
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता हैं. लोक में खास दिलचस्पी है, जो आपको यहां देखने को मिलेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे और आपसे रू-ब-रू हो रहे हैं. 'देहातनामा' के जरिए. पेश है इसकी छठी किस्त:


डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता हैं. लोक में खास दिलचस्पी है, जो आपको यहां देखने को मिलेगी. अमरेंद्र हर हफ्ते हमसे और आपसे रू-ब-रू हो रहे हैं. 'देहातनामा' के जरिए. पेश है इसकी छठी किस्त:

एक गिलकटी आम के पेड़ की डाल में लटकी हुई है. गिल्ली (गिलहरी) ने क्या गजब कुतरा है, ललचाऊ! समूचा आम छोड़कर मन इस गिलकटी पर भाग रहा है. तोड़ लेने को. लेकिन दोष मेरा नहीं, इस आम के मौसम का है, जिसने अंधा सा कर दिया है. यानी कि मौसम कामयाब है. जिस गिलकटी को पकड़ने मेरा हाथ बढ़ा है, उसमें एक बर्र पहले से लुभाया हुआ, छककर मज़ा ले रहा है. अंधराया है वो भी!

मेरी उंगली जब उसकी पीठ को दबा बैठी, तब उसे चेत हुई कि अरे अब तो जान पर बन आई है. फनफना उठा. चांपकर छेद दिया उंगली में! आहि रे दैया! छेद दिहिस! पिरितिया जिसका कान इधर ही टंगा रहता है, सुनकर दौड़ी आई. अंधरायी तो ये भी कम नहीं है! इसने झट 'खटौवा' आम निकालकर जमकर रगड़ा उंगली पर. ख़ुद तो मुस्कुराए जा रही है, जबकि मेरी उंगली मुंह फुला रही है. खटाई कितनी जरूरी है. आम की. जीवन में. मीठा आम चाभते हुए इसे कभी नहीं सोचा. लेकिन इस समय सोच रहा हूं.

आम और खट्टापन? खटाई की जरूरत! क्या ख़ूब मजाक करते हैं आप भी, ऐसा कोई भी कह बैठे. मीठेपन की होड़ में लगे हुए ये दशहरी, लंगड़े, चौसे... और जाने क्या-क्या. यहां कोई 'खटौवा' का नाम ले, तो मन कहे कि उसे शहर से मीलों दूर फेंक आएं. फिर उसकी आद-औलाद भी इधर रुख न कर पाए. और वो भी बीजू या देसी, खटौवा. दूर हट, हां नहीं तो.
जिसने सिर्फ़ फल तक ही आम को जाना, जीभ तक ही उसे जानने लायक समझा, उसके लिए आम की दुनिया बहुत छोटी है. मैंगो वाली. मैंगोशेक वाली. ठेले पर सजी. छोटी सी दुनिया को बना लीजिए मीठी सी. बड़ी दुनिया तो एक ही स्वाद से बनती नहीं. मजेदार है आम की खट-मिट्ठी दुनिया. इस दुनिया में सिर्फ़ फल नहीं है. फूल भी है. चाहे तो कह लें 'बौर'. टिकोरा भी. पल्लव भी. डौंगी भी. तना भी. इंसान के साथ-साथ लंबी यात्रा भी. हज़ारों साल की.
आपको आश्चर्य होगा अगर कहूं कि आम मूल रूप से खट्टा फल है. विकास-क्रम में हमारा जीवन धीरे-धीरे एकरस और मिठाकुर होता गया. हमने आम के मीठेपन को इतना 'प्रमोट' किया कि इसका मूल स्वभाव और स्वाद ही धीरे-धीरे हशिये पर जाने लगा. कुछ इस तरह कि आज मीठे फलों में नंबर एक की दौड़ में शामिल है आम. 'आम फिर बौरा गए' में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस तरफ़ बढ़िया संकेत किया है-
'पंडित लोग कहते हैं 'आम्र' शब्द 'अम्र' या 'अम्ल' शब्द का रूपांतर है. 'अम्र' अर्थात् खट्टा. आम शुरू-शुरू में अपनी खटाई के लिए ही प्रसिद्ध था.'

उन्होंने अपना अनुमान भी रखा है-
'मेरा अनुमान है कि आम पहले इतना खट्टा होता था और इसका फल इतना छोटा होता था कि इसके फल को कोई व्यवहार में नहीं लाता था. संभवतः ये भी हिमालय के पार्वत्य देश का जंगली वृक्ष था.'
सूक्ति शैली में आचार्य ने ये भी कहा है-
'आम की मंजरी विधाता का वरदान है, पर आम का फल मनुष्य की बुद्धि का परिणाम है.'
आम का मीठापन कुदरती मेहरबानी नहीं, मनुष्य की दिमागी कारस्तानी है. ये इंसानी कोशिश कई सौ सालों से जारी रही. प्रयोग बहुत पहले से होते रहे. कोई मीठा आम पाया गया, तो उसकी कलम लगा दी गई. ये चलन आम हो गया. धीरे-धीरे सब इसी को पसंद करने लगे. आम के खट्टेपन को भूलने-भुलाने लगे.

जहर को मेटने में खट्टेपन का उपयोग किया जाता है, लेकिन आम का खट्टापन शायद सबसे ज़्यादा भरोसेमंद है. आम के साथ जुड़ी हुई जहर-नाशक मान्यताएं लोक में रही हैं. एक तो उसकी पत्ती के डंठल से जुड़ी है. अगर आपको बिलनी (पता नहीं कितनों को पता हो) हो जाए, तो आम की पत्ती तोड़कर डंठल वाले हिस्से को 6-7 बार आंख की भीतरी पलक पर छुआने से बिलनी ठीक हो जाती है.
दूसरी मान्यता ये है कि वसंत पंचमी के पहले अगर आम में बौर आया दिख जाए, तो उसे तोड़कर गदोरी में मसल लेना चाहिए. ये गदोरी कम-से-कम एक साल तक बिच्छू का जहर उतार देती है. जब हम लोगों का लड़कपन था, हम इस तरीके से बिच्छू से निडर होने की कोशिशें करते रहते थे. अब नहीं करते, लेकिन करने को याद करते हैं. खासकर तब, जब बौर देखते हैं.

आखिर जहर मिटाने का काम आम के मत्थे क्यों मढ़ दिया गया, ये ख्याल बार-बार मन में आता है. सोचता हूं कि जिस तरह से आम वसंत के समय में प्रभावी होता है, वो किसी भी जहर की काट के रूप में लोकमानस में स्वीकार कर लिया जाए, तो क्या आश्चर्य! अद्भुत मादकता है आम के बौराने में. बौर यानी मंजरी यानी मोजर.
संस्कृत कवि इस 'मंजरी' पर ललचाते फिरे, अकारण नहीं. जो मादकता फागुन के मोहक रूप में हिन्दी-वर्ष का अंत करती है और चैत से धमाकेदार नया वर्ष शुरू करती है, वो मामूली नहीं हो सकती. उसके जिम्मे जहर सोखना सौंप दिया जाए, तो अनुचित कुछ नहीं.. वर्षभर के जहर को घोटकर ऋतु को वसंत कर देना, जड़-चेतन सभी को अपनी गिरफ्त में ले लेना आम को सहज ही जनमानस में अनूठे बर्ताव और भरोसे का अधिकारी बना देता है.
बौर से लेकर टिकोरे और फिर फल तक की यात्रा में आम मौसम को चरम अनुकूल बना देता है. परिवेश की विषाक्त रूक्षता को दरकिनार कर. बौर का स्वाद कुछ कषाय रहता है. आगे खट्टेपन का असर बढ़ता जाता है. ये मौसमी अनुकूलता ज़िंदगी के सबसे ऊर्जावान और उल्लासपूर्ण समय, बचपन में पहुंचा देती है. मोजर के बाद और टिकोरे के ठीक पहले की स्थिति को 'सरिसई' कहते हैं. बौर दानेदार होना शुरू करते हैं. इसे शैशव का शैशव कह लीजिए. नायिका महसूस करती है कि उसका पिया ऐसे समय लरिकईं करने लगता है:
जब अमवा में लागेला सरिसई हो रामा तब पियवा करेला लरिकई हो रामा...
ऐसे परिवेश में अगर कोई प्रिय है, लेकिन अपने होने को सार्थक नहीं कर रहा, तो नायिका उसे झकझोरती है:
अमवा मोजर गइले, महुआ कुचाइ गइले, ए जी, रसवा से भरि गइले फुलडरिया तनी ताका ना बलमुआ हमार ओरिया...
लेकिन जिसका प्रिय है ही नहीं, उसे तो दुख ही दुख है. आम ने विषरहित अनुकूलता तो दी, लेकिन प्रिय की अनुपस्थिति ने रंग में भंग कर दिया. विषाक्त-सा जीवन बना दिया. आनंद-रस का कटोरा सामने है, लेकिन हाथ ही बंधे हैं. क्या किया जाए! कसक ही कसक:
अमवा मउरि गइले नेहिया बउरि गइले देहिया टूटेला पोर-पोर हो रामा, चइत महिनवा...
इस अवस्था में अगर कोयल भी कूकने लगे, तो असाधारण अत्याचार होगा! नायिका रोष में आ जाती है. कोयल के घोसले को ही अगली सुबह उजड़वाने की बात करती है,
'होत भोर तोरा खोतवा उजरिहौँ!...'
चीज़ों के अच्छे या बुरे होने में संगति की भी बड़ी भूमिका है. संयोग और संगति की अनुकूलता नहीं, तो सकारात्मक चीज़ें नकारात्मक किरदार पेश करने लगती हैं. अमृत विष हो जाता है. इस आशय को, हूबहू नहीं तो भी, तुलसीदास ने बखूबी समझाया है:
ग्रह, भेषज, जल, पवन, पट, पाइ कुजोग सुजोग। होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥
हमें अपने विकासक्रम पर सोचना चाहिए. सोचते रहना चाहिए. कहीं हम रस-बहुलता को छोड़कर एकरसता, भले ही वो मिठाई हो, के शिकार तो नहीं होते जा रहे. स्मृति को लेकर भी क्या हमारा कोई दायित्व बनता है? कहीं हम विविधता की, व्याप्ति की, विराट की मिठास को खोते तो नहीं चले जा रहे हैं.. प्रसंग आम का है, तो कहूंगा कि कहीं हमारी आम-कहानी ठेला-बयानी भर होकर नहीं रह गई है?