जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए संविधान में एक धारा लाई गई थी 370. इसके जरिए संसद को अधिकार मिला कि वो रक्षा, विदेश मामले और संचार के बारे में जम्मू-कश्मीर के लिए कानून बना सकती है, जिसे राज्य सरकार की मंजूरी लेनी होती है. ये प्रावधान अब भी लागू है लेकिन जम्मू-कश्मीर से जुड़ा एक और प्रावधान है, जो लागू है और सबसे विवादित भी है. ये प्रावधान है धारा 35 A.

शेख अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू के बीच 1952 में दिल्ली समझौता हुआ था.
जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद शेख अब्दुल्ला वहां के अंतरिम प्रधानमंत्री बने. 1952 में जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला और भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के बीच एक समझौता हुआ, जिसे दिल्ली समझौता कहा जाता है. प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली समझौते पर संसद में एक भाषण दिया था, जिसके प्रमुख अंश हैं-
"नागरिकता का सवाल उठना जायज़ है. महाराजा हरि सिंह के वक्त में लंबे समय तक नियम था कि कोई भी बाहरी आदमी कश्मीर में न तो ज़मीन खरीद सकता है और न ही वहां का नागरिक बन सकता है. पुराने दिनों में महाराजा को इस बात का डर था कि बहुत सारे अंग्रेज वहां आएंगे और जमीन खरीदकर वहां बस जाएंगे, क्योंकि वहां का मौसम उनके अनुकूल होता था. इसलिए अंग्रेजी शासनकाल में भी महाराजा ने ये नियम बना रखा था कि कश्मीर में कोई भी ज़मीन नहीं खरीद सकता है, जो अब भी जारी है. इसलिए अब भी जम्मू-कश्मीर में जो सरकार है, वो भी इस बात से डरी हुई है कि बाहरी लोगों के आ जाने से जम्मू-कश्मीर के लोगों के पास पैसे के अलावा कुछ नहीं बचेगा. ये डर मुझे भी है. इसलिए हम इस बात पर सहमत हैं कि राज्य की विधानसभा को इस बात का अधिकार होगा कि वो स्थायी नागरिकता, ज़मीन-जायदाद खरीदने का मुद्दा और नौकरियों के मुद्दे को अपने हिसाब से परिभाषित कर सके."इस दिल्ली समझौते के तहत संविधान की धारा 370 (1) (D) के तहत भारत के राष्ट्रपति को जम्मू और कश्मीर के 'राज्य विषयों' के लाभ के लिए संविधान में "अपवाद और संशोधन" करने की ताकत देती है. इसका इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 14 मई 1954 को एक आदेश के जरिए धारा 35 A को लागू किया. ये धारा जम्मू-कश्मीर की सरकार और वहां की विधानसभा को जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक तय करने का अधिकार देती है. इसी धारा के आधार पर 1956 में जम्मू कश्मीर ने राज्य में स्थायी नागरिकता की परिभाषा तय कर दी, जो अब सबसे बड़ी विवाद की जड़ है.

कश्मीर के भारत में शामिल होने के बाद अखबार में छपी खबर का अंश.
धारा 35 A के मुताबिक जम्मू कश्मीर का नागरिक उसे माना जाएगा, जो 14 मई 1954 से पहले राज्य का नागरिक रहा हो. वो 14 मई 1954 से पहले 10 साल तक जम्मू-कश्मीर में रहा हो और उसके पास जम्मू-कश्मीर में संपत्ति हो. इस नियम के तहत दूसरे राज्यों में भारतीय नागरिकों को जो मूल अधिकार मिल रहे हैं, उनके उल्लंघन को लेकर याचिका भी दाखिल नहीं की जा सकती है. यानी यह धारा दूसरे राज्यों के जैसे नागरिक अधिकार हासिल करने पर पूरी तरह से रोक देती है.
लड़कियां शादी करेंगी तो कश्मीरी नहीं रह जाएंगी
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कश्मीर विवाद को शांत करने के लिए देश-विदेश में भी आवाज़ उठती रहती है.
एक आंकड़े के मुताबिक 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पाकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे, जिनकी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. इसके अलावा गोरखा समुदाय के भी लोग हैं, जिन्हें राज्य के नागरिक होने का कोई अधिकार हासिल नहीं है. वहीं 1957 में जम्मू-कश्मीर सरकार की कैबिनेट ने एक फैसला लिया था. इसके तहत वाल्मीकि समुदाय के 200 परिवारों को विशेष सफाई कर्मचारी के तौर पर बुलाया गया था. पिछले 60 साल से ये लोग जम्मू में सफाई कर्मचारी के तौर पर काम कर रहे हैं, जिन्हें जम्मू-कश्मीर के निवासी का दर्जा हासिल नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट में दी गई है चुनौती

जम्मू-कश्मीर की राजनैतिक पार्टियों के अलावा वहां के नागरिक भी 35 A को कायम रखना चाहते हैं.
धारा 35 A को चार अलग-अलग याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इसके पीछे ये तर्क दिया गया है कि इस धारा को राष्ट्रपति के आदेश से लागू किया गया था, इसलिए इसकी वैधानिकता संदिग्ध है. अलग-अलग याचिकाओं में कहा गया है कि संविधान में प्रावधान बनाने, हटाने या जोड़ने का अधिकार संसद को है और इसके लिए भी संविधान संशोधन करना पड़ता है. ऐसे में इस धारा की वैधानिकता नहीं है और सुप्रीम कोर्ट को इस धारा को हटा देना चाहिए. कोर्ट में आरएसएस से जुड़े 'वी द सिटीजन्स' नामक एनजीओ के अलावा चारू वली खन्ना ने इस धारा के खिलाफ अपील दाखिल की है. इसके अलावा इससे जुड़ी दो अन्य याचिकाएं कोर्ट के पास हैं. इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की एक बेंच बनाई है, जिसके सामने केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों ने अपने-अपने पक्ष रख दिए हैं.
केंद्र सरकार ने कहा है कि मामला संवैधानिक तौर पर पेचीदा है. वहीं राज्य सरकार ने इस व्यवस्था को बनाए रखने का आग्रह किया है. इसके लिए सरकार ने तर्क दिए हैं कि यहां पर पिछले 60 साल से अधिक वक्त से ये व्यवस्था लागू है और ये व्यवस्था बेहतर तरीके से काम कर रही है.
जानकारों के भी हैं अपने-अपने तर्क
संविधान के जानकारों के मुताबिक संविधान में 35 (a) का जिक्र है, जो जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ नहीं है. राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा जो आदेश दिया है, वो आर्टिकल 35 (A) है. वहीं संविधान में जब-जब संशोधन किया जाता है, उसका जिक्र संविधान की किताब में किया जाता है. अब तक के हुए संशोधनों में आर्टिकल 35 (A) का जिक्र नहीं है. हालांकि इस धारा को संविधान के परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है.धारा 35 A को समझने के लिए ये वीडियो देख सकते हैं
वीडियो में देखें ताजमहल से जुड़े सुबूत
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