Taranjit Singh Sandhu: लोकसभा चुनाव 2024 में पंजाब के अमृतसर की अहम सीट पर भाजपा ने प्रत्याशी के तौर पर तरनजीत सिंह संधू के नाम का ऐलान किया. अमेरिका में भारत के राजदूत रह चुके संधू हाल ही में भाजपा में शामिल हुए थे. चुनाव प्रचार में उन्होंने एक मंच से कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें पॉलिटिक्स में आने के लिए प्रेरित किया.
कौन हैं तरनजीत संधू जिन्हें दिल्ली का नया उपराज्यपाल बनाया गया है?
Who is Taranjit Singh Sandhu: तरनजीत सिंह संधू रमेश भंडारी के बाद दिल्ली के दूसरे ऐसे उपराज्यपाल होंगे, जो पहले कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं.


संधू के मुताबिक उन्हें सुझाव दिया गया कि राजनीति में उतरना चाहिए और वह तैयार भी हो गए. संधू ने कहा कि हालांकि वो अभी तय नहीं कर पाए हैं कि उनका ये फैसला सही है या नहीं. फिर आ गया चुनाव का रिजल्ट और संधू चुनाव हार गए.
कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला ने एक और पूर्व डिप्लोमेट हरदीप सिंह पुरी की ही तरह उनको भी चुनाव में बुरी तरह हरा दिया. अब इस हार के 2 साल बाद पीएम मोदी की प्रेरणा से राजनीति में आने वाले संधू को बहुत बड़ी जिम्मेदारी मिली है. उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भाजपा शासित वाली दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया है. संधू जो भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के 1988 बैच के रिटायर्ड अफसर हैं. वो दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना की जगह लेंगे.
इंडियन एक्सप्रेस ने एक सूत्र के हवाले से बताया कि इस पद के लिए संधू का चयन काफी सोच-समझकर किया गया है. वह भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी काफी करीबी हैं. बताया गया कि पीएम मोदी राजधानी दिल्ली को ‘वैश्विक राजधानी’ के तौर पर विकसित करना चाहते हैं. दिल्ली के उपराज्यपाल का पद अन्य प्रदेशों के राज्यपालों से थोड़ा अलग होता है. यहां के उपराज्यपाल को बाकी राज्यपालों से ज्यादा एक्टिव रोल निभाना होता है.
इस पद पर बैठे व्यक्ति को सिर्फ मौजूद रहना ही नहीं, बल्कि कई तरह के महत्वपूर्ण लोगों से सीधे तौर पर संपर्क भी करना पड़ता है. इसमें अलग-अलग राजनीतिक दलों के वीआईपी नेता, विदेश से आने वाले उच्चस्तरीय मेहमान, विदेशी डिप्लोमेट्स और भारत में निवेश की संभावना तलाशने वाले इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स शामिल होते हैं. ऐसे में दिल्ली के उपराज्यपाल के लिए व्यावहारिक अनुभव, कूटनीतिक समझ और बड़े स्तर के लोगों के साथ काम करने का अनुभव होना बहुत जरूरी माना जाता है.
मोदी सरकार के इस खास मिशन में संधू की कूटनीतिक भाषा पर गहरी पकड़ और उनका शानदार ग्लोबल नेटवर्क काफी काम आ सकता है.
तरनजीत सिंह संधू, रमेश भंडारी के बाद दिल्ली के दूसरे ऐसे उपराज्यपाल होंगे जो पहले कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं. वह एक प्रतिष्ठित, पढ़े-लिखे और स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से आते हैं. 23 जनवरी 1963 को जन्मे संधू की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई पंजाब के सनावर के लॉरेन्स स्कूल में हुई. इसके बाद वह दिल्ली के स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ने आ गए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशन में मास्टर्स की डिग्री हासिल की.
संधू प्रसिद्ध शिक्षाविदों के घराने से आते हैं. उनके पिता बिशन सिंह समुंद्री गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति थे. वहीं, उनकी मां जगजीत कौर संधू अमृतसर में ‘गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वुमन’ की प्रिंसिपल थीं. वह ‘सिख धर्म सुधारक’ तेजा सिंह समुंद्री के पोते भी हैं, जो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के संस्थापकों में से एक थे. आज भी एसजीपीसी की मीटिंग्स जिस बिल्डिंग में होती है, उसका नाम समुंद्री के नाम पर है.
तेजा सिंह समुद्री आजादी की लड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक थे. राजद्रोह के आरोप में अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया था. बाद में जेल में ही 1926 में उनका निधन हो गया.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता रहे तेजा सिंह समुंद्री की शहादत के 100वें साल पर उनके पोते तरनजीत सिंह तेजा दिल्ली के उपराज्यपाल बन गए हैं.
1988 बैच के आईएफएस अधिकारी तरनजीत सिंह का करियर सोवियत संघ (1990-1992) में पोस्टिंग के साथ शुरू हुआ. वह मॉस्को में भारतीय दूतावास में तृतीय सचिव (राजनीतिक) और द्वितीय सचिव (वाणिज्यिक) अधिकारी के तौर पर नियुक्त किए गए. बाद में सोवियत संघ के विघटन के बाद संधू को यूक्रेन में भारतीय दूतावास खोलने के लिए भेजा गया. वहां कीव में उन्होंने 1992 से लेकर 1994 तक भारतीय दूतावास में राजनीतिक और प्रशासनिक विभागों के प्रमुख के रूप में काम किया.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, दिसंबर 1995 से मार्च 1997 तक संधू भारतीय विदेश मंत्रालय में प्रेस रिलेशन के विशेष अधिकारी बनाए गए. इसके तहत उन्हें भारत में विदेशी मीडिया के रिपोर्टर्स को मैनेज करने की जिम्मेदारी दी गई थी. बताया जा रहा है कि एलजी बनने के बाद उनका यही अनुभव दिल्ली के उपराज्यपाल के तौर पर ग्लोबल डिप्लोमेटिक प्रवक्ताओं (Interlocutors) और वैश्विक निवेशकों से संपर्क में काम आएगा.
संधू यूनाइटेड नेशन भारत में मिशनों में भी अहम पद पर नियुक्त किए गए. बाद में नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय के मानव संसाधन विभाग के प्रमुख संयुक्त सचिव (प्रशासन) के तौर पर भी काम किया. वॉशिंगटन डीसी में भारतीय राजदूत के रूप में कार्यभार संभालने से पहले संधू जनवरी 2017 से जनवरी 2020 तक श्रीलंका में भारत के हाई कमिश्नर थे. इससे पहले भी वो कोलंबो में भारतीय हाई कमीशन में पॉलिटिकल विंग के प्रमुख बने थे.
कोरोना काल में संधू ने 2020 से 2024 तक अमेरिका में भारतीय राजदूत के तौर पर काम किया. साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिका गए थे, तब संधू ही वहां भारत के राजदूत थे. 2024 में रिटायर होने तक वह इस पद पर बने रहे. वॉशिंगटन डीसी में लंबे समय तक काम करने वाले संधू को अमेरिका मामलों का गहरा जानकार माना जाता है.
साल 2013 से 2017 तक वह वॉशिंगटन डीसी में वह एक भारतीय मिशन के उप प्रमुख थे. साल 1997 से 2000 तक वॉशिंगटन में प्रथम सचिव बनकर भी वहां रहे. साल 1998 में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, उसके बाद अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाए थे. इस दौरान दोनों देशों के संबंधों को बहाल करने में संधू ने बड़ी भूमिका निभाई थी. वह उस टीम का हिस्सा थे जिसने अमेरिकी गुस्से का सामना किया और खामोशी से भारत पर लगे प्रतिबंधों को हटवाने में कामयाब रहे.
तकरीबन 35 साल के प्रशासनिक करियर के बाद अब संधू दिल्ली की कमान संभालने के लिए तैयार हैं.
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