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बंगाल का ये मुख्यमंत्री खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गया था

अरविंद केजरीवाल अकेले नहीं हैं. बंगाल का ये मुख्यमंत्री भी CM रहते हुए धरने पर बैठ गया था.

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अजय मुखर्जी पहले कांग्रेस में थे. गांधीवादी रहे थे. फिर जब कांग्रेस में बंटवारा हुआ, तो उन्होंने 'बांग्ला कांग्रेस' के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. वो दो बार यूनाइटेड फ्रंट की गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री रहे. दोनों ही बार सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई.
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं. अनिल बैजल दिल्ली के लेफ्टिनंट गवर्नर (LG) हैं. केजरीवाल को जनता ने चुना है. अनिल बैजल को सरकार ने चुना है. दोनों में एका नहीं. विरोध इतने हैं कि मुख्यमंत्री अपनी कैबिनेट के तीन मंत्रियों के साथ LG के खिलाफ धरना दे रहे हैं. लोग सवाल कर रहे हैं. कि एक मुख्यमंत्री धरना कैसे दे सकता है? इस सवाल के जवाब में हम आपको एक पुराना किस्सा सुनाते हैं. दो किस्से हैं असल में. एक 1967 का. और 1969 का है. जगह थी बंगाल. जहां राज्यपाल ने एक मुख्यमंत्री को हटाया. मुख्यमंत्री ने कहा, राज्यपाल गलत हैं. और इसी विरोध में उस हटाए गए मुख्यमंत्री ने राज्यपाल के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया. फिर 1969 का साल. गठबंधन सरकार. सरकार चला रहे मुख्यमंत्री ने अपनी ही सरकार के खिलाफ यात्राएं की. अपनी ही सरकार की पोल खोली. और अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना दिया. दोनों ही घटनाओं में एक नाम शामिल था. अजय मुखर्जी. जो अंग्रेजी में अपना नाम Ajoy Mukherjee लिखते थे. दो बार यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में मुख्यमंत्री बने. और राज्यपाल के खिलाफ सड़कों पर उतरे. यहां तक कि अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे.
केजरीवाल और उनकी कैबिनेट के तीन सहयोगी- मनीष सिसोदिया, गोपाल राय और सत्येंद्र जैन LG ऑफिस के अंदर धरने पर बैठे हुए.
केजरीवाल और उनकी कैबिनेट के तीन सहयोगी- मनीष सिसोदिया, गोपाल राय और सत्येंद्र जैन LG ऑफिस के अंदर धरने पर बैठे हुए.

कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए बनी गठबंधन सरकार अजय मुखर्जी पहले कांग्रेस में थे. मगर ये 1966 तक की बात थी. उस साल कांग्रेस में फूट पड़ी. और पार्टी के दो फाड़ हो गए. इंडियन नैशनल कांग्रेस से कटकर अलग पार्टी बनी. नाम पड़ा- बांग्ला कांग्रेस. बंगाल की थी, तो बांग्ला नाम चुना. ये वो दौर था, जब बंगाल की राजनीति में चीजें हमेशा-हमेशा के लिए बदलने वाली थीं. मार-काट. हिंसा. राजनैतिक विरोध=हत्या. इन सबकी शुरुआत बस अगले ही मोड़ पर थी. ऐसे में आया 1967 का साल. चुनाव हुए. और कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल पाया. 280 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को मिली 127 सीटें. CPI के पास आईं 16 सीटें और CMP (M) के हिस्से में 44 सीटें. बंगाल की राजनीति में कई खिलाड़ी थे. कई कांग्रेस विरोधी थे. मगर विचारधाराएं अलग-अलग थीं उनकी. लेकिन कांग्रेस का विरोध इतने जोर पर था कि ये पार्टियां कांग्रेस को किसी भी कीमत पर सत्ता से दूर रखना चाहती थीं. तो उन्होंने मिली-जुली सरकार बनाई.
केंद्र में थी कांग्रेस की सरकार. कांग्रेस किसी कीमत पर बंगाल को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी. इंदिरा के करीबी सिद्धार्थ शंकर रे भी बंगाल के ही थे. कहते हैं कि इनके ही कहने पर इंदिरा ने आगे चलकर इमरजेंसी लगाई थी (फोटो: Getty)
केंद्र में थी कांग्रेस की सरकार. कांग्रेस किसी कीमत पर बंगाल को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी. इंदिरा के करीबी सिद्धार्थ शंकर रे भी बंगाल के ही थे. कहते हैं कि इनके ही कहने पर इंदिरा ने आगे चलकर इमरजेंसी लगाई थी (फोटो: Getty)

अजय मुखर्जी की सरकार अल्पमत में आ गई बांग्ला कांग्रेस. यानी अजय मुखर्जी की पार्टी भी इस गठबंधन में थी. मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला अजय मुखर्जी को. 2 मार्च, 1967. इस तारीख को अजय मुखर्जी CM बने. मगर चीजें ज्यादा दिन तक ठीक नहीं रही. अजय मुखर्जी का अपनी सहयोगी पार्टियों से मनमुटाव होने लगा. कई मुद्दे थे आपसी विरोध के. जैसे- खेती. खाद्य योजनाएं. इन बातों पर अजय मुखर्जी की राय गठबंधन के अपने सहयोगियों से मेल नहीं खाती थीं. उधर कम्युनिस्ट पार्टियों ने क्या किया था कि सरकार के अहम विभाग अपने पास रख लिए थे. अब ऐसे में अजय मुखर्जी को लगा कि कांग्रेस से मदद ले लूं. सरकार चला लूं किसी तरह. लेकिन इससे पहले कि वो कुछ कर पाते, कांड हो गया. सरकार में एक जनाब थे- पी सी घोष. वो पहुंचे राज्यपाल के पास. राज्यपाल थे धर्म वीर. उन्होंने राज्यपाल से ये भी कहा कि अजय मुखर्जी सरकार अब अल्पमत में आ गई है. क्योंकि 17 और लोगों ने भी उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया है. उधर कांग्रेस भी पहुंची राज्यपाल के पास. उसने कहा कि वो पी सी घोष को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनाना चाहती है.
राज्यपाल ने सरकार बर्खास्त कर दिया राज्यपाल ने अजय मुखर्जी को अल्टीमेटम दे दिया. कहा, विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर बहुमत साबित करो. उधर अजय मुखर्जी विशेष सत्र बुलाने में देर कर रहे थे. ऐसे में राज्यपाल ने उनकी सरकार को ही बर्खास्त कर दिया. इससे अजय मुखर्जी के समर्थक बौखला गए. और अजय मुखर्जी और उनके सपोर्टर्स ने राज्यपाल के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया. हिंसा भी की. राज्य में जगह-जगह हिंसक जुलूस निकाले. उधर राज्यपाल ने पी सी घोष को मुख्यमंत्री बना दिया. 29 नवंबर को विधानसभा सत्र शुरू हुआ. और क्या हंगामा हुआ असेंबली में. विधानसभा के स्पीकर थे बिजय कुमार बैनर्जी. उन्होंने कहा कि विधानसभा का सत्र ही नहीं चलेगा. क्योंकि अजय मुखर्जी की सरकार को असंवैधानिक तरीके से हटाया गया है. उन्होंने घोष सरकार को भी असंवैधानिक कह दिया. ये सब कहकर उन्होंने अनिश्चित काल के लिए विधानसभा स्थगित की और वहां से निकल लिए. बैनर्जी ने जो किया, उसकी उस दौर में खूब बातें हुई थीं. बड़ी चर्चा हुई उनके किए की.
कहते हैं कि प्रणब मुखर्जी ने अजय मुखर्जी को ये आइडिया दिया था. कि वो कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए गठबंधन सरकार बनाने का विकल्प चुनें.
कहते हैं कि प्रणब मुखर्जी ने अजय मुखर्जी को ये आइडिया दिया था. कि वो कांग्रेस को सत्ता से दूर करने के लिए गठबंधन सरकार बनाने का विकल्प चुनें.

राज्यपाल के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया इसके बाद बंगाल में अजीब सा हाल था. कुछ तय नहीं लग रहा था. पूरी बदहवासी थी. अजय मुखर्जी ने खुद को बर्खास्त किए जाने का विरोध करते हुए राज्यपाल के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया. धरने से शुरुआत हुई. और चीजें हिंसा की तरफ मुड़ गईं. बसें जलीं. ट्राम जलाए गए. पुलिस पर बम फेंके गए. खूब आगजनी हुई. लेफ्ट पार्टियों ने भी खुलकर गदर काटा. खूब हिंसा की. फरवरी 1968 में बजट पेश होने का वक्त आया. राज्यपाल खुद विधानसभा पहुंचे. बजट सत्र को संबोधित करने. फिर वहां खूब हंगामा हुआ. यूनाइटेड फ्रंट के लोगों ने उन्हें पहले तो विधानसभा में घुसने ही नहीं दिया. रास्ता रोककर खड़े हो गए. मजबूरी में राज्यपाल पिछले दरवाजे से अंदर आए. लेकिन तब तक प्रदर्शनकारी नेताओं ने उनकी कुर्सी कब्जा ली थी. इतने पर भी राज्यपाल ने भाषण देने की कोशिश की. लेकिन उन्हें ऐसा करने नहीं दिया गया. प्रदर्शनकारियों ने उन्हें विधानसभा से भगाकर ही दम लिया. इसके बाद ही केंद्र ने विधानसभा भंग करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया.
दोबारा मुख्यमंत्री बने अजय मुखर्जी अब आया फरवरी 1969. राष्ट्रपति शासन खत्म होना है, तो चुनाव होगा. तो चुनाव हुआ. किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. मगर CPI (M) की हालत सुधरी थी. उसको 80 सीटें मिलीं. CPI के हिस्से में 30 सीटें आईं. मगर सरकार बनाने को अकेले कोई कुछ करने की हालत में नहीं था. सो एक बार फिर वही जोड़-तोड़ शुरू हुई. सबसे बड़ी पार्टी तो CPI (M) थी, लेकिन ज्यादातर नेता ज्योति बसु को मुख्यमंत्री बनाए जाने के विरोध में थे. बहुत माथापच्ची और बहस के बाद अजय मुखर्जी का नाम मुख्यमंत्री के लिए फाइनल हुआ. CPM ने गृह विभाग अपने पास रखा.
कहने को अजय मुखर्जी नंबर वन, यानी मुख्यमंत्री थे. और ज्योति बसु नंबर-दो थे. लेकिन असलियत में ताकत CPM के ही पास थी. पार्टी ने गृह विभाग अपने पास रखा था. वो पुलिस को मनचाहे तरीके से इस्तेमाल करती थी. और मुख्यमंत्री चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे (फोटो: The Lallantop)
कहने को अजय मुखर्जी नंबर वन, यानी मुख्यमंत्री थे. और ज्योति बसु नंबर-दो थे. लेकिन असलियत में ताकत CPM के ही पास थी. पार्टी ने गृह विभाग अपने पास रखा था. वो पुलिस को मनचाहे तरीके से इस्तेमाल करती थी. और मुख्यमंत्री चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे (फोटो: The Lallantop)

मुख्यमंत्री अजय मुखर्जी थे, लेकिन ताकत CPM के पास थी इस दौर में पश्चिम बंगाल के अंदर कई तरह का संघर्ष था. एक- राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच. कांग्रेस कहती थी कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की हालत खराब है. दूसरी तरफ बंगाल में अपने घटते जनाधार से भी उसका पसीना छूट रहा था. राज्यपाल पर केंद्र के हाथों का मोहरा बनने के इल्जाम लगते थे. विधानसभा सत्र में हो-हंगामा आम था. एक बार तो ये हालत आ गई कि राज्यपाल असेंबली सेशन की शुरुआत में संबोधन देने आए. जैसी कि परंपरा है. लेकिन इतना विरोध हुआ उनका कि उन्हें पुलिस सुरक्षा में वहां से भागना पड़ा. दूसरी बात ये थी कि गठबंधन सरकार में शामिल दलों की भी पट नहीं रही थी. अजय मुखर्जी भले CM हों, लेकिन असली ताकत CPM के पास थी. CPM का तरीका ही था. सड़कों पर प्रदर्शन और जरूरत पड़ने पर हिंसा से ऐतराज नहीं.
बंगाल के कारखानों में घेराव परंपरा ने जोर पकड़ा कोलकाता और इसके आस-पास के कारखानों के मजदूरों ने नई स्ट्रेटजी अपनाई. वेतन बढ़ाने जैसी मांग लेकर वो आए दिन अपने मैनेजरों का घेराव करने लगे. पहले जब भी ऐसी हालत होती, तो मैनेजमेंट पुलिस को बुला लेता था. मगर अब जो सरकार थी, उसका कहना था कि अगर मजदूर काम करना रोक दें, तो इसकी शिकायत पहले श्रम मंत्री से करनी होगी. ये विभाग CPM के पास था. CPM की तो पैठ थी लेबर यूनियन्स में. वो भला क्यों उनके खिलाफ कार्रवाई करने लगे. गृह विभाग भी CPM ने अपने ही पास रखा था. मतलब कि पुलिस भी उसकी ही थी. तो राज्य में हालत ये हो गई कि कारखानों में काम कम और घेराव ज्यादा होने लगे. इतने ज्यादा कि सरकार के शुरुआत छह महीनों के अंदर 1200 से ज्यादा घेराव हुए.
1960 का दौर बंगाल में बदलाव का दशक था. चीजें एकाएक काफी हिंसक होनी शुरू हो गईं. कारखानों में ताला लगने लगा. मजदूर आएदिन मैनेजमेंट का घेराव करने लगे. तनख्वाह बढ़ाने के लिए, काम की बेहतर परिस्थितियां देने के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया जाने लगा (फोटो: Getty)
1960 का दौर बंगाल में बदलाव का दशक था. चीजें एकाएक काफी हिंसक होनी शुरू हो गईं. कारखानों में ताला लगने लगा. मजदूर आएदिन मैनेजमेंट का घेराव करने लगे. तनख्वाह बढ़ाने के लिए, काम की बेहतर परिस्थितियां देने के लिए हिंसा का इस्तेमाल किया जाने लगा (फोटो: Getty)

ब्रिटेन के अखबारों में छपता था बंगाल घेराव का हाल इन घेरावों की खबर विदेशों में जाती थी. खासतौर पर ब्रिटेन के अखबारों में. इसकी वजह थी. बंगाल, खासतौर पर कोलकाता और उसके आस-पास के इलाकों में ज्यादातर कारखाने अंग्रेजों के थे. कारखाने बंद होते, तो उनको नुकसान होता. इसीलिए इनकी खबर ब्रिटिश अखबार खूब बढ़-चढ़कर छापते. ऐसी स्थितियों में ही लोग बंगाल में अपने कारखाने बंद करके दूसरी जगहों को जाने लगे. एक जमाने में जो कोलकाता भारत क्या, दुनिया के अव्वल इंडस्ट्रियल शहरों में गिना जाता था, एकाएक कारखानों से खाली होने लगा.
अजय मुखर्जी को पता था, सब CPM का किया-धरा है इन सबके बीच सबसे खराब हालत शायद अजय मुखर्जी की ही थी. क्योंकि वो मुख्यमंत्री थे. राज्य में कानून-व्यवस्था और बाकी तमाम चीजों की जवाबदेही उनकी ही तो बनती थी. अजय मुखर्जी को और ज्यादा गुस्सा इसलिए था कि उन्हें पता था कि ये सब CPM का किया-कराया है. यानी, गठबंधन सरकार के उनके अपने सहयोगी का. अजय मुखर्जी लाचार थे. उनके हाथ में जैसे कुछ नहीं था. सो उन्होंने सत्याग्रह शुरू कर दिया. अपनी ही सरकार के खिलाफ. बंगाल का दौरा किया. जिलों में गए. दौरे किए. भाषण दिए. अपने ही पार्टनर CPM के खिलाफ बोले.
CPM गठबंधन सरकार में थी. लेकिन वो खुद बवाल काटने में आगे थी. कारखानों में जब मजदूर हंगामा करते और मैनेजमेंट पुलिस को बुलाता, तो पुलिस वहां पहुंचती नहीं थी. श्रम और गृह विभाग, दोनों ही CPM के पास थे. सरकार घुटनों पर थी जैसे. ऐसा भी लगता था कि CPM इस सरकार में रहकर अपनी मसीहा वाली छवि मजबूत करना चाहती है. शायद उसे इसका फायदा भी हुआ. चुनावों में उसका जनाधार लगातार बढ़ता रहा (फोटो: रॉयटर्स)
CPM गठबंधन सरकार में थी. लेकिन वो खुद बवाल काटने में आगे थी. कारखानों में जब मजदूर हंगामा करते और मैनेजमेंट पुलिस को बुलाता, तो पुलिस वहां पहुंचती नहीं थी. श्रम और गृह विभाग, दोनों ही CPM के पास थे. सरकार घुटनों पर थी जैसे. ऐसा भी लगता था कि CPM इस सरकार में रहकर अपनी मसीहा वाली छवि मजबूत करना चाहती है. शायद उसे इसका फायदा भी हुआ. चुनावों में उसका जनाधार लगातार बढ़ता रहा (फोटो: रॉयटर्स)

बंगाल का इतना बुरा हाल था कि दोपहर में बाजार बंद हो जाते थे हिंसा की इन तमाम घटनाओं के बीच एक और तरह की हिंसा छिड़ी थी. CPM और नक्सलियों के बीच. नक्सलियों ने अपनी पार्टी बना ली थी. CPI (M-L). M का मतलब मार्कसिस्ट. L का मतलब लेनिनिस्ट. इसके बनने के बाद CPI के कई सारे कैडर पार्टी छोड़कर CPI (M-L) में जाने लगे. CPI (M-L) के निशाने पर बस जमींदार ही नहीं थे, बल्कि CPM कैडर भी थे. इसके जवाब में CPM के पास अपना समर्पित कैडर था. वो भी उतना ही हिंसक. दोनों पक्षों की हिंसा ने राज्य की कानून-व्यवस्था की और धज्जियां उड़ाईं. बहुत बुरा हाल था बंगाल का. कहीं कोई किसी से लड़ रहा है. कहीं कोई किसी को मार रहा है. दोपहर में ही बाजार बंद हो जाते थे. शाम ढलते-ढलते सड़क ऐसे वीरान हो जाते, मानो कर्फ्यू लग गया हो. कभी किसी पुलिस थाने पर बम फेंके जाने की खबर आती. कभी किसी घर पर छापा पड़ जाता.
और फिर आई 1 दिसंबर की तारीख.
अजय मुखर्जी के इस्तीफा देने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया. अगला चुनाव हुआ 1971 में. इसमें CPM को 113 सीटें मिलीं. कांग्रेस घटकर 105 सीटों पर पहुंच गई. बांग्ला कांग्रेस के हिस्से आई 5 सीटें. 1977 में ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री बने. अब जाकर पवन चामलिंग ने सबसे ज्यादा लंबे वक्त तक मुख्यमंत्री रहने का उनका रेकॉर्ड तोड़ा है (फोटो: The Lallantop)
अजय मुखर्जी के इस्तीफा देने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया. अगला चुनाव हुआ 1971 में. इसमें CPM को 113 सीटें मिलीं. कांग्रेस घटकर 105 सीटों पर पहुंच गई. बांग्ला कांग्रेस के हिस्से आई 5 सीटें. 1977 में ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री बने. अब जाकर पवन चामलिंग ने सबसे ज्यादा लंबे वक्त तक मुख्यमंत्री रहने का उनका रेकॉर्ड तोड़ा है (फोटो: The Lallantop)

और मुख्यमंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गए ये ऐतिहासिक तारीख है. दक्षिण कोलकाता में एक कर्जन पार्क है. यहां अजय मुखर्जी ने अपना अड्डा जमाया. भूख हड़ताल पर बैठ गए. अपनी ही सरकार के खिलाफ. अपनी ही सरकार के कामकाज के खिलाफ. अपनी ही सरकार की हरकतों के खिलाफ. ये कैसी विचित्र स्थिति थी, सोचिए. कि एक मुख्यमंत्री भूख हड़ताल पर बैठा है. इसलिए कि उसकी सरकार कानून-व्यवस्था नहीं बनाकर रख पा रही है. कि उसकी अपनी सरकार प्रदेश में शांति बनाकर रखने में नाकाम साबित हुई है. अजय मुखर्जी की ये अनोखी भूख-हड़ताल 72 घंटे चली. फिर क्या हुआ? राज्य में एक बार राष्ट्रपति शासन लग गया. 1971 में फिर से चुनाव हुए. और CPM और बड़ी हो गई. और फिर जो हुआ, वो इतिहास है. कांग्रेस का जाना, लेफ्ट सरकार का आना. बंगाल में राजनैतिक हिंसा की परंपरा. सब इतिहास है.
इतिहास ही बताना था आपको. कि केजरीवाल अकेले मुख्यमंत्री नहीं. जिन्होंने CM होते हुए धरना दिया हो. ऐसा पहले भी हो चुका है. कौन कह सकता है कि ये आगे नहीं होगा?


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