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यूरेनियम से जुड़ी ये सिफारिश मान ली गई तो न्यूक्लियर फ्यूल सप्लाई आसान हो जाएगी

भारत के PHWR परमाणु रिएक्टरों के लिए यूरेनियम की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए संसदीय समिति ने खनन नियमों में बदलाव सुझाए हैं. समिति ने सिंगल विंडो क्लियरेंस के साथ मौजूदा माइनिंग लीज के विस्तार की प्रक्रिया आसान करने की भी सिफारिश की है.

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यूरेनियम खनन को लेकर नियम बदलने की सिफारिश. (फोटो- India today)

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  • संसदीय समिति ने यूरेनियम खनन के नियमों में बदलाव की सिफारिश की है, जिसमें सिंगल विंडो क्लियरेंस और खनन लीज के लगातार विस्तार के प्रावधान शामिल हैं ताकि PHWR के लिए फ्यूल सप्लाई सुनिश्चित हो सके।
  • यूरेनियम खनन में कई विभागों से अलग-अलग मंजूरियां लेने की जटिल प्रक्रिया और MMDR कानून के तहत लीज विस्तार की कठिनाइयों के कारण फ्यूल सप्लाई में देरी और लागत वृद्धि होती है।
  • सिफारिशों के लागू होने से यूरेनियम की सप्लाई दीर्घकालिक रूप से भरोसेमंद होगी, और सरकार की अंतिम प्रतिक्रिया के बाद नियमों में आवश्यक सुधार हो सकेंगे।

यूरेनियम खनन के नियमों को लचीला बनाने के लिए एक संसदीय समिति की सिफारिश केंद्र सरकार के पास आई है. इसमें कहा गया है कि भारत के PHWR परमाणु रिएक्टरों के लिए फ्यूल की सप्लाई लगातार और बिना देरी के हो सके, इसके लिए यूरेनियम खनन से जुड़े नियमों में तत्काल बड़े बदलावों की जरूरत है. इन बदलावों में सिंगल विंडो क्लियरेंस और खनन लीज के लगातार (contiguous) विस्तार के प्रावधान शामिल हैं.

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सिंगल विंडो क्लियरेंस यानी खनन के लिए एक ही दफ्तर से हर जरूरी मंजूरियां मिल जाएं. दरअसल, भारतीय यूरेनियम निगम लिमिटेड (UCIL) को खनन की मंजूरी के लिए कई एजेंसियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. इनमें पर्यावरण और वन मंत्रालय, AERB (परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड), DGMS (खान सुरक्षा महानिदेशालय), प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भूमि और जल अनुमति विभाग जैसे दफ्तर शामिल हैं.

इंडिया टुडे से जुड़े मनजीत नेगी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समिति ने सिफारिश की है कि यूरेनियम खनन के लिए सभी विभागों की क्लियरेंस एक ही दफ्तर से मिल जाए तो खनन का काम आसान हो सकेगा. समिति ने कहा कि अलग-अलग एजेंसियों से क्लियरेंस लेने की ये प्रक्रिया प्रोजेक्ट की टाइमिंग बढ़ा सकती है. इससे प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) के लिए फ्यूल सप्लाई की व्यवस्था पर असर पड़ता है.

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समिति ने दूसरी समस्या लीज की बताई है. कहा कि कई बार नई खोजी गई यूरेनियम की परतें या गहराई में मिलने वाली लेयर्स मौजूदा लीज की सीमा से बाहर तक फैली होती हैं. फिलहाल जो MMDR कानून है, उसके तहत लीज इलाके को आसानी से बढ़ाने की इजाजत नहीं है. इस वजह से कंपनियों को अलग से नई लीज और मंजूरियां लेनी पड़ती हैं. इससे परियोजनाओं का आर्थिक और तकनीकी खर्च बढ़ जाता है. इसके नियमों में सुधार की सिफारिश भी समिति ने की है.

समिति ने ये भी कहा है कि परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अध्यक्ष की अगुआई में एक ऐसा मंच बनाया जाए जो मंत्रालयों के बीच की अड़चनों को एक तय समय-सीमा के भीतर सुलझा सके. इसके अलावा, इस मुद्दे से जुड़े भूमि अधिग्रहण, विस्थापित लोगों के पुनर्वास (R&R), इंडस्ट्रियल वाटर सप्लाई और आपातकालीन योजना के समाधान के लिए राज्य स्तर पर एक ढांचा तैयार किया जाए. समिति का मानना ​​है कि नियमों में ये सुधार करने से UCIL की ओर से न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) को यूरेनियम की सप्लाई ज्यादा भरोसेमंद हो जाएगी.

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जो रणनीतिक खनिज देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और मॉडर्न टेक्नॉलजी से जुड़े होते हैं, उनको लेकर नियम बनाने के लिए एक समिति ने सरकार के सामने ये सिफारिशें पेश की हैं. इन सिफारिशों पर सरकार ने भी अभी केवल अंतरिम जवाब दिया है. उसके अंतिम जवाब का इंतजार है.

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