1. मालविका हरिओम बड़ा रिदम वाला नाम लग रहा है. आपने ये नाम कहां से लिया था?
मालविका मेरा नाम था और बड़ा खाली-खाली सा लगता था. तो मैंने पति का नाम 'हरिओम' ले लिया और अपनी चॉइस से लिया था. https://www.youtube.com/watch?v=8-nZ2AwBLqw2. आपके करियर में आपके पति का क्या रोल था?
हम दोनों जेएनयू में साथ पढ़ते थे और हमारे शौक मिलते-जुलते थे. ईमानदारी से कहूं तो पहले मुझे मौका नहीं मिला था, लेकिन बाद में जब मुझे मौका मिला तो मेरे पति ने मेरा बहुत सपोर्ट किया.3. आप हाउसवाइफ होते हुए अचानक दूरदर्शन पर कैसे आ गईं?
मैं आकाशवाणी की अप्रूव्ड आर्टिस्ट थी. आकाशवाणी के ऑफिस में और यूट्यूब पर दूरदर्शन वालों ने मेरे गाने सुने थे. 'बोल यूपी' के नाम से उनका कार्यक्रम आता था. फोक सिंगिंग के लिए दूरदर्शन वालों ने उस कार्यक्रम में मुझे बुला लिया. फिर उन्होंने मुझसे गजलें गाने के लिए कहा. उनका एक नया प्रोग्राम आ रहा है गजलों के लिए. मैं उसके लिए तैयारी कर रही हूं. गजलें लिख भी रही हूं.
4. आपकी गायकी एक नई विधा है. हम देखते हैं कि आप अपना काम करने और घर संभालने के साथ-साथ गा भी रही हैं. लेकिन आपके अंदर सफलता के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाला एटिट्यूड नहीं दिखता है.
मैं अपने सारे काम करती हूं. बच्चों को स्कूल ले जाना-लाना, कोचिंग ले जाना, किचन के सारे काम करना. ये सब मैं खुद ही करती हूं और बड़ी तसल्ली से करती हूं. वैसे मुझे जब भी मौका मिला तो मैंने गुरुओं से भी सिंगिंग सीखने की पूरी कोशिश की. मुझे उनसे थोड़ा-थोड़ा ही मिला, लेकिन वो मेरे लिए बहुत था. https://www.youtube.com/watch?v=9nqECE2iGdg5. आज-कल वुमन इम्पॉवरमेंट पर 'पिंक' और 'निल बटे सन्नाटा' जैसी फिल्में आ रही हैं, 'नो ब्रा डे' भी मनाया जा रहा है. एक कलाकार की हैसियत से आप खुद को इन सारी चीजों से अलग मानती हैं या इस बारे में कुछ सोचती हैं?
इसमें मेरी दो बातें हैं. एक सामाजिक और दूसरी व्यक्तिगत. सामाजिक बात ये कि हमारे समाज में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिन्हें एजुकेशन से महरूम रहना पड़ा. ऐसे में उन लोगों के लिए इन फिल्मों का कोई बहुत मतलब नहीं है. हम लोग गाने (फोक सिंगिंग) के माध्यम से इन सारी बातों को उन्हें समझा सकते हैं. आप देखेंगे कि समाज के नियमों और पितृसत्ता को स्थापित करने में फोक सिंगिंग का बड़ा हाथ रहा है. तो इसकी मदद से हम नई चीजें भी स्थापित कर सकते हैं. व्यक्तिगत तौर पर मैं बताना चाहूंगी कि ऑफिशियल काम के चलते हमें एक साल यूरोप में रहने का मौका मिला था. हम हॉलैंड में थे. वहां मेरी बेटियां बिना फोन के घूमने निकल जाती थीं. शुरू में थोड़ी फिक्र रहती थी पर दो-तीन महीने में ऐसा हो गया था कि हमें किसी चीज का डर नहीं रह गया था. यहां आने के बाद मेरी बेटियों को अडजस्ट करने में बहुत परेशानी हुई. यहां कपड़ों से लेकर चलने के तरीके पर भी लोग बड़ी जल्दी निगाहें टेढ़ी कर लेते हैं. वहां कोई किसी को नजर उठाकर नहीं देखता था, लेकिन यहां हम हर किसी की नजर के पहरे में रहते हैं. बेशक हमारा देश हमें प्यारा है, लेकिन हमें इन चीजों को बदलने की बहुत जरूरत है.
6. उड़ी हमले और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर हमारे देश में बड़ा खराब माहौल बन गया था. आप खुद एक कलाकार हैं और एक आईएएस की पत्नी हैं. ऐसे में आप इन चीजों को किस तरह देखती हैं?
जैसा मैंने कहा कि हमें हमारा देश बहुत प्यारा है, लेकिन कलाकारों की कौम एक अलग कौम होती है. इसका किसी देश या धर्म से कोई लेना-देना नहीं होता है. मुझे याद है कि लखनऊ के एक कार्यक्रम में मुझे गुलाम अली साहब के ठीक बाद गाने का मौका मिला था और इससे मुझे जो खुशी मिली थी, उसे मैं बयां नहीं कर सकती. मेरी नजर में कला और कलाकारों को राजनीति से अलग रखकर देखना चाहिए.ये भी पढ़ें:














