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'महिलाओं का करियर बर्बाद हो सकता है', पेड मेंस्ट्रुअल लीव की याचिका SC ने निरस्त की

शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की तरफ से Supreme Court में दायर याचिका में कहा गया था जब महिलाओं को मेटरनिटी लीव का प्रावधान है तो उन्हें पीरियड्स के दौरान भी छुट्टी दी जानी चाहिए. उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि वो सभी राज्यों को इस पर कानून बनाने का निर्देश जारी करे.

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सुप्रीम कोर्ट ने मेंस्ट्रुअल लीव की मांग करने वाली याचिका निरस्त कर दी. (तस्वीरें- पीटीआई और Unsplash.com)

सुप्रीम कोर्ट ने नौकरीपेशा महिलाओं के लिए पेड मेंस्ट्रुअल लीव की मांग करने वाली याचिका को निरस्त कर दिया है. 13 मार्च को कोर्ट ने मामले में आगे सुनवाई करने से इनकार करते हुए ये फैसला किया. शीर्ष अदालत ने कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव अनिवार्य करने से महिलाओं को नौकरी मिलने में दिक्कत आ सकती है और संस्थान महिलाओं को नौकरी पर रखने से बचने की कोशिश करेंगे.

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI जस्टिस सूर्यकांत ने मामले में टिप्पणी करते हुए कहा,

“अगर कोई कंपनी अपनी मर्जी से छुट्टी दे रही है तो बहुत अच्छी बात है. लेकिन जैसे ही आप इस को कानून के तौर पर सख्ती से लागू करेंगे तो इसके दूसरे पहलुओं को भी ध्यान में रखना पड़ेगा. जैसे हो सकता है कि महिलाओं को नौकरी मिलने में दिक्कत हो. या फिर प्राइवेट सेक्टर से जुड़े संस्थान महिलाओं को जिम्मेदारी का पद देने से बच सकते हैं.”

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अदालत ने आगे कहा,

“कानूनी तौर पर मजबूर करने से महिलाओं के लिए न्यायपालिका या सरकारी नौकरियों के रास्ते बंद हो सकते हैं. इससे उनका करियर बर्बाद हो सकता है. ऐसा न हो कि उन्हें कह दिया जाए कि वो घर पर बैठें.”

सुप्रीम कोर्ट में मेंस्ट्रुअल लीव को अनिवार्य करने की याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर की गई थी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने शैलेंद्र त्रिपाठी की लोकस स्टैंडी (याचिका दायर करने के अधिकार) पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर कोई महिला अदालत में क्यों नहीं आई.

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इस मुद्दे पर यह याचिकाकर्ता की तरफ से दायर की गई तीसरी याचिका थी. पहली याचिका फरवरी 2023 में निरस्त हुई. इसमें याचिकाकर्ता को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सामने बात रखने की  अनुमति दी गई थी. इसके बाद साल 2024 में याचिककर्ता ने फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाया. दलील दी कि मंत्रालय ने उनकी बात पर कोई जवाब नहीं दिया. उस याचिका को जुलाई 2024 में निरस्त करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को नीतिगत फैसला लेने को कहा था.

शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था जब महिलाओं को मेटरनिटी लीव का प्रावधान है तो उन्हें पीरियड्स के दौरान भी छुट्टी दी जानी चाहिए. उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि वो सभी राज्यों को इस पर कानून बनाने का निर्देश जारी करे.

सुप्रीम कोर्ट ने जवाब में उनकी याचिका निरस्त करते हुए कहा कि आप पहले ही केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सामने अपनी बात रख चुके हैं. साथ ही कोर्ट ने सरकार से इस पर विचार करने और सभी पक्षों से बात करके एक सही पॉलिसी बनाने की सलाह दी है. 

वीडियो: एक्सप्लेनर: पीरियड लीव पॉलिसी पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने क्या कहा?

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