हम उस पीढ़ी से आये हैं जिनके लिए बच्चियां, लड़कियां या औरतें हौव्वा नहीं थीं. मतलब हमारे लिए आप थीं हमेशा से. बगल वाली बेंच पर नर्सरी में हमारे साथ ही टिफ़िन खाया करती थीं. सुंदर से टिफ़िन वाली वो बच्चियां कभी हौव्वा नहीं लगीं. हम हाफ पैंट पहनकर जाते वो ट्यूनिक. तब सर लोगों से ज्यादा मैम की क्लास होती थीं. अच्छी होती थीं उनको सब आता था. डांटती भी कम थीं. कभी-कभी मैम की जगह मम्मी निकल जाता. एक जैसी ही तो होती थीं. पूरी क्लास हंसती मैम मुस्कुरा देतीं.इसलिए हम तो कभी ये सोच ही नहीं सकते कि औरतें बस घर में बैठने को हैं. फिर बड़े हुए हमारी पैंट लम्बी हुई सुंदर टिफिन वाली लड़कियां स्कर्ट में आ गईं. अब भी वो टिफ़िन खातीं. जब वो टिफ़िन खातीं. हम मोज़े की गेंद से कहीं गिप्पी-गेंद खेल रहे होते. हम ये कतई नहीं कह रहे कि वो खेलती नहीं थीं. फर्क बस ये पड़ा था कि अब उनके सामने मार पड़ जाती तो इन्सल्ट ज्यादा महसूस होती. भूले जा रहे थे. महिला दिवस की शुभकामनाएं. ये महिला दिवस. गजब दिन है सच में. मतलब ठीक है. होना चाहिए औरतों के लिए भी एक दिन. जनरल नॉलेज का एक जवाब ही तैयार हो जाता है. फेसबुक पर कैची अपडेट्स आते हैं. दुनिया बाकी दिनों में चाहे जैसी हो उस दिन बस दो खेमे में बंटी नजर आती है. एक वो जिन्हें लगता है कि हर साल लड़कियां टॉप भी सिर्फ इसलिए कर जाती हैं क्योंकि कॉपीज मैम चेक करती हैं. लड़कियों को ज्यादा नम्बर दे डालती हैं. इनका बस चले तो दुनिया भर की बच्चियों, लड़कियों, औरतों को सात तहखानों के नीचे बंदकर आएं. इन्हें लड़कियों के हंसने-बोलने, पढ़ने-लिखने, सीखने-समझने, तरक्की करने और सबसे ज्यादा फैसले लेने से भी दिक्कत होती है. दूसरे वो जिनके लिए महिला सशक्तिकरण का मतलब औरतों के एक हाथ में बोतल और दूसरे में सिगरेट है. इनके अनुसार दुनिया की सारी औरतें तब तक सशक्त नहीं हैं. जब तक लड़कों जैसे खुले में सिगरेट नहीं पीतीं. बिन ब्याही मां नहीं बनतीं. दस-दस बॉयफ्रेंड्स नहीं बनातीं. ऐसा समझिए कि औरतें अपने फैसले लेने को आजाद हैं, जब वो इनके कहे अनुसार अपने फैसले लेने लगें. ऐसे लोगों को 'नारीविवादी' कहते हैं. उनको कोई समझाने नहीं जाएगा. ये घोर निजी फैसले हैं. हर किसी के लिए अलग-अलग.
हम डिप्लोमैटिक नहीं होना चाहते. पर सब जानते हैं निकोटिन सबके लिए खराब होती है. बाकी दारू-बीड़ी या गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड कोई बड़ी बात नहीं है और सशक्तिकरण का पर्याय तो कतई नहीं. हर किसी के दिमाग में अपनी कहानी चल रही है. यकीन मानिए आपके सिवा किसी को फर्क नहीं पड़ता आप कितनी पी सकती हैं या आपके कितने बॉयफ्रेंड हैं. लड़ना अच्छी बात है पर परछाई से नहीं. बॉयफ्रेंड होना, न होना तो बहुत पर्सनल बात है न. फिर और कोई तय करेगा? हंसी आती है!बुरा लगता है जब पूरे समूह में लपेटकर हमें भी लंपट-ठरकी या बलात्कारी ठहरा दिया जाता है. उम्मीद की जाती है सिर झुकाकर 'हओ' कह देंगे. कई तो मान भी लेते हैं. ये उनकी चारित्रिक दुर्बलता है. उनके लिए लड़कियों का जींस पहन लेना ही बवाल होता था. पर हम नहीं मानेंगे. हमें स्टैंड लेना आता है. गलत को गलत कहना आता है. घटिया नॉनवेज जोक्स पढ़कर घिन आती है. बीवी वाले जोक्स पर भी. ब्रा की स्ट्रैप देख हमारा कौमार्य भंग नहीं हो जाता. स्लीवलेस टॉप और साढ़े छह इंच की स्कर्ट देख हार्मोंस नहीं फड़फड़ाने लगते. लड़की को लड़के का हाथ पकड़ के जाते देख हमारी पुतलियां चौड़ी नहीं होतीं. हमने हमेशा से अपने आस-पास ये सब देखा है. अब फर्क पड़ना बंद हो गया है. आम बाते हैं ये. जितना आम हमारा होना या आपका होना. हम बड़ी गजब पीढ़ी से आते हैं. हमारे कैनवास वाले जूतों के ऊपर मम्मी के कहने पर बांधा काला धागा होता है. तो महिला दिवस पर ये कि अच्छा है आप लोग हैं हमारे आस-पास. मम्मी-बुआ-मैम-गर्लफ्रेंड-पड़ोसन-सहयात्री-सहकर्मी किसी भी रूप में. बहुत सुन्दर होती हैं आप सब. आपकी हैण्डराइटिंग अच्छी होती है, आप लोग अटेंशन सीकिंग नहीं होती हैं. हम आपकी बराबरी नहीं कर सकते. पर आपको कुछ स्पेशल ट्रीट भी न करेंगे. क्योंकि सच में जरूरत बस इसी की होती है. आप तो समझती हैं. आपके आस-पास की एक पीढ़ी.
वीडियो- ज्योतिबा फुले की किताब 'गुलामगिरी' का वो हिस्सा जो आज के समय में बहुत जरूरी है
























