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जेरुसलेम और भारत के 800 साल पुराने रिश्ते की कहानी

Israel Palestine विवाद के केंद्र जेरुसलम में पंजाब के सूफ़ी संत बाबा फ़रीद का 800 साल पुराना लॉज है. इसे ज़ाविया अल-हिंदिया कहते हैं. यानी 'हिंद का लॉज'.

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जेरुसलेम में बाबा फ़रीद के लॉज के बाहर गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपानी (फोटो सोर्स- @vijayrupanibjp)

इज़रायल और फिलिस्तीनियों के बीच संघर्ष का एक बड़ा कारण है जेरूसलेम. जेरुसलम की कहानी हम आपको पहले भी बता चुके हैं. आज कहानी, इस शहर के साथ भारत के 800 साल पुराने रिश्ते की. 

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पुराने जेरुसलम शहर में भूरे रंग की एक दो मंजिला इमारत है. इस पर लगी एक पट्टी पर लिखा है-

“Indian Hospice, Estd. 12th century A.D., supported by Ministry of External Affairs, Government of India, New Delhi.”

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यानी, ‘भारतीय धर्मशाला, 12वीं सदी में निर्मित, भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से सहयोग प्राप्त.’ अक्टूबर 2021 में, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत और जेरुसलम के बीच 800 साल से चले आ रहे रिश्ते का जिक्र किया. और इस इमारत की नई पट्टिका का अनावरण किया. इसकी तरफ जाने वाली सड़क का नाम 'ज़ावियात अल-हुनूद' है, माने इंडियन कॉर्नर. इस इमारत की कहानी ही, भारत और जेरूसलेम के रिश्ते की कहानी है. 

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इमारत की कहानी

पंजाब के एक सूफी संत थे- बाबा फ़रीद. पूरा नाम हज़रत बाबा फ़रीदुद्दीन गंजशकर. बाबा फ़रीद की पैदाइश साल 1173 में मुल्तान के पास (अब पाकिस्तान में) के एक गांव कोठेवाल की मानी जाती है. उनके पुरखे एक वक़्त में काबुल से पंजाब आकर बसे थे. उन्होंने सूफी पंथ के चिश्ती संप्रदाय का पालन किया. पंजाबी में छंद लिखने वाले शुरुआती सूफी संतों में से एक बाबा फ़रीद के कुछ छंद, गुरु ग्रन्थ साहिब में भी शामिल हैं. पंजाब से आगे के अपने सफ़र के दौरान ही बाबा फ़रीद, जेरुसलम पहुंचे थे. यहां उन्होंने अल-अक्सा मस्जिद में इबादत की और छंद भी लिखे.

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कहा जाता है कि बाबा फ़रीद को पुराने जेरुसलम शहर में रहने के लिए एक छोटी सी लॉज जैसी जगह मिली थी. उन्होंने यहां 40  दिन बिताए थे. इस लॉज को मुसलमान बाब-अज़-ज़हरा कहते हैं, जबकि ईसाई, हेरोद गेट. ये लॉज, एक सूफी शैली की ख़ानक़ाह (संतों वगैरह के रुकने की जगह, मठ या आश्रम) के अंदर था. ये ख़ानक़ाह एक छोटी पहाड़ी के ऊपर बनी थी. सूफी संतों के अलावा, यहां सामान्य यात्रियों के रहने की भी व्यवस्था थी.

बाबा फ़रीद यहां से जाने के बाद, ये ख़ानक़ाह, भारतीय यात्रियों के लिए धर्मशाला बन गई. यानी भारतीय यात्रियों के रुकने की जगह. इसका नाम पड़ा- ज़ाविया अल-हिंदिया. यानी हिंद का लॉज. बाबा फ़रीद तो पंजाब लौट आए, लेकिन इसके बाद भारतीय मुसलमान, इस जगह पर इबादत करने के लिए जेरुसलम आने लगे. वक़्त बदला, तब ये जगह बस एक जगह थी. वक़्त के साथ यहां एक श्राइन बनी, यानी इबादतगाह, और फिर धर्मशाला.

लॉज की दीवार पर बाबा फरीद के नाम की तख्ती (फोटो सोर्स- विकिमीडिया कॉमन्स)

इस लॉज की ख़ास बात ये है कि इस जगह पर ईसाई, ऑटोमन और मामलूकों के हमले हुए. निज़ाम बदला, मजहबी अलम बदले, लेकिन लॉज का भारत के साथ रिश्ता बरकरार रहा.

लॉज का अब तक का सफ़र

इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, मध्यकालीन यात्री एवलिया चेलेबी ने साल 1671 में ज़ाविया अल-हिंदिया को शहर के सबसे बड़े ज़ाविया (लॉज) में से एक बताया. नवतेज सरना, अमेरिका में भारतीय राजनयिक रहे हैं, उन्होंने साल 1681 के एक दस्तावेज के हवाले से इस लॉज के स्वामित्व के बारे में बताया है. एक और डॉक्यूमेंट में साल 1824 में आटोमन शासन से जुड़े एक शख्स, गुलाम मोहम्मद अल-लाहौरी का जिक्र है, जिसने लॉज को और विकसित कराया.

ओटोमन शासन के दौरान, लॉज साउथ एशिया के शेखों की निगरानी में रहा. साल 1919 में जब ओटोमन साम्राज्य का पतन शुरू हुआ, उस दौरान, कुछ सालों तक जेरुसलम के ग्रैंड मुफ्ती, अमीन अल-हुसैनी, इस लॉज का काम देखते रहे. उन्होंने इसकी मरम्मत करवाई. इसके लिए उन्होंने गुलाम भारत की मुस्लिम रियासतों से भी मदद मांगी.

साल 1921 में ग्रैंड मुफ्ती ने भारतीय खिलाफत आंदोलन के नेताओं को बताया कि लॉज को मरम्मत की सख्त जरूरत है. उत्तर-प्रदेश में जिला है सहारनपुर. यहां के एक नौजवान ख्वाजा नज़ीर हसन अंसारी ने मरम्मत का काम संभाला. वो खिलाफत आंदोलन से जुड़े थे. साल 1924 तक इस रेनोवेशन का काम चला. साल 1939 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, लॉज ने उन ब्रिटिश भारतीय सैनिकों के लिए पनाहगाह का काम किया जो नॉर्थ अफ्रीका में जंग लड़ रहे थे.

फोटो सोर्स- X @HarishIfs
आज़ाद भारत और लॉज

1947 में देश आजाद हुआ. उसके बाद नज़ीर हसन ने मिस्र में भारतीय दूतावास से लॉज को आधिकारिक मान्यता देने का आग्रह किया था. लॉज ने अरब-यहूदियों की लड़ाई के दौर में कई हमले भी झेले हैं. साल 1952 में इस पर रॉकेट हमला हुआ. फिर 67 के 'सिक्स डे वॉर' में भी लॉज प्रभावित हुआ. लेकिन वक़्त के साथ, इसका विकास हुआ है. इस वक़्त लॉज 7 हजार वर्ग मीटर के इलाके में बना है. फिलवक्त इसके कैंपस में UNRWA और जेरुसलम हेल्थ सेंटर के क्लीनिक्स भी चलते हैं. साल 2000 में, तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह और फिलिस्तीनी नेता फैसल हुसैनी के बीच यहीं बैठक हुई थी. आज भी इस इलाके में पहुंचने वाला हर भारतीय राजदूत या बड़ा नेता लॉज का दौरा करता है.

आज किसका स्वामित्व है?

लॉज, भारतीय वक्फ़ बोर्ड के स्वामित्व की संपत्ति है. और अब यहां सिर्फ भारतीय या भारत से किसी भी तरह जुड़े रहे लोगों को ही जाने की अनुमति मिलती है. इसमें मेहमानों के रुकने के लिए 6 कमरे, एक डाइनिंग हॉल, एक छोटी मस्जिद, एक लाइब्रेरी और एक रसोईघर है. यहां आने वाले लोगों को सामान वगैरह मुहैया करवा दिया जाता है, लेकिन खाना पकाने और कपड़े धोने जैसे काम खुद से करने के लिए कहा जाता है.

इसका कामकाज, जेरुसलम में रहने वाले शेख मोहम्मद मुनीर अंसारी देखते हैं. अंसारी परिवार ही अब तक इसकी देखरेख करता आया है. साल 2011 में मुनीर को 'प्रवासी भारतीय सम्मान' दिया गया था. ये प्रवासी भारतीयों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान है. लॉज पर आज दो भारतीय तिरंगे लहरा रहे हैं. 15 अगस्त के रोज, अंसारी यहां कार्यक्रम भी आयोजित करते हैं.

जेरुसलम पर कब्जे के लिए सदियों से लड़ रहे लोगों की नज्र हमारे बाबा फ़रीद के छंदों की एक लाइन है-

"फरीदा जो तैं मरणी मुकीआं तिन्हां न मारे घुम्म"

माने, जो तुम पर वार करते हैं, उन पर पलटकर वार मत करो.

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