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क्या एक पॉप सिंगर दशकों से सत्ता में रह रहे तानाशाह को हरा देगा?

35 साल से सत्ता में बने हुए युगांडा के राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी.

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योवेरी मुसेवेनी और बॉबी वाइन. (तस्वीर: एएफपी)
आज कहानी एक चुनाव की. जिसने एक देश में उथल-पुथल मचा रखी है. समझिए कि जंग का माहौल है. एक तरफ एक नौजवान गायक है. जवां दिलों का चहेता. बदलाव का सिंबल. दूसरी तरफ है, एक मंझा हुआ राजनेता. दो तानाशाहों को हराकर सत्तासीन हुआ गुरिल्ला सैनिक. जिसने वादा किया था, देश में डेमोक्रेसी लाएंगे. फिर उसने वादे की ऐसी-तैसी कर दी. संविधान में हेर-फेर कर अजेय बने रहने का रास्ता साफ़ कर लिया. अब इसी चाह को चुनौती मिल रही है. इस लड़ाई में सोशल मीडिया ऐप्स पर ताला क्यों लग गया? वोटिंग के दिन राजधानी में मिलिटरी टैंक्स क्या कर रहे हैं? पूरा मामला विस्तार से बताते हैं.
विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. सेकेंड वर्ल्ड वॉर में मित्र राष्ट्रों की जीत के नायक. राजनीति में उनका कोई सानी नहीं था. एक और क्षेत्र में वो बेजोड़ थे. साहित्य. एक बार चर्चिल पूर्वी अफ़्रीका की यात्रा पर गए. वहां जो नज़ारा दिखा, वो उसके मुरीद हो गए. उन्होंने उस इलाक़े को नाम दिया, ‘पर्ल ऑफ़ अफ़्रीका’. यानी, अफ़्रीका का मोती.
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अफ़्रीकी देश युगांडा. (गूगल मैप्स)

दिया तो एक तोहफ़ा भी. एक पंक्ति की शक्ल में. चर्चिल ने लिखा, ‘ये परीकथाओं वाला देश है. आप रेलगाड़ी में बैठिए, और आपको दूसरे छोर पर बेहद ख़ूबसूरत दुनिया मिल जाएगी’. चर्चिल किसकी तारीफ़ में कसीदे गढ़ रहे थे और क्यों? वो बात कर रहे थे, युगांडा की. पूर्वी अफ़्रीका का एक साधन-संपन्न देश, जिसे लूटकर अंग्रेज़ अपनी तिज़ोरी भर रहे थे. ‘स्क्रैम्बल फ़ॉर अफ़्रीका’ में युगांडा अंग्रेज़ों के हिस्से आया था. फिर उन्होंने इसके दो हिस्से कर दिए. चमकदार, ऐशो-आराम वाला हिस्सा मालिकों के लिए था. जबकि दुत्कार और हाशिये वाली ज़िंदगी स्थानीय लोगों के लिए.
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विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. (तस्वीर: एएफपी)

बिग डैडी
इसी गुमनामी से निकला एक सिपाही. एक बॉक्सिंग चैंपियन. जो पहले ब्रिटिश आर्मी में कुक बना. कद-काठी मज़बूत थी तो, प्रमोट कर सीधे लड़ाई के मैदान में भेजा गया. फिर तो प्रमोशन का सिलसिला चल निकला. इसमें ठहराव तब आया जब अंग्रेज़ों ने युगांडा को आज़ादी दे दी.
साल था 1962 का. देश को आज़ादी मिली, लेकिन भूतपूर्व कुक और अब आर्मी अफ़सर को सलाखों के पीछे डालने की तैयारी चल रही थी. वजह, वॉर क्राइम्स का आरोप. फिर उसको सहारा मिला. मदद का हाथ आया. प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे का. ओबोटे न आर्मी अफ़सर का गुनाह माफ़ कर दिया. और, उसे आर्मी में कैप्टन बना दिया. वो था ईदी अमीन डाडा. जिसे युगांडा के लोग ‘बिग डैडी’ कहकर बुलाते थे.
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तत्कालीन प्रधानमंत्री मिल्टन ओबोटे. (तस्वीर: एएफपी)

नया हाथ, नया साथ और नए तेवर. ईदी अमीन ने इसे साध लिया. उसने मिल्टन ओबोटे का अहसान याद रखा. उसे चुकता भी किया. प्रधानमंत्री ओबोटे ने ईदी अमीन के दम पर तख़्तापलट कर दिया. ओबोटे नए राष्ट्रपति बन गए. ईदी अमीन की तरक्की उसी अनुपात में होने लगी. ये समीकरण जल्दी ही बिगड़ गया. और, फिर ऐसा हुआ कि राष्ट्रपति ओबोटे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने सिंगापुर गए. वापसी के रास्ते में पता चला, उनकी कुर्सी पर कोई और बैठ चुका है. ये ‘कोई और’ नहीं था. बल्कि उनका पुराना दोस्त ईदी अमीन था. ओबोटे अब शरणार्थी हो चुके थे. उन्हें पड़ोसी देश तंज़ानिया भागना पड़ा.
ईदी अमीन ने वीभत्स क़िस्सों का साम्राज्य खड़ा किया
मसलन, ईदी अमीन ने एक सपना देखा और 90 हज़ार एशियाई लोगों को घर-बार छोड़कर निकल जाने का हुक्म सुना दिया. मसलन, उसने अपना एयरपोर्ट और अपने सैनिक प्लेन हाईजैकर्स के कदमों में बिछा दिया. तब इजरायल ने चलाया था हैरतअंगेज़ ‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट’. और, ईदी अमीन की नाक के नीचे से लोगों को छुड़ाकर ले गए. मसलन, उसकी फ़्रिज़ में उसके दुश्मनों के सिर पड़े रहते थे. जिन्हें देखकर वो कहकहे लगाया करता था.
ये नरभक्षी तानाशाह हमेशा आर्मी की ड्रेस में घूमता. जिससे टंकी थी एक मशहूर कहावत, ‘युगांडा में जब आर्मी बोलती है, तब जनता सुनती है. और, जब आर्मी कुछ करती है, तब ख़ून की नदियां बहती हैं.’
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ईदी अमीन (तस्वीर: एएफपी)

ये चरितार्थ हुआ. साल 1979 में. जब ईदी अमीन की सेना कमज़ोर हुई और मिल्टन ओबोटे ने तंज़ानिया के साथ मिलकर धावा बोला. अप्रैल के महीने में ईदी अमीन को देश छोड़कर भागना पड़ा.
मिल्टन ओबोटे एक बार फिर राष्ट्रपति की गद्दी पर बैठे. उनसे बड़ी उम्मीदें थीं. लेकिन कुर्सी पर तानाशाही का रंग गहरा था. ओबोटे उसी रंग के आदी हो गए. वो बदलाव नहीं ला पाए, इसलिए उन्हें बदल दिया गया. जुलाई, 1985 में ओबोटे भी देश छोड़कर भाग गए.
आज ये कहानी क्यों सुना रहा हूं?
वजह है, एक कड़ी. एक नाम. जिसने ईदी अमीन और मिल्टन ओबोटे के तख़्तापलट में अहम भूमिका निभाई थी. कम्युनिस्ट गुरिल्ला सैनिक योवेरी मुसेवेनी. वो बरसों की उठापटक के बीच स्थायित्व की उम्मीद बनकर उभरे थे. बेहतर इंफ़्रास्ट्रक्चर. अच्छी इकोनॉमी और डेमोक्रसी लाने का वादा. 1986 में मुसेवेनी युगांडा के नौवें राष्ट्रपति बने.
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मुसेवेनी 1986 से युगांडा के राष्ट्रपति हैं. (एएफपी)

तब से इस देश ने पांच राष्ट्रपति चुनाव देख लिए. विरोधियों का हश्र देखा. दो दिलचस्प संविधान संशोधन भी देख लिए. युगांडा पर लट्टू अमेरिका भी देखा. लेकिन इन 35 सालों में जो चीज़ उन्हें नहीं दिखी, वो है नया राष्ट्रपति.
14 जनवरी को उनके पास ये मौका फिर से आया है. युगांडा में नया राषट्रपति चुनने के लिए वोटिंग हो रही है. योवेरी मुसेवेनी लगातार छठा चुनाव जीतने की कवायद में जुटे हैं. 1996 में उन्होंने पहली बार चुनाव जीता था. 2001 में दोबारा जीते. बतौर संविधान, ये उनका अंतिम कार्यकाल होता. एक राष्ट्रपति के लिए दो टर्म की लिमिट थी. मुसेवेनी ने इसे तोड़ा. संवैधानिक तरीके से. संविधान संशोधन के जरिए.
मुसेवेनी यहीं नहीं रुके
एक और संशोधन किया. सितंबर, 2019 में उनकी उम्र 75 साल हो जाती. इसके बाद वो राष्ट्रपति पद पर नहीं रह सकते थे. 2017 में उन्होंने इसे भी खत्म कर दिया. अब अधिकतम उम्र की सीमा खत्म हो चुकी है. साथ ही मुसेवेनी पर संबंधित पाबंदियां भी. कानूनी चुनौती खत्म.
लेकिन हक़ीक़त में ज़मीन इतनी भी समतल नहीं थी. वहां कुछ कोंपलें फूट आई थीं. इसमें सबसे लोकप्रिय नाम था, एक पॉप सिंगर का. झुग्गियों में पैदा हुआ लड़का. जिसने संगीत को अपना हथियार बनाया. संघर्ष के गीत लिखे. दुनियाभर में नाम कमाया. अब अपने लोगों के लिए अच्छी ज़िंदगी कमाने की चाहत. नाम रॉबर्ट चागुलानी सेंतामो. उर्फ़ बॉबी वाइन.
Artist Bobi Wine
पॉप सिंगर बॉबी वाइन. (तस्वीर: एएफपी)

जब मुसेवेनी पहली बार राष्ट्रपति बने, उस वक़्त बॉबी वाइन चार साल के थे. स्लम की ज़िंदगी से शुरुआत हुई. किसी तरह यूनिवर्सिटी पहुंचे. म्यूज़िक की पढ़ाई की. उसी हुनर के दम पर वो युगांडा की पहचान बन गए. युवाओं के बीच खूब पॉपुलर थे. दौलत और शोहरत एक साथ बरस रही थी, लेकिन बॉबी वाइन का मन कहीं और लगा था.
उस जगह पर, जहां से सत्ता को चाबी दी जा सके. राजनीति. ये ख़्वाहिश साल 2017 में पूरी हो गई. बॉबी वाइन बड़े अंतर से जीतकर संसद पहुंचे. इसके बाद तो उनका रंग ही निखर गया. वो राष्ट्रपति मुसेवेनी की खुलेआम आलोचना करने लगे. उनकी नीतियों पर सवाल खड़े करने लगे. बुनियादी अधिकारों के लिए बहस करने लगे. बॉबी वाइन को जनता का तगड़ा सपोर्ट मिला. चरण-चुंबक मीडिया के आदी हो चुके योवेरी मुसेवेनी को ये चुभने लगा. उन्हें अपने एकछत्र राज पर खतरा लगा.
फिर आई 13 अगस्त, 2018 की तारीख़
इस दिन बॉबी वाइन पर हमला हुआ. ये हमला हुआ राष्ट्रपति मुसेवेनी के इशारों पर. बॉबी वाइन की गाड़ी पर गोलियां चलीं. उनके ड्राइवर की मौके पर ही मौत हो गई. घायल बॉबी वाइन को मिलिटरी की जेल में रखा गया. वहां उन्हें बेतरह टॉर्चर किया गया. मेडिकल सुविधा तक नहीं दी गई. इस घटना ने जनता के मूड में उबाल ला दिया. युगांडा ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में बॉबी वाइन की रिहाई को लेकर प्रोटेस्ट हुए. इसका असर हुआ. बॉबी वाइन रिहा हो गए.
ये अंत नहीं था. दरअसल, ये एक क्रम की शुरुआत थी. जिसमें कई और सीढ़ियों का उतार-चढ़ाव आना बाकी था. बॉबी वाइन पर सरकारी शिकंजा कसता रहा. वो बार-बार अरेस्ट हुए. पुलिस की कस्टडी में उनको पीटा गया. उनके समर्थकों की हत्याएं हुईं. उन्हें राजनीतिक जीवन से बेदखल करने की सारी साज़िशें फ़ेल हुईं. बॉबी वाइन डटे रहे. जुलाई, 2019 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की बात कही. ये योवेरी मुसेवेनी को सीधी टक्कर का ऐलान था.
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कोर्ट परिसर में बॉबी वाइन. (तस्वीर: एएफपी)

इसके बाद भी उन्हें रोकने की कोशिशें जारी रहीं. बॉबी वाइन को पर्चा भरने तक से रोका गया. वो सब पार कर निकलते रहे. 18 नवंबर, 2020 को उन्हें फिर से अरेस्ट किया गया. इसके बाद तो राजधानी कम्पाला में बवाल हो गया. जनता सड़कों पर उतर आई थी. मुसेवेनी के ख़िलाफ़. मुसेवेनी ने अपनी तरफ से सेना को आगे कर दिया. बंदूकों के दम पर प्रोटेस्ट शांत हो गया. साथ में 57 आम ज़िंदगियां भी.
आज उन सारे हिसाबों का दिन है
युगांडा में 1.8 करोड़ मतदाता अपने भविष्य का खाका तैयार करने निकले हैं. योवेरी मुसेवेनी पर प्रेस को दबाने, विपक्षियों की हत्या करवाने, अपने चहेतों में संसाधन बांटने जैसे संगीन आरोप हैं. बेरोज़गारी और ग़रीबी की रफ़्तार भी बढ़ती जा रही है. लेकिन, मुसेवेनी के शासन का एक पहलू उन्हें भरोसेमंद भी बनाता है.
चाहे, वो युगांडा की आर्थिक हालत सुधारने का काम हो या ख़ूंख़ार तानाशाहों की ख़ब्त से जनता को निकालने का. मुसेवेनी ने स्थायित्व दिया है. लेकिन, जब चीज़ें एक जगह पर जम जाएं तो उनमें सड़न पैदा होने लगती है. मुसेवेनी के शासन का यही पहलू डराता है. वो आजीवन सर्वेसर्वा बने रहने का ख़्वाब देख रहे हैं. वो इसके लिए लोकतंत्र का गला घोंटने से भी परहेज़ नहीं करते.
Uganda Elections
युगांडा के लोग आज वोट कर रहे हैं. (एएफपी)

युगांडा की 80 फ़ीसदी आबादी 35 साल से कम की है. बॉबी वाइन की हमउम्र. उन्होंने ताउम्र मुसेवेनी को सत्ता चलाते देखा है. उन्हें बेहतर बदलाव चाहिए. बॉबी वाइन इसके झंडाबरदार है. उनका जीवन, उनके गीत, उनके वादे लोगों को पसंद आ रहे हैं.
ये वोट में बदलेगा या नहीं, ये तो नतीजे ही बता पाएंगे. इंतज़ार करते हैं. बहरहाल, इतना तो तय है कि ‘जीवित ईश्वर’ बनने का ख़्वाब पाले एक सत्ताधीश के महल में एक अदने से गायक ने पलीता तो लगा ही दिया है.
 

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