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अम्मी को नमाज याद है, आयतें नहीं. उन्हें भी मार दोगे क्या?

अल्लाह हो अकबर. इस नारे को बचा लो. नहीं तो फिर जब कहीं ये नारा गूंजेगा, तो सबके जहन में ये ही आएगा कि अब किसी की गर्दन कटेगी.

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फोटो क्रेडिट: REUTERS
छोटे-छोटे भांजी-भांजा हैं. स्कूल से आने के बाद शाम को चार बजे मदरसे जाते हैं. मकसद सिर्फ इतना है इस्लाम का बेसिक सीख लें और कुरान पढ़ना आ जाए. बच्चे शरारती मन के हैं. जाना पसंद नहीं करते. अनाकानी करते हैं. जब से सुना बांग्लादेश में तारिषी को सिर्फ इसलिए मार दिया, क्योंकि उसे कुरान की आयतें याद नहीं थीं, तब से दिल बेचैन है. डर लगता है कि बच्चे कुरान पढ़ना सीख पाएंगे या नहीं.
अब तक बहलाकर पढ़ने के लिए भेज रहे थे. लगता है अब डराकर, धमकाकर भेजना पड़ेगा. आखिर जिंदा रहने का सवाल है. पता नहीं कल कहां, पढ़ने के लिए चल जाएं और कुछ बददिमाग लोग वहां जाकर उनसे आयतें सुनने लगें. कम से कम आयत सुनाकर जिंदा तो बच जाएंगे.
बच्चों के पास तो वक्त है. हो सकता है पढ़ लें, चिंता मुझे अपनी फैमिली के कुछ मेंबर्स की है. जिन्हें नमाज के अलावा कुरान पढ़ना नहीं आता. हो सकता है अगर कुरान पर कोई डिजायन न हो तो वो ये भी न बता पाएं कि किधर से सीधा है और किधर से उल्टा. क्योंकि गरीबी ने उन्हें पढ़ने नहीं दिया. बड़ी फिक्र हो रही है. कहीं उनका सामना ऐसे जाहिलों से न हो जाए. ये कौन सा पैमाना है. जो सिर्फ अल्लाह ने इन बददिमागों के कान में ही बताया कि अगर कोई कुरान की आयत न सुना पाए, उसको मार डालना. अल्लाह ने ये बात मुहम्मद (स.) को क्यों नहीं बताई. सबसे खासमखास नबी बनाकर भेजा था. कम से कम उन्हें तो बता दिया होता, जो ये मान लेते कि जब नबी ने आयतें न सुनाने पर मारा तो हम भी ऐसा कर रहे हैं. मुझे तो कहीं पढ़ने के लिए ये नहीं मिला कि मुहम्मद साहब ने किसी को इसलिए मार डाला हो, क्योंकि उसे कुरान की आयतें याद नहीं थीं. तो फिर कौन से इस्लाम की बात कर रहे हैं. खबरदार ! इनकी तरफदारी न करना. ये यजीद हैं. शैतान हैं. ये इस्लाम वाले नहीं हैं. जब इस्लाम आया तो उसको खत्म करने वाले भी आए. ये शैतान कभी फिरऔन की शक्ल में आया. कभी अबूजहल की शक्ल में आया, कभी यजीद की शक्ल में आया. वही यजीद जिसने कर्बला (इराक) में मुहम्मद (स.) के नवासे हुसैन समेत 72 लोगों को भूखा प्यासा शहीद कर दिया, इनमें छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे. सिर्फ इसलिए मार दिया, ताकि उसके मुताबिक इस्लाम चले. दुनिया से मिट गया, अपने आपको अफजल और सही मानता था, कोई आज आपने बेटे का नाम भी रखना नहीं चाहता. मुझे आज ये आतंकी उसी दौर के यजीद लगते हैं. जिसमें शैतानियत इतनी कूटकर भरी हुई है कि शैतान को भी अपनी हरकतों पर शर्म महसूस हो. उस दौर में भी कुछ लोग तमाशाबीन बने रहे. जबान तालवे से चिपकी रही. किसी ने विरोध नहीं जताया. आज भी कुछ की जबान को लकवा मार गया है. इस्लाम को खत्म किया जा रहा. ये आतंकी इस्लाम का दुश्मन बन बैठे हैं.
मौलवी लोग बहुत बिजी हैं, क्योंकि उन्हें अभी अखिलेश यादव की इफ्तार पार्टी में जाना है. फिर ईद के चांद पर भी बहस करनी है कि चांद दिखा या नहीं. अरे हां! अभी तो इरफान खान के बयान को विवादित बताकर उसपर प्रेस कांफ्रेंस करनी है. या फिर किसी हिंदू के बयान का इंतजार करेंगे ताकि चिल्ला सकें. नबी की शान में गुस्ताखी की सजा मौत है... मौत है...!
हे मौलवी साहिबान! ये जो अल्लाह हो अकबर चिल्लाकर बेगुनाहों को मार दे रहे हैं. क्या ये अल्लाह की बेअदबी नहीं कर रहे ? अगर ये बेअदबी है तो आपकी खामोशी आपकी रजामंदी है. कोई सुन्नी बहुल देश है तो कोई शिया, लेकिन सब अपने अपने धंधों के लिए चुप्पी साध लेते हैं. इंडिया और पाकिस्तान का इस्लाम तब खतरे में आता है जब यहा कोई फिल्म बन जाती है. जब कोई अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर लेता है. लोग सड़कों पर उतर आते हैं. मुर्दाबाद के नारे बुलंद करते हैं, लेकिन जब बेगुनाहों को इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि उन्हें कुरान की आयतें याद नहीं, तब ये गुस्सा आपका कहां गायब हो जाता है. ये इस्लाम को बदनाम किया जा रहा है. ISIS, तालिबान, अलकायदा की वजह से इस्लाम पर आरोप लग रहे हैं कि तलवार से फैला और आप खामोश हैं. क्यों उन युवाओं को नहीं रोक पा रहे हैं, जो इन शैतानों से प्रेरित होकर उनमें शामिल हो जा रहे हैं. अब भी वक्त है इस्लाम को बचाओ, इन शैतानों से. इतिहास गवाह है, इस्लाम को अपनों ने ही नुकसान पहुंचाया है. अगर ऐसा न होता तो न तो शियाओं पर हमले हो रहे होते, न सुन्नी खतरे में होते. न देवबंदी-बरेलवी झगड़ रहे होते. अभी आप मस्जिद के बारे में, रोजे के बारे में या फिर किसी और त्योहार के बारे में कुछ बोल दीजिए. चाहें आपका तर्क कितना भी मजबूत क्यों न हो, लेकिन आप उसका प्रोटेस्ट देखिए चूल से चूल हिला देंगे. बड़ी जबरदस्त तकरीरें होंगी. अल्लाह हो अकबर के नारे बुलंद होंगे.
ऐ मौलवी साहिबान! अगर तुम्हें अपनी तकरीरों में अल्लाह हो अकबर नारा लगवाना है तो इस नारे को बचा लो. नहीं तो आतंकियों की वजह से खूनी नारा बन जाएगा. फिर जब कहीं ये नारा गूंजेगा, तो सबके जहन में ये ही आएगा कि अब किसी की गर्दन कटेगी.

आयतें न पढ़ने वालों का आतंकियों ने रेत दिया गला

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