अपनी नई पार्टी बनाई. गठबंधन की केंद्रीय सरकार में रक्षामंत्री रहे. फिर मायावती के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बने थे. जब माया ने सपोर्ट खींचा तो कुख्यात गेस्टहाउस कांड भी हुआ, जिसने माया और मुलायम के बीच वो लकीर खींच दी, जो कभी पाटी नहीं जा सकती. सत्ता के प्रति मुलायम का मोह इस कदर था कि कभी किसी चीज की परवाह नहीं की. एक दौर था कि मुलायम के प्रधानमंत्री बनने का मौका आया था. तब वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने हरकिशन सिंह सुरजीत से कहा कि आप ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं जो अपने फायदे के लिये किसी को मरवा देता है?
मुलायम की इच्छा दबी रह गई. फिर से वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये. पर 2007 में माया ने इनको पटखनी दी. 2007 में ही एक नामालूम शख्स विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम को आय से अधिक संपत्ति में कोर्ट में घसीटा कि 1979 में 79000 रुपए की संपत्ति वाला समाजवादी करोड़ों का मालिक कैसे बन गया? इसी केस में कोर्ट में दिये हलफनामे ने मुलायम का एक और राज खोला, जिस पर दशकों से पर्दा पड़ा था कि मुलायम की दूसरी बीवी भी है और एक बेटा भी है. साधना गुप्ता और प्रतीक यादव.

प्रतीक और अपर्णा यादव
साधना कभी सपा की एक छोटी कार्यकर्ता हुआ करती थीं. मुलायम राजनीति में औरतों को प्रश्रय देने वाले नहीं थे, पर निजी जीवन में नहीं रोक पाये.
सारा खेल मुलायम का खुद का रचा हुआ है. सत्ता के गलियारों में घूमते मुलायम ने बेटे अखिलेश पर ध्यान नहीं दिया था. 1973 में पैदा हुआ था अखिलेश. उसको चाचा शिवपाल ने ही पाला था. मां मालती देवी तो थीं ही, पर मालती एक सीधी-सादी औरत थीं. राजनीति में दखल नहीं था.
उनको अहसास भी नहीं हुआ होगा कि अस्सी के दशक में ही मुलायम ने एक और रिश्ता बना लिया था. शायद समझा भी दिया हो कि लड़कों से गलती हो जाती है. 1988 में साधना से पैदा हुआ बेटा प्रतीक यादव. लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़ा था, जिसकी बीवी अपर्णा सिंह लखनऊ के टाइम्स ऑफ इंडिया के बड़े पत्रकार की बेटी है. अपर्णा बेहद महत्त्वाकांक्षी है. ठीक अपनी सास की तरह. साधना के बारे में लोगों को पता नहीं था कि राजनीति में उनका दखल है. प्रतीक बॉडी-बिल्डिंग का शौकीन है. रियल एस्टेट में बिजनेस जमाना चाहता है. राजनीति में कतई दिलचस्पी नहीं. पर मां का मन है कि बेटा गद्दी पर आये.

अपर्णा यादव
मां बेटे को लोकसभा से लड़ाना चाहती थी पर सौतेले भाई अखिलेश ने रोक दिया था. ये आग जलती रही. अपर्णा ने इस चीज को हल्के में नहीं लिया था. स्वच्छता अभियान पर वो मोदी के सपोर्ट में बोलने लगी. निर्भया डॉक्युमेंट्री विवाद में खुलकर बोला. कयास लगने लगे कि वो भाजपा के साथ जा सकती है. मुलायम को धक्का लगने वाला था, पर अपर्णा को मना लिया गया कि 2017 के विधानसभा चुनाव में तुमको लड़ना है. अपर्णा पैट्रियार्की को नहीं मानती. खुलकर बोलना उसकी फितरत है. वहीं अखिलेश की बीवी डिंपल भी अपर्णा की ही तरह ठाकुर है. पढ़ी-लिखी है, पर डिंपल ने मुलायम की सत्ता को चुनौती नहीं दी. डिंपल हर जगह एक पारंपरिक औरत के तौर पर ही नजर आती हैं.
मुलायम ने अपनी राजनीति बाल-बुतरों के भरोसे नहीं खड़ी की है. उनके सबसे छोटे भाई शिवपाल यादव शुरू से उनके साथ रहे हैं. इतना कि उत्तर प्रदेश के हर जिले में शिवपाल की पकड़ है. वहीं चचेरे भाई रामगोपाल राज्यसभा में हैं और दिल्ली देखते हैं. शिवपाल का बेटा आदित्य भी राजनीति में है, पर पिता के कहने पर ही चलता है. रामगोपाल का बेटा भी इसी तरीके का है. पर रामगोपाल और शिवपाल में अंदरूनी खींच-तान है.

राम गोपाल, मुलायम और अखिलेश
शिवपाल को निराशा हुई थी अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद, क्योंकि उन्हें लगा था कि वही मुलायम के उत्तराधिकारी होंगे. पर ऐसा हो नहीं पाया. वहीं रामगोपाल का उत्तर प्रदेश में ज्यादा दखल नहीं है, तो वो अखिलेश के साथ अपना भविष्य देखते हैं. इनके अलावा मुलायम के दो और भाई हैं. एक का पोता और एक का बेटा राजनीति में है. पोते की ही शादी लालू की बेटी से हुई थी. ये दोनों अभी तक न्यूट्रल रहे हैं, पर माना जाता है कि निर्णय की स्थिति में दोनों अखिलेश के साथ ही जायेंगे.
शिवपाल की इच्छा पूरी नहीं हुई, तो उनको इस गम में एक साथी मिला. साधना गुप्ता के रूप में. साधना का शिवपाल की बीवी सरला से बड़ा दोस्ताना है. इनको अखिलेश का राज खटकता है. कहा जाता है कि जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने, तो उनको अंदाजा था कि सबसे ज्यादा डर अपनों से ही है. साधना के बारे में कहानी है कि उनको व्यापारियों का सपोर्ट है. वो अपनी वैश्य जाति के लोगों को अफसरशाही में भी प्रमोट करती हैं. चीफ सेक्रेटरी के पद पर दीपक सिंघल की नियुक्ति को इसी नजर से देखा गया था.

शिवपाल और अमर सिंह
तो परिवार में इतने सारे लोगों के होने के बावजूद मुलायम अपने मन की बात किसी से कह नहीं पाते थे. इस काम में आगे आये अमर सिंह, जिन पर बच्चन और अंबानी परिवार में कलह कराने का आरोप लगता रहा है. कहा जाने लगा कि अमर परिवार तोड़ने के मास्टर माइंड हैं. अमर ने सपा को ग्रामीण पार्टी से ग्लैमर पार्टी में बदल दिया था. बॉलीवुड और बिजनेस को अमर सपा में लेकर आए. फिर वो दौर भी आया, जब अमर को पार्टी से निकाल दिया गया. पर कहा जाता है कि साधना और शिवपाल ने मिलकर अमर की फिर वापसी कराई. अमर को प्रतीक का स्नेही माना जाता है.
इस माने जाने के क्रम में अखिलेश के साथ बस उनकी बीवी डिंपल और यार-दोस्त ही हैं, जिनको पार्टी से ही शिवपाल ने निकाल दिया था. 2017 का चुनाव आने तक धीरे-धीरे ये तय होने लगा था कि अखिलेश जनता की पसंद बनते जा रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं था कि अखिलेश ने सपा की गुंडों वाली पार्टी की इमेज बदल दी थी, तो दोबारा अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने को लेकर पंगा स्वाभाविक था. पर राजनीति की कलह में अखिलेश ने मास्टर स्ट्रोक खेला है. अगर वो अपनी अलग पार्टी बनाते हैं तो जनता की सहानुभूति जरूर साथ रहेगी. पर कितनी, ये कोई नहीं जानता.