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कॉमनवेल्थ गेम्स खेलने गए श्रीलंका के 10 खिलाड़ी गायब!

1993 में श्रीलंका के 11 लोगों की टीम एक स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लेने कनाडा गई. इसमें से सिर्फ एक खिलाड़ी वापस लौटा. बाकी के 10 बिना बताए कनाडा में ही रह गए.

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बड़े इवेंट्स से खिलाड़ियों के गायब होने का इतिहास लम्बा रहा है. (तस्वीर-ट्विटर)

इंग्लैंड के बर्मिंघम शहर को किस तरह याद किया जा सकता है?

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- यूरोप की सबसे बड़ी पब्लिक लाइब्रेरी बर्मिंघम में है.

- टाइटेनिक जहाज का लंगर इसी शहर में बना था.

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- 1859 में यहीं पर लॉन टेनिस के खेल का आविष्कार हुआ था.

- इसी शहर में वो मैदान है, जिसे इंग्लिश क्रिकेट का किला कहा जाता है. एजबेस्टन. इस मैदान पर आज तक भारत एक भी टेस्ट मैच नहीं जीत पाया है.

- बर्मिंघम वही शहर है, जिसने 2022 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेज़बानी की है.

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- और, इसी बर्मिंघम के कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा लेने आई श्रीलंकाई टीम के 10 सदस्य गायब हो गए हैं. कैसे गायब हो गए? कहां गए? अभी इसका पता नहीं चल सका है. पुलिस जांच कर रही है.

लेकिन इतना ज़रूर पता है कि वर्ल्ड स्पोर्ट्स इवेंट्स से टीम मेंबर्स के गायब होने की ये पहली घटना नहीं है. इसका लंबा इतिहास रहा है. 

जानेंगे, 

इन बड़े इवेंट्स से खिलाड़ी गायब होकर जाते कहां हैं?

पहले एक दिलचस्प कहानी सुनाते हैं. अमेरिका की एक पत्रिका है. मेल मैगज़ीन. 2021 में मैगज़ीन ने एक स्टोरी छापी थी. टाइटल था,

How did an entire Sri Lankan Handball team vanish in Germany?
श्रीलंका की समूची हैंडबॉल टीम जर्मनी में कैसे गायब हो गई?

इसमें एक ऐसी नेशनल टीम की कहानी सुनाई गई थी, जिसके बारे में श्रीलंका का खेल मंत्रालय भी नहीं जानता था. इस टीम में कुल 23 लोग थे. वे टूर्नामेंट के बीच में होटल छोड़कर फरार हो गए थे. इस टीम को आतंकवादी तक कहा गया. लेकिन वे कोई और खेल ही खेल रहे थे. अस्तित्व बचाने का खेल.

ये क़िस्सा 1981 के साल में शुरू हुआ था. जर्मनी के एक टेबल टेनिस खिलाड़ी थे, डेरमेत डोयरिंग. वो 10 दिनों के लिए छुट्टियां बिताने श्रीलंका आए थे. उन्होंने पूरी ट्रिप के लिए एक टैक्सी हायर की. ड्राइवर के पास ट्रिप के लिए पर्याप्त कपड़े नहीं थे. वो रास्ते में अपने घर पर रुका. साथ में डोयरिंग को चाय पिलाने ले गया. टैक्सी ड्राइवर के घर पर ट्रॉफ़ियों का का ढेर लगा था. ये ट्राफ़ियां टेबल टेनिस के खेल में जीती गईं थी. इसे ड्राइवर की सगी बहन ने जीता था. डोयरिंग काफी प्रभावित हुए. उन्होंने मिलने की इच्छा जताई. ये मुलाक़ात प्यार में बदली और डोयरिंग श्रीलंका के होकर रह गए.

उन्होंने टेबल टेनिस की कोचिंग में हाथ आजमाया. 1989 तक वो श्रीलंका की नेशनल टीम के कोच बन चुके थे. उसी दौरान उन्हें एक आइडिया आया. उन्होंने सोचा कि क्यों ना ऐसा सिस्टम बनाया जाए, जिसमें दोनों देश खेलों के ज़रिए एक-दूसरे से जुड़ें. उन्होंने इसे अधिकारियों के साथ साझा किया. तब जाकर एशियन-जर्मन स्पोर्ट्स एक्सचेंज प्रोग्राम (AGSEP) की बुनियाद रखी गई. इस प्रोग्राम में क्या होता था? इसके तहत, श्रीलंका की टीम मैच खेलने जर्मनी जाती. बदले में जर्मनी की टीमें श्रीलंका आतीं थी. ये टीमें अलग-अलग खेलों में हिस्सा लेती थी. ये मैच दोस्ताना होते थे. इनका अंतरराष्ट्रीय रेकॉर्ड नहीं रखा जाता था.

AGSEP के तहत, 1989 से 2004 के बीच सैकड़ों टूर्नामेंट आयोजित किए गए. ये काफी सफल रहा था. फिर एक फ़ोन कॉल ने पूरा खेल बदल दिया. ये कॉल श्रीलंका के खेल मंत्रालय से आया था. डोयरिंग के पास. उनसे दरख़्वास्त की गई कि वो जर्मनी की नेशनल हैंडबॉल टीम को श्रीलंका बुलाएं. जर्मन टीम आई. उस समय श्रीलंका में हैंडबॉल उतना लोकप्रिय नहीं था. गिनती के लोग ही ये गेम खेलते थे. फिर भी जुगाड़ 23 लोगों की टीम बनी. उनमें से किसी को हैंडबॉल खेलना नहीं आता था. किसी तरह उन्हें बेसिक्स सिखाए गए. मैच हुआ तो श्रीलंका 36-2 के अंतर से हार गया.

जर्मन पार्टी को थोड़ा-थोड़ा शक़ होने लगा था. लेकिन वे प्रोग्राम में कोई रुकावट नहीं चाहते थे. इसलिए, उन्होंने श्रीलंकाई टीम को जर्मनी बुलाया. 10 मैचों का टूर्नामेंट फ़िक्स किया गया. पहले मैच में श्रीलंकाई टीम एक भी पॉइंट हासिल करने में नाकाम रही. इसके बावजूद जर्मन लोगों ने उनका मज़ाक नहीं उड़ाया. बदले में उनका हौसला बढ़ाया. रात में उनके लिए डिनर पार्टी आयोजित की गई. अगले दिन उनका दूसरा मैच था. लेकिन मैच से ठीक पहले श्रीलंका टीम के सभी खिलाड़ी होटल से गायब हो गए. वे चुपचाप इटली के लिए निकल चुके थे.

जब इस बारे में श्रीलंका की स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री से पूछा गया, उन्होंने तुरंत अपना पल्ला झाड़ लिया. उनकी तरफ़ से कहा गया,

श्रीलंका में हैंडबॉल का खेल शायद ही कहीं खेला जाता है. और, इसकी नेशनल टीम के बारे में हमें कुछ भी पता नहीं है.

जिस समय ये कांड हुआ, उस समय श्रीलंका में सिविल वॉर चल रहा था. फ़ॉक्स न्यूज़ ने ख़बर चलाई कि लिट्टे के आतंकियों को जान-बूझकर जर्मनी में घुसाया गया है. डोयरिंग को इसका मास्टरमाइंड बताया गया. वे गायब हुए टीम मेंबर्स को कोर्ट में घसीटना चाहते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. समय के साथ उन्हें कहानी के पीछे की कहानी मालूम चली.

फिर पता चला कि सिविल वॉर और बेरोज़गारी से परेशान 23 लोग किसी तरह देश छोड़ना चाहते थे. उन्हें किसी और देश में अच्छी नौकरी की ज़रूरत थी. ताकि वो अपने घरवालों का ख़याल रख सकें. इसी ऐसे में उनके पास जर्मनी जाने का ऑफ़र आया. बदले में उन्हें कुछ पैसे देने थे और, हैंडबॉल खेलना सीखना था. उन्होंने शर्तों को मान लिया. हैंडबॉल सीखा. जर्मनी गए और वहां से गुपचुप तरीके से इटली निकल गए. बाद में उनमें से कुछ वापस श्रीलंका लौट आए. कुछ ने इटली में नौकरी पकड़ ली. उन्होंने अपने परिवारवालों की मदद करने की पूरी कोशिश की. कुछ सफ़ल हुए. बाकियों का संघर्ष जारी रहा.

ये घटना ऐतिहासिक थी. लेकिन ना तो पहली थी और ना ही इकलौती. अभी तक कम-से-कम 44 बार श्रीलंकाई टीम के सदस्य दूसरे देशों में गायब हो चुके हैं. कुछ बड़ी घटनाओं के बारे में जान लेते हैं:

- 1993 में श्रीलंका के 11 लोगों की टीम एक स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लेने कनाडा गई. इसमें से सिर्फ एक खिलाड़ी वापस लौटा. बाकी के 10 बिना बताए कनाडा में ही रह गए.

- 2007 में ट्रिपल जंप के एक इवेंट में गई श्रीलंकाई टीम का एक कोच इटली में गायब हो गया. उसे इंटरनैशनल ओलंपिक काउंसिल की तरफ़ से एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लेने भेजा गया था.

- 2014 में साउथ कोरिया में एशियन गेम्स का आयोजन हुआ. इसमें श्रीलंका के दो खिलाड़ी गायब हो गए. एक हॉकी टीम, जबकि दूसरा बीच बॉल टीम का प्लेयर था. दोनों के बारे में अभी तक पता नहीं चल सका है. मीडिया रपटों के मुताबिक, वे साउथ कोरिया में नौकरी की तलाश में निकल गए. दोनों खिलाड़ियों को ब्लैकलिस्ट किया जा चुका है.

- इस तरह की घटनाओं से श्रीलंका का नाम ख़राब हो रहा था. उन्हें ग़लत निगाहों से देखा जा रहा था. अक्टूबर 2021 में उन्होंने इसे रोकने के लिए सख़्त कदम उठाए. कुश्ती टीम के लिए अलग से एक मेनेजर नियुक्त किया. मेनेजर का नाम था, डोनाल्ड इंद्रवंसा. उनका काम था, खिलाड़ियों पर नज़र रखना और उन्हें गायब होने से रोकना. इंद्रवंसा की निगरानी में श्रीलंका की कुश्ती टीम वर्ल्ड चैंपियनशिप खेलने ओस्लो पहुंची. टूर्नामेंट ठीक से खत्म हो गया. घर-वापसी से एक दिन पहले इंद्रवंसा ने टीम को कहा कि मैं एम्बेसी जा रहा हूं, वहां मुझे कुछ काम है. लेकिन वो ना तो एम्बेसी पहुंचे और ना ही लौटकर टीम के पास आए. उनके बारे में आज तक कुछ मालूम नहीं चल सका है.

ऐसा नहीं है कि इन इवेंट्स में सिर्फ़ श्रीलंका के ही खिलाड़ी गायब होते हैं या अपनी नागरिकता छोड़ते हैं. इसकी लंबी लिस्ट है.

मसलन, 1956 के ओलंपिक्स की मेज़बानी ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर को मिली. प्रतियोगिता 22 नवंबर से शुरू होने वाली थी. टीमें तैयारी और माहौल में ढलने के लिए पहले ही पहुंचने लगी थी. इनमें हंगरी की टीम भी थी. जैसे ही वे मेलबर्न में दाखिल हुए, उन्हें पता चला कि उनके देश में क्रांति हो चुकी है. और, इस क्रांति को दबाने के लिए सोवियत संघ ने अपनी सेना उतार दी है. इस ख़बर ने सोवियत संघ और हंगरी की टीमों के बीच तनाव बढ़ा दिया. जब वॉटर पोलो के मैच में उनका आमना-सामना हुआ, तब वे आपस में ही भिड़ गए. कुछ खिलाड़ियों के चेहरे ख़ून से लाल हो चुके थे. मैच को तय समय से पहले ही रोकना पड़ा. इसमें इतनी हिंसा हुई थी कि इस मैच को इतिहास में ‘ब्लड इन द वॉटर’ के नाम से जाना जाने लगा.
ओलंपिक्स खत्म होने के बाद हंगरी के दल में शामिल 50 से अधिक लोगों ने अमेरिका में शरण ले ली. वे वापस अपने देश नहीं गए.

- क़्वार्ज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 के गोल्ड कोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के बाद दो सौ से अधिक खिलाड़ियों और अधिकारियों ने ऑस्ट्रेलिया में शरण मांगी थी. इनमें से अधिकतर अफ़्रीकी देशों के थे. कुछ खिलाड़ी तो मैच से पहले ही होटल छोड़कर भाग गए. उन्होंने इवेंट में हिस्सा भी नहीं लिया था. बाद में ऑस्ट्रेलिया सरकार ने चेताया कि ऐसे लोगों को सज़ा दी जाएगी. इसके बाद गायब हुए लोग वापस लौटे. कुछ ने शरण के लिए अप्लाई किया. बाकी वापस अपने वतन लौट गए.

- 2012 के लंदन ओलंपिक्स के बाद 21 विदेशी खिलाड़ी और कोच गायब हो गए. उनका अभी तक पता नहीं चला है. इसके अलावा, 82 और लोगों ने यूके में शरण के लिए आवेदन दिया था.
- इससे पहले 2006 के मेलबर्न कॉमनवेल्थ गेम्स में 40 से अधिक खिलाड़ी और अधिकारी गायब हुए थे.

- 2002 में कॉमनवेल्थ गेम्स मैनचेस्टर में आयोजित हुए थे. इस दौरान 26 खिलाड़ी और अधिकारियों ने अपनी टीम छोड़ दी थी.

- साल 2000 के सिडनी ओलंपिक्स में हिस्सा लेने आए सौ से अधिक एथलीट्स तय से अधिक समय तक ऑस्ट्रेलिया में रहे थे.

- नॉर्थ कोरिया से साउथ कोरिया में शरण लेने वालों की अपनी कहानियां रहीं है. अभी तक लाखों लोग अवैध तरीके से बॉर्डर पार करके साउथ कोरिया जा चुके हैं. जहां तक एथलीट्स की बात है, उनके लिए सख़्त पहरा बिठाया जाता है. उन्हें रोकने के लिए नॉर्थ कोरिया टीम के साथ अपने खुफिया एजेंट्स भी भेजता है. तमाम निगरानी के बावजूद 1997 और 1999 में नॉर्थ कोरिया के दो खिलाड़ी टीम छोड़कर जा चुके हैं.

अब सवाल ये उठता है कि खिलाड़ी अपनी टीम छोड़कर क्यों जाते हैं?

इसकी कई वजहें हैं.

- पहली वजह आर्थिक है. अभी तक जिन भी देशों के खिलाड़ी या कोच या प्रबंधन के लोग गायब होते हैं, उन देशों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती है. श्रीलंका का उदाहरण ले लीजिए. श्रीलंका इस समय भारी आर्थिक संकट से जूझ रहा है. बुनियादी चीजों की कमी है. वहां आंदोलन के बाद राष्ट्रपति को देश छोड़कर भागना पड़ा. आम जनता का भविष्य अनिश्चित है. यही चीज खिलाड़ियों पर भी लागू है. उन्हें भी अपने घरवालों की चिंता रहती है. उन्हें भरोसा होता है कि यूरोप जैसे देशों में उन्हें अच्छी-खासी नौकरी मिल जाएगी और वे अपने घरवालों की मदद कर पाएंगे.

- दूसरी वजह राजनैतिक है. मसलन, अफ़्रीका के कई देशों में सिविल वॉर चल रहा है. मार-काट और हिंसा रूटीन का हिस्सा बन चुका है. कुछ देशों में लोकतंत्र नहीं है. व्यक्तिगत आज़ादी नहीं है. लोगों के पास बुनियादी अधिकार नहीं हैं. जैसे, टोक्यो ओलंपिक्स के दौरान बेलारूस की एक स्प्रिंटर ने पोलैंड में शरण ली थी, क्योंकि उसे अपने देश में दमन का ख़तरा सता रहा था.

- तीसरी वजह है, बेहतर भविष्य का मौका. दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जहां सिर्फ़ स्पोर्ट्स के सहारे ज़िंदगी नहीं गुज़ारी जा सकती. उन्हें ना तो उतनी शोहरत मिलती है और ना ही उतना पैसा. पश्चिमी देशों में उन्हें अपने लिए बेहतर भविष्य दिखता है. उन्हें ये महसूस होता है कि अगर स्पोर्ट्स ना सही, कोई छोटी-मोटी जगह पर नौकरी ही मिल गई तो भविष्य सुधर जाएगा. पश्चिमी देश खिलाड़ियों को शरण देने में थोड़ी रियायत देते हैं. इस वजह से भी खिलाड़ी स्पोर्ट्स इवेंट्स से गायब होते रहते हैं.

आज हम ये चर्चा क्यों कर रहे हैं?

जैसा कि हमने पहले भी बताया, श्रीलंकाई दल के दस सदस्य बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स से गायब हो चुके हैं. इस टूर्नामेंट में श्रीलंका ने 160 सदस्यों का दल भेजा था. टीम के खाते में चार मेडल आए. एक सिल्वर और तीन ब्रॉन्ज़. इसके बरक्स उनके दस मेंबर चले गए. कहां चले गए? अभी इस बारे में पुष्ट जानकारी नहीं आई है. मेनेजमेंट ने सभी सदस्यों का पासपोर्ट अपने पास रखा था. इसके बावजूद उन्हें गायब होने से रोका नहीं जा सका. अभी जांच चल रही है, इसलिए दावे से नहीं कहा जा सकता कि उनके साथ क्या हुआ.
हालांकि, जैसा कि रेकॉर्ड रहा है, उसमें संभावना यही बन रही है कि वे अपना वतन छोड़कर इंग्लैंड में बसने वाले हैं.

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