चुनाव में किसी उम्मीदवार को एक पार्टी के टिकट पर जनता जिता देती है. जीतने के बाद उस पार्टी को छोड़कर कई बार नेता किसी दूसरी पार्टी के साथ खड़े हो जाते हैं. ऐसा होने पर क्या जनता का दिया हुआ जनादेश भी बदल जाता है? एसोसिएशन फॉर डेमोक्रैटिक रिफॉर्म और नेशनल इलेक्शन वॉच (ADR) की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 4 सालों में 111 मौजूदा सांसदों विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदल दी.
ADR रिपोर्ट में खुलासा, पिछले 4 साल में 111 MP-MLA ने बदली पार्टी, 26% हुए BJP में शामिल
भारतीय राजनीति में दल-बदल की बीमारी नई नहीं हैं. पिछले 4 सालों में ही 111 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदली है. इसमें इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने से लेकर पार्टी मर्जर वगैरह शामिल है.

रिपोर्ट में पार्टी का मर्जर, इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी के टिकट पर उपचुनाव जीतना और अयोग्य ठहराए जाने के बाद दूसरी पार्टी से चुनाव जीतना भी शामिल है. तो आखिर ये 111 नेता गए कहां? किन पार्टियों से सबसे ज्यादा नेता निकले? किस पार्टी को सबसे ज्यादा नए नेता मिले? और दल-बदल के इस पूरे खेल पर ADR ने Anti-Defection Law को लेकर क्या सुझाव दिया है? आंकड़ों के ज़रिए पूरी कहानी समझते हैं.
ADR की रिपोर्ट क्या कहती है?इस रिपोर्ट में साल 2022 से जुलाई 2026 तक हुए चुनाव और उपचुनावों के आधार पर मौजूदा सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने का एनालिसिस किया गया है. 24 सितंबर को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, 111 मौजूदा सांसद और विधायक ऐसे रहे, जिन्होंने चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदल दी. इन 111 नेताओं में 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं. ये 111 मामले 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सामने आए. जिसमें से नागालैंड के 32, पश्चिम बंगाल के 20, तेलंगाना के 9, गोवा के 8 और पंजाब के 8 मामले शामिल हैं.
ADR के मुताबिक, सबसे ज्यादा मामले नागालैंड से सामने आए. यहां 32 विधायक इस एनालिसिस में शामिल हैं. ये 32 मामले 32 अलग-अलग विधायकों के एक-एक करके पार्टी बदलने का नहीं हैं. इनमें बड़ा हिस्सा NDPP और NPF के बीच हुए राजनीतिक विलय से जुड़ा है.
साल 2025 में नागालैंड में NDPP के 31 विधायकों के NPF में विलय को विधानसभा स्पीकर ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत मान्यता दी थी. इसी राजनीतिक घटनाक्रम की वजह से NPF इस ADR एनालिसिस में 32 जनप्रतिनिधियों को हासिल करने वाली पार्टी के रूप में सामने आती है.
अगर सदन की कुल संख्या से तुलना करें, तो 543 लोकसभा सांसदों में 26 यानी करीब 5 फीसदी, 233 राज्यसभा सांसदों में 7 यानी करीब 3 फीसदी और करीब 4,100 विधायकों में 78 यानी करीब 2 फीसदी इस एनालिसिस में शामिल हैं.
ADR के मुताबिक, 111 में से सबसे ज्यादा 32 जनप्रतिनिधि NPF में गए. इसके बाद 29 यानी करीब 26 फीसदी BJP में गए. 20 जनप्रतिनिधि नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ़ इंडिया यानी NCPI से जुड़े. इसके अलावा कांग्रेस को 9, शिवसेना को 8, NPP को 6 और पीपल पार्टी ऑफ़ अरुणाचल को 4 जनप्रतिनिधि मिले.
अब बात BJP में गए 29 जनप्रतिनिधियों की करते हैं. इनमें 7 राज्यसभा सांसद और 22 विधायक शामिल हैं. ADR के इस डेटासेट में कोई लोकसभा सांसद ऐसा नहीं है, जो मूल पार्टी से निकलकर BJP में गया हो. इन 7 राज्यसभा सांसदों में स्वाति मालीवाल, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राघव चड्ढा, संदीप कुमार पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं. ये सभी पहले AAP के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे थे.
वहीं BJP में शामिल होने वाले विधायकों में गोवा के 8 कांग्रेस विधायक, गुजरात के 4 कांग्रेस विधायक, हिमाचल प्रदेश के 2 कांग्रेस विधायक और मणिपुर के 5 JD(U) विधायक शामिल हैं.
इसके अलावा उत्तर प्रदेश के SP विधायक मनोज कुमार पांडे, मध्य प्रदेश की कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे और कर्नाटक के जी. जनार्दन रेड्डी का नाम भी इस लिस्ट में है. गुजरात के चार कांग्रेस विधायक- सी.जे. चावड़ा, अर्जुन मोढ़वाडिया, अरविंद लाडानी और चिराग पटेल, पहले विधायक पद से इस्तीफा देकर BJP में गए और इसके बाद उपचुनाव लड़ा.
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किस पार्टी से सबसे ज्यादा नेता निकले?अब आते हैं पश्चिम बंगाल के 20 सांसदों पर. ये सभी 2024 में TMC यानी AITC के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीते थे. साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC के सत्ता से बाहर होने के बाद जून में इन 20 सांसदों ने NCPI के साथ मर्जर का दावा किया.
अब अगर देखें कि सबसे ज्यादा नेता किन पार्टियों से निकले, तो यहां भी आंकड़े दिलचस्प हैं. सबसे ऊपर NDPP है. इसके 25 जनप्रतिनिधि इस एनालिसिस में पार्टी बदलने या विलय के मामलों में शामिल हैं. इसके बाद TMC के 20 और कांग्रेस के 19 जनप्रतिनिधि हैं. फिर BRS के 9, AAP और NCP के 7-7, शिवसेना UBT के 6, JD(U) के 5 और NPP के 4 जनप्रतिनिधि हैं.
आखिर नेता पार्टी क्यों बदलते हैं?यहां ADR की रिपोर्ट कोई एक वजह तय नहीं करती. रिपोर्ट का फोकस ये बताना है कि कितने मौजूदा सांसद और विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी मूल पार्टी से अलग हुए और किस पार्टी में गए. ADR ने इस डेटा की एक लिमिट भी बताई है.
ADR के मुताबिक, चुनाव आयोग या किसी दूसरे सरकारी संस्थान के पास ऐसा कोई व्यवस्थित और आसानी से उपलब्ध आधिकारिक डेटाबेस नहीं है. ऐसा व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है, जहां देशभर में सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने के सभी मामलों की जानकारी एक जगह मिल जाए. इन आंकड़ों के आधार पर ADR ने Anti-Defection Law यानी दल-बदल कानून में बदलाव की जरूरत भी बताई है. ADR का सुझाव है कि चुनाव आयोग की सलाह पर सांसदों की अयोग्यता पर फैसला राष्ट्रपति और विधायकों की अयोग्यता पर फैसला राज्यपाल को करना चाहिए.
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