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शादी से पहले सेक्स किया तो पुलिस की नौकरी नहीं मिली, सुप्रीम कोर्ट ने विभाग को कायदा पढ़ा दिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध खराब चरित्र का प्रमाण नहीं हैं और केवल इसी आधार पर किसी को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी से पहले सेक्स खराब कैरेक्टर का प्रमाण नहीं है. (फोटो- India Today)

शादी से पहले संबंध बनाना क्या कैरेक्टर खराब करता है? कोई सालों तक रिलेशनशिप में रहे. आपसी सहमति से सेक्स किया. बाद में दोनों की शादी न हो सके तो क्या इससे किसी एक के चरित्र पर सवाल उठाया जा सकता है? और क्या इस आधार पर किसी को सरकारी नौकरी से रोका जा सकता है? इन सारे सवालों का जवाब सुप्रीम कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान दे दिया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि शादी से पहले आपसी सहमति से सेक्स करना खराब चरित्र का प्रमाण नहीं है.

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शादी से पहले सेक्स पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने जिस मामले पर ये टिप्पणी की है वो एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे स्टिपेंडियरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कॉन्स्टेबल (SCTPC) के पद पर चुना गया था. लेकिन बाद में भर्ती बोर्ड को ये पता चला कि उन पर पड़ोसी महिला ने काफी पहले शादी का वादा करके संबंध बनाने और बाद में किसी और महिला से शादी कर लेने के आरोप लगाए थे. इस मामले में 2015 में दोनों पक्षों ने लोक अदालत में समझौता कर लिया था. यानी केस क्लोज्ड था. 

यहां तक कि उम्मीदवार गजुल तिरुपति ने नौकरी के लिए भरे गए फॉर्म में खुद ही बताया था कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला चला था. उन्होंने कोई जानकारी छिपाई नहीं थी और झूठ भी नहीं बोला था. फिर भी अफसरों ने कहा कि इस आरोप को वो नैतिक अधमता यानी Moral Turpitude से जुड़ा मानते हैं, इसलिए तिरुपति पुलिस की नौकरी के काबिल नहीं हैं.

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रिलेशनशिप में बने संबंध 

हालांकि, मामले में तथ्यों की जांच करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जिस वक्त तिरुपति के खिलाफ ये आरोप लगाए गए थे, उस समय वह और आरोप लगाने वाली महिला दोनों बालिग थे. दोनों पड़ोसी थे. चार साल तक रिलेशनशिप में भी रहे थे. इस केस में तिरुपति पर रेप के आरोप भी नहीं हैं. न ही ऐसा कोई सबूत है, जिससे ये पता चले कि लोक अदालत में धमकी या लालच देकर केस रफा-दफा करवाया गया हो. ये सब देखते हुए जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कई जरूरी बातें साफ कीं.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा?

पहले तो उन्होंने रिक्रूटमेंट बोर्ड को लताड़ा कि उन्होंने केस में हुए समझौते को अपराध मान लेने जैसा कैसे मान लिया. यह तर्क एकदम निराधार है और पूरी तरह से गलत है. 

दूसरी जरूरी बात कोर्ट ने कही कि अगर किसी व्यक्ति को कोर्ट ने किसी केस में बरी कर दिया है, तब भी नौकरी देने वाला विभाग यह देख सकता है कि वह व्यक्ति नौकरी के लिए काबिल है या नहीं. लेकिन विभाग सिर्फ मनमाने ढंग से यह नहीं कह सकता कि तुम पर कभी केस था, इसलिए नौकरी नहीं मिलेगी. अगर विभाग नौकरी देने से इनकार करता है तो उसके पास ठोस कारण और सबूत होने चाहिए कि मामला किसी गंभीर नैतिक गलती (moral turpitude) से जुड़ा था और उसमें व्यक्ति की सच में कोई भूमिका थी.

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कोर्ट की तीसरी अहम बात ये थी कि अगर दो बालिग लोग आपसी सहमति से सेक्स करते हैं तो इससे किसी के कैरेक्टर को जज नहीं किया जाना चाहिए. आजकल शादी से पहले ऐसे रिश्ते आम हैं. ऐसा कोई कानून नहीं है, जो दो बालिग लोगों को बिना शादी के लिए उनके पसंद का रिश्ता बनाने से रोकता हो.

अगली बात कोर्ट ने कही कि हर रिश्ता शादी में नहीं बदलता. इसलिए सिर्फ इस आधार पर कि शादी नहीं हो पाई, ये मानने का आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया.

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