सुप्रीम कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए वैवाहिक जीवन में क्रूरता पर अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला अपने करियर पर फोकस करती है, अपना करियर बनाना चाहती है तो इसे क्रूरता (Cruelty) नहीं कहा जा सकता है. सिर्फ इसलिए कि करियर पर फोकस करने वाली पत्नी या बहू से उसके पति या ससुराल वालों की भावनाएं आहत हो रही है, आप ये नहीं कह सकते है कि महिला अपनी जिम्मेदारी से भाग रही हैं. यह एक बहुत ही पिछड़ी सोच को दिखाता है, जो आज के संवैधानिक मूल्यों के साथ मेल नहीं खाती.
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, 'पति को छोड़ पत्नी का अपना करियर बनाना क्रूरता नहीं'
Supreme Court ने कहा कि यह उम्मीद करना कि एक महिला को हमेशा अपने करियर की कुर्बानी देनी चाहि. यह बहुत ही पुरातनपंथी और पिछड़ी हुई सोच है. पत्नी का करियर के लिए महत्वाकांक्षा रखना क्रूरता नहीं है.


इंडिया टुडे से जुड़े संजय शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक ये पूरा मामला इंडियन आर्मी के लेफ्टिनेंट कर्नल और उनकी डेंटिस्ट पत्नी के बीच है. उनकी शादी साल 2009 में हुई थी. शुरुआत में पत्नी पुणे में अपनी प्रैक्टिस छोड़कर पति के साथ कारगिल शिफ्ट हो गई. बेटी के जन्म के बाद बच्ची को स्पेशल मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ी. ट्रीटमेंट के लिए वो अहमदाबाद शिफ्ट हो गईं. वहां उन्होंने बच्ची के इलाज और परवरिश करने के साथ-साथ अपना डेंटल क्लिनिक भी खोला. इस वजह से पति-पत्नी के बीच झगड़े होने लगे और तलाक की नौबत आ गई. मामला कोर्ट में गया और फैमिली कोर्ट ने महिला के काम को वैवाहिक कर्तव्य का उल्लंघन करार दे दिया.
फैमिली कोर्ट ने अहमदाबाद में कथित तौर पर अपने पति या ससुराल वालों को बिना बताए डेंटल क्लिनिक खोलने के फैसले को क्रूरता माना था. अहमदाबाद आने पर महिला अपने मायके में रह रही थी. कोर्ट ने इस आधार पर फैसला दिया कि पति की पोस्टिंग वाली जगह पर रहने के बजाय महिला ने अलग शहर में रहना छोड़ा. इसके लिए उसने अपने पति को छोड़ दिया. यह क्रूरता की श्रेणी में आता है. इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा
फैमिली कोर्ट का नजरिया साफ तौर पर यह कहना चाहता था कि पत्नी के पास डेंटिस्ट की डिग्री हो, उसे अपने करियर की कुर्बानी देकर अपने पति की पोस्टिंग वाली जगह पर जाकर उसके साथ रहना चाहिए था. ऐसा न करना, अपने पति को छोड़कर उसके साथ क्रूरता करने जैसा था. इस तरह के नजरिए को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता. यह उम्मीद करना कि एक महिला को हमेशा अपने करियर की कुर्बानी देनी चाहिए और एक आज्ञाकारी पत्नी की पारंपरिक सोच के हिसाब से पति के साथ रहने के लिए ढल जाना चाहिए. भले ही उसकी अपनी इच्छाएं या बच्चे की भलाई दांव पर लगी हो. ये एक ऐसी सोच को दिखाता है जो पुरानी, बहुत ज्यादा रूढ़िवादी है, और आज के जमाने में इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट का फैसला खारिज12 मई को सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान ये फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक योग्य महिला का अपने करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करने का निर्णय 'क्रूरता' या 'तलाक का आधार' नहीं हो सकता. सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,
पत्नी के अपने करियर के लक्ष्यों को पाने की कोशिश को सिर्फ इसलिए क्रूरता बताना, क्योंकि इससे ससुराल वालों की भावनाएं आहत हो सकती हैं. इस दौर में जब समाज गर्व से महिला सशक्तिकरण की बात करता है, तब ऐसा करना बेहद गलत और निंदनीय है.
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा,
हम 21वीं सदी में हैं और फिर भी एक काबिल महिला की ओर से अपने प्रोफेशनल करियर को आगे बढ़ाने और अपने बच्चे की परवरिश के लिए एक सुरक्षित और स्थिर माहौल बनाने की कोशिश को क्रूरता और जिम्मेदारियां त्यागना मान लिया गया है. हमें ये कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि फैमिली कोर्ट का अपनाया गया नजरिया, जिसे हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया, न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि बहुत ही परेशान करने वाला भी है.
शादी के बाद महिला की अपनी पहचान खत्म नहीं होती - सुप्रीम कोर्टसुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि शादी के बाद महिला की अपनी पहचान खत्म नहीं होती है. कोर्ट ने कहा कि एक महिला को उसके पति के घर का महज एक हिस्सा या सहायक के तौर पर नहीं देखा जा सकता. शादी से उसकी अपनी पहचान या आजादी खत्म नहीं हो जाती. कोर्ट ने कहा कि एक पढ़ी-लिखी और प्रोफेशनल तौर पर काबिल महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सिर्फ शादी से जुड़ी जिम्मेदारियों की सख्त सीमाओं में ही बंधी रहे. कोर्ट ने कहा,
शादी उसकी अपनी पहचान को खत्म नहीं करती, न ही उसकी पहचान को उसके जीवनसाथी की पहचान के अधीन करती है. पति और पत्नी, दोनों की यह जिम्मेदारी है कि वे अपने वैवाहिक संबंधों में इस तरह संतुलन बनाए रखें जिससे दोनों की आपसी आकांक्षाओं का सम्मान हो, न कि कोई एकतरफा तरीके से दूसरे के जीवन के फैसले तय करे.
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर भूमिकाएं बदल दी जाएं तो शायद किसी पति से यह उम्मीद नहीं की जाएगी कि वह सिर्फ इसलिए अपना पेशा छोड़ दे, क्योंकि उसकी पत्नी की नौकरी ऐसी है जिसमें ट्रांसफर होते रहते हैं. बेंच ने कहा,
सिर्फ इसलिए कि पति सेना में अफसर था और किसी दूरदराज के इलाके में तैनात था, यह उम्मीद करना कि पत्नी डेंटिस्ट का अपना करियर बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकती, एक पिछड़ी और सामंती सोच को दिखाता है.
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी पर झूठी गवाही का मुकदमा चलाने की मांग की थी. कोर्ट ने कहा कि पत्नी अब शादी को दोबारा शुरू नहीं करना चाहती और पति ने कथित तौर पर दूसरी शादी कर ली थी. इसलिए तलाक का आधार ये होना चाहिए था, ना कि पत्नी की करियर से जुड़ी महत्वाकांक्षा को गलत मानना. इस मामले में कोर्ट ने तलाक को तो मंजूरी दे दी लेकिन जो टिप्पणियां हैं कि वो काफी अहम है.
वीडियो: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तलाक के मामले में कॉल रिकॉर्डिंग मांगने पर क्या फैसला सुनाया है?





















