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पैदा हुआ हिंदू, मरते वक्त था ईसाई, कहां दफन होगा शव इस पर सुप्रीम कोर्ट भी 'बंट' गया

विवाद इस बात पर था कि क्या मृतक को उसी सामान्य कब्रिस्तान में दफनाया जा सकता है, जहां उसके हिंदू पूर्वजों को दफनाया गया था. क्योंकि उसने ईसाई धर्म अपना लिया था. मृतक सुभाष बघेल के बेटे रमेश बघेल ने इसे लेकर याचिका दायर की थी.

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जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने मामले की सुनवाई की. (फ़ोटो- इंडिया टुडे)

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के ईसाई व्यक्ति के अधिकारों से जुड़े मामले में बंटा हुआ फैसला दिया है. इस शख्स की मौत हो चुकी है. विवाद इस बात पर है कि इस शख़्स को उसके पैदाइश वाले गांव 'छिंदवाड़ा' में दफनाया जाए या दूसरे गांव में जो 20 किलोमीटर दूर है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा मामले की सुनवाई कर रहे हैं. दोनों जजों ने मामले में विभाजित निर्णय सुनाया है. हालांकि, मामले को बड़ी बेंच के पास नहीं भेजा गया है. क्योंकि मृतक का शव लगभग 20 दिनों से मोर्चरी में पड़ा है. ऐसे में अदालत ने याचिकाकर्ता की मांग से इतर शव को दूसरे गांव में दफनाने का अंतिम फ़ैसला सुना दिया है.

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विवाद का कारण

विवाद इस बात पर था कि क्या मृतक को उसी सामान्य कब्रिस्तान में दफनाया जा सकता है, जहां उसके हिंदू पूर्वजों को दफनाया गया था. क्योंकि उसने ईसाई धर्म अपना लिया था. मृतक सुभाष बघेल के बेटे रमेश बघेल ने इसे लेकर याचिका दायर की थी. इसमें मांग की गई कि उसके पिता को अपने पूर्वजों के समान ही भूमि में दफनाए जाने का अधिकार है. सिर्फ़ इसलिए उनके साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है.

वहीं, छत्तीसगढ़ सरकार ने इस बात पर जोर दिया था कि मृतक को ईसाइयों के लिए एक अलग कब्रिस्तान (करकवाल गांव के) में दफनाया जाना चाहिए, जो गांव से 20 किलोमीटर दूर है. ताकि ‘कानून-व्यवस्था की संभावित समस्या’ से बचा जा सके. पैदाइशी गांव में दफनाए जाने का उस गांव के लोगों ने विरोध किया था. साथ ही कहा कि उनके गांव में सिर्फ़ हिंदुओं को दफन करने की जगह है, ईसाइयों को दफन करने की नहीं.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

आज सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की बेंच भी इस पर सहमत नहीं हो पाई कि इसका आदर्श समाधान क्या हो. हालांकि उन्होंने मामले को आगे तीन जजों की बेंच के पास नहीं भेजा. ऐसा करने के पीछ कोर्ट ने कारण ये बताया कि याचिकाकर्ता के पिता का शव 7 जनवरी से मोर्चरी में पड़ा है. ऐसे में कोर्ट ने शव को तुरंत दूसरे गांव में दफनाने का फ़ैसला सुनायाहै. 

बार एंड बेंच की ख़बर के मुताबिक़, कोर्ट ने कहा,

हम अनुच्छेद 142 के तहत ये निर्देश जारी करते हैं- 1. दफन करकवाल गांव के कब्रिस्तान में होगा (मृतक के गांव से 20 किलोमीटर दूर). 2. सभी रसद सहायता (सरकार की तरफ़ से) दी जाए. ये निर्देश मृतक के परिवार की पीड़ा को कम करने के लिए जारी किए गए हैं. अपील का निपटारा किया जाता है.

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दोनों जजों की राय

जस्टिस बीवी नागरथना ने रमेश के पक्ष में आदेश दिया. उनका कहना था कि मृतक को उसके परिवार की निजी कृषि भूमि में दफनाया जाए. बीवी नागरथना ने आगे कहा, “गांव के कब्रिस्तान में ईसाई व्यक्ति को दफनाने से इनकार करना दुर्भाग्यपूर्ण, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक था. ASP के हलफनामे में कहा गया है कि धर्मांतरित ईसाई को वहां दफनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ये दुर्भाग्यपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 21 और 14 का उल्लंघन करता है. साथ ही, धर्म के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देता है.”

बीवी नागरथना आगे बोलीं, “गांव की पंचायत का रवैया (ईसाई व्यक्ति को गांव की ज़मीन पर दफनाने के ख़िलाफ़) शत्रुतापूर्ण भेदभाव को जन्म देता है. राज्य ऐसे रवैये के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में विफल रहा है. जिससे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को चोट पहुंची है.”

वहीं, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने जस्टिस नागरथना के आदेश से असहमति जताई थी. उन्होंने कहा, “ऐसा कोई कारण नहीं है कि बिना शर्त के दफन करने का अधिकार हो. इससे सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है. सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना समाज के व्यापक हित में है. मामला इस बात पर आकर रुकता है कि क्या धार्मिक अंत्येष्टि आयोजित करने के अधिकार को अन्य धर्मों के लिए निर्धारित स्थानों पर भी लागू किया जा सकता है.”

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का कहना था, "कब्रिस्तान अक्सर विशिष्ट धर्मों के लिए निर्धारित किए जाते हैं. इस मामले में ईसाई मृतक के लिए निर्धारित स्थान 20 किलोमीटर दूर था. धर्म की स्वतंत्रता का इस्तेमाल किसी अन्य धर्म के लिए निर्धारित भूमि पर दफनाने के अधिकार के लिए नहीं किया जा सकता. ये अनुच्छेद 25 के तहत अधिकार का अतिक्रमण होगा. यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है और राज्य नियम बना सकता है."

ऐसे में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा. हाई कोर्ट ने भी मृतक को उसके गांव में दफनाने की अनुमति नहीं दी थी. इसके बजाय, उन्होंने राज्य को मृतक के बेटे रमेश को मदद देने के लिए कहा. ताकि शव को 20 किलोमीटर दूर स्थित कब्रिस्तान तक ले जाया जा सके. साथ ही ये भी कहा कि सभी प्रकार की पुलिस सुरक्षा दी जाए. कानून-व्यवस्था से संबंधित कोई समस्या उत्पन्न न हो, ये सुनिश्चित किया जाए.

(ये ख़बर हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहीं मेघा ने लिखी है.)

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