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'प्यारे बुद्धिजीवियों, बुरहान वानी कश्मीर वाणी नहीं है'

फौजी भी हमारे जैसे इंसान हैं. उन्हें भी किसी को मारने में मजा नहीं आता है.

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फोटो - thelallantop
नवीन चौधरी
नवीन चौधरी
कश्मीर में आतंकी बुरहान वानी मारा गया है. मौत के बाद से हिंसा में अब तक 34 से ज्यादा जानें जा चुकी हैं. कश्मीर में हो रही हिंसा को लेकर मीडिया में डिबेट हो रही है. कुछ कथित बुद्धिजीवी बुरहान की मौत को गलत ठहरा रहे हैं. कश्मीर में इंडियन आर्मी की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं. नवीन चौधरी के कुछ सवाल हैं, बुद्धिजीवियों से. नवीन ने ये सवाल और अपनी बात हमें लिख भेजी है. नवीन 12 साल से मार्केटिंग के पेशे में है. ब्लॉगर हैं, ऐसा खुद का दावा है. ट्विटर हैंडल @naveen1003 पर चौड़ में एक्टिव रहते हैं.



 
जानते हैं कश्मीर और शर्मा जी के लौंडे में क्या कॉमन है? दोनों से आपका कोई खास लेना-देना नहीं है. पर जब भी वहां कुछ होता है, डिस्टर्बेंस आपके घर में भी महसूस होती है.
जब से होश संभाला है, तब से कश्मीर में सिर्फ बवाल ही सुन रहा हूं. अमीर खुसरो कश्मीर के लिए कह गए थे,

'धरती पर स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है.'

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आए दिन वहां कोई न कोई आतंकवादी जन्नत जाने को तैयार रहता है या वहां के लोगों और फौजियों को भेजना चाहता है. इससे पहले कि कुछ और लिखूं, उन तमाम 'बुद्धिजीवियों' और 'सेकुलरों' को एडवांस में थैंक्यू. जो कहने वाले हैं कि अब ये ‘हिंदी वाले ब्लॉगर’ भी कश्मीर पे लिखेंगे. बुद्धिजीवियों का मानना है कि आम हिंदुस्तानी को इन सब मसलों पर नहीं बोलना चाहिए, उसके लिए तो दाल और टमाटर बहुत हैं बोलने को.
इस बार कश्मीर का मुद्दा बुरहान वानी के मरने के बाद उठा है. इस सबसे ताजा वाले बवाल में हजारों लोग उसके जनाजे में गए. कुछ 'बुद्धिजीवियों' ने इस भीड़ का भी जिक्र करके कहा कि अगर बुरहान की मौत पर इतना जनसैलाब है तो कुछ बात तो जरूर है और इसी बहाने उन्होंने सरकार और फौज को दोषी बना दिया.
दरअसल मुझे कश्मीर पे कुछ लिखना, कहना या समाधान नहीं देना है. पर इन दिनों जिस तरह से सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में बुद्धिजीवी हमें ये बताने में लगे हुए हैं कि ‘कश्मीर’ एक समस्या है, जिसे भारत को छोड़ देना चाहिए या आज़ाद कर देना चाहिए. इसे सुन के एक बार को तो लगता है कि बात तो सही है. रोज का बवाल होने से अच्छा मरने दो इसे, जाने दो. पर क्या ये वाकई सही है?
'बुद्धिजीवियों' की बात को सिर्फ ये कह के बंद करना चाहता हूं कि बुरहान वानी को कश्मीर वाणी मत समझिए. और ये जो आम हिंदुस्तानी नारे लगाता है न ‘कश्मीर मांगोगे, चीर देंगे’ ये नारे सिर्फ इमोशनल नहीं होते. इन नारों के पीछे वो सारे तथ्य और डर हैं, जिनको आप लोग न जाने किस लालच या विचारधारा के चक्कर में पूरी तरह इग्नोर कर देते हो.
कुछ दोस्तों से बात करके समझना चाहा कि क्या हो जाएगा, अगर भारत कश्मीर छोड़ दे? बला टलेगी या मुसीबत बढ़ेगी? ये कुछ सुनने में मामूली सी बातें है पर हकीकत यही है. आप इन्हें इग्नोर नहीं कर सकते.
आजाद कश्मीर ये वाला कंसेप्ट सुनने में मस्त है. पर क्या सही है? कश्मीर आजाद होना चाहता है या एक तबका वहां इस्लामिक राज्य स्थापित करना चाहता है? दी लल्लनटॉप पर बुरहान की मां की बात पढ़ी.

'मेरा दूसरा बेटा बुरहान वानी भी काफिरों से लड़ते हुए इस्लामी निजाम के लिए शहीद हुआ.'

जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं. कश्मीर की आजादी का यही अर्थ है, जिसे पाकिस्तान अपने मकसद के लिए हवा दे रहा है. आखिर ऐसी कौन सी आज़ादी है कश्मीर की, जिसमें कश्मीरी मूल के पंडितों की ही जगह नहीं? उन्हें पहले बाहर फेंका और अब आज़ादी की बात. हां मुझे पता है कि ज्ञानी लोग यहां इंदिरा गांधी और 1990 की कहानी लाएंगे, पर उन सब के बावजूद पॉइंट यही है कि जिस कश्मीर को आजाद करने की बात कर रहे हैं. उसी की आबादी के एक बड़े हिस्से को वहां से भगा रखा है. कश्मीर को वैसे भी धारा 370 के तहत विशेषाधिकार मिले हुए हैं, वो कम हैं क्या?
Jammu Kashmir
फोटो क्रेडिट: Reuters
पाकिस्तानी आतंकवाद एक 'बुद्धिजीवी' ये कह दे कि एक बार हमने कश्मीर छोड़ा तो पाकिस्तानी आतंकवाद हिंदुस्तान में ख़त्म हो जायेगा. कश्मीर दीजिए, फिर वो खालिस्तानियों को जगाएगा. क्या खालिस्तानी ये नहीं मानेंगे कि हिंसा से उन्हें भी अलग देश मिल जायेगा? क्या पाकिस्तान कश्मीर, खालिस्तान के बाद और आगे पैर नहीं पसारेगा? अगर कह सकते हो नहीं. तो जाने दो कश्मीर. हिन्दू-मुस्लिम एकता ये वैसे ही एक 'किताबी शब्द' है, हमारे यहां जो कभी भी एक अफवाह पर एकता के टुकड़े-टुकड़े कर देता है. क्या एक भी बुद्धिजीवी ये कह सकता है कि अगर कश्मीर अलग हुआ तो उसका रिएक्शन देश भर में दंगे के रूप में नहीं होगा? जब कश्मीर आज़ाद नहीं, तब ‘काफिरों’ को मार कर भगाया जा रहा है. जिस दिन कश्मीर आज़ाद हुआ, उस दिन जो बचे-खुचे ‘काफ़िर’ हैं, उनके साथ क्या सलूक होगा ये बताने की जरूरत नहीं. क्या आपको नहीं लगता कि उन हालात का रिएक्शन पूरे देश में कैसा होगा? फौजी अत्याचार ये एक बड़ी कहानी आती है कश्मीर से. क्या लगता है कि किसी फौजी को मजा आता है लोगों को मारने में? वो भी आपके हमारे जैसे इंसान हैं. उन्हें भी वैसा ही फील होता होगा जैसा हमें होता है. जब बुद्धिजीवी किसी टीवी स्टूडियो में फौज को गरिया रहे होते हैं, उस वक्त कोई आतंकी लैंड माइन बिछाकर, AK 47 से निशाना साधे कश्मीर को सच में ‘स्वर्ग’ बनाने की तैयारी कर रहा होता है. जिन आतंकवादी घटनाओं और आतंकियों को आप अख़बारों में पढ़ते हैं, उनसे उनका रोज का सामना होता है. उनकी भी दिक्कतें हैं कि एक कश्मीरी आतंकी को पनाह दिए होता है. वो पकड़ें तो कैसे? गेहूं के साथ घुन तो पिसेगा ही साहब, ऐसे हालात में.
और हां, ये न भूलें कि इन पत्थर फेंकने वाले हाथों को पिछले साल डूबने से बचाने न गिलानी आया था, न भारत की बर्बादी वाले नारे और फेसबुक पोस्ट लिखने वाला उमर खालिद. उस समय यही फौजी थे, जिन्होंने इन पत्थर फेंकने वाले कश्मीरियों को बचाया. फौजी का धर्म हिंदू-मुस्लिम नहीं, देश होता है. उसने हमेशा अपना धर्म निभाते हुए देश और देशवासी को बचाया है. चाहे वो आतंकी को गोली मारकर हो या बाढ़ से बचा कर. कश्मीरी पैरोकार ये कौन लोग हैं, जो कश्मीर की आज़ादी के नेता बने हुए हैं? जो आए दिन भारत को कोसते हैं और पाकिस्तान से समर्थन मांगते हैं? वही गिलानी जो दिल्ली में इलाज कराता है. वही उमर खालिद जो JNU में पढ़ता है, लाहौर या इस्लामाबाद में पढ़ने नहीं जाता. वही गिलानी जिसके बच्चे विदेशों में सेटल हैं, पर आम कश्मीरियों के बच्चों को स्कूल में नहीं जाने देता.
हमारे देश में टूरिज्म से शहर के शहर बसे हैं और लोगों की आमदनी का जरिया हैं, पर कश्मीर सबसे खूबसूरत होकर भी टूरिज्म से महरूम है. गिलानी को फर्क नहीं पड़ता साहब. रोटी तो उस शिकारे वाले को नहीं मिलती जो डल झील में बैठा है. हम आम हिन्दुस्तानियों को कश्मीर समझ आए, न आए. उसका समाधान पता हो, न हो पर ये पता है कि जिस दिन कश्मीर को खुल्ला छोड़ा वो सांड बन जाएगा और उसकी सींगों का शिकार सब होंगे.
अप्रिय 'बुद्धिजीवियों' आपको मालूम हो न हो, पर आज दो ही तरह के कश्मीरी मुस्लिम खुशहाल जिंदगी बिता रहे हैं:
पहले, जो कश्मीर छोड़कर नौकरी करने हिंदुस्तान के बाकी हिस्सों में जा पहुंचे. दूसरे, जिन्होंने पत्थर फिंकवाने का ठेका लिया हुआ है.
बाकी बेचारे तो सिर्फ पत्थर फेंकने और आतंकियों के जनाजे में जाने को रह गए हैं. इसलिए दिमाग खोलो और जोर से बोलो:

जय हिन्द

(*ये लेखक के अपने विचार हैं.)


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