमें रमाबाई का सर्कल मुझे शामिल कर रहा है. कोई भी आदमी अपनी तरफ से कितना भी कोशिश कर ले मगर कुछ लोग उसके बारे में खराब बोलते ही हैं. शिकागो में मुझे रोज़ कुछ न कुछ ऐसा सुनने को मिलता है. ये औरतें तो ईसाइयों से भी ज़्यादा ईसाई हैं.”
दुनिया भर में तारीफ
रमाबाई के काम को पूरी दुनिया में तारीफ मिली. उनके नाम पर शुक्र ग्रह के एक क्रेटर का नाम रखा गया है. यूरोप के चर्च 5 अप्रैल को उनकी याद में फीस्ट डे के तौर पर मनाते हैं. भारत सरकार ने भी रमाबाई के नाम पर एक डाक टिकट जारी किया है. उनका बनाया पंडिता रमाबाई मुक्ति मिशन आज भी सक्रिय है. इन सबके बाद भी लगता है कि रमा बाई को हिंदुस्तान में वो पहचान नहीं मिली है जो उनके समकालीन समाजसुधारकों को मिली है.ये भी पढ़ें :
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