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‘अपने नाम से ‘डॉक्टर’ हटा दो’, SC ने प्राइवेट अस्पतालों को उधेड़ा, 4 साल की रेप पीड़िता का इलाज नहीं किया था

Supreme Court ने एक 4 साल की बच्ची के रेप केस में Ghaziabad के 2 अस्पतालों को फटकार लगाई है. दोनों अस्पतालों और उनके डॉक्टरों पर आरोप है कि उन्होंने एक 4 साल की रेप पीड़ित बच्ची को सही समय पर इलाज 'नहीं' दिया, जिससे उसकी मौत हो गई.

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सुप्रीम कोर्ट ने 4 साल की बच्ची के रेप के मामले में 2 प्राइवेट अस्पतालों को फटकार लगाई है. (तस्वीरें- पीटीआई और Unsplash.com)

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  • सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 2 प्राइवेट अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को 4 साल की रेप पीड़ित बच्ची को समय पर इलाज न देने के कारण फटकार लगाई और आर्थिक मदद करने का आदेश दिया।
  • यह मामला तब सामने आया जब बच्ची के परिजन ने दो अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाने पर उन्हें एडमिट करने से इनकार कर दिया गया और पुलिस ने भी जांच में लापरवाही बरती, जिससे जांच शुरू हुई।
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अस्पतालों को पीड़िता परिवार को आर्थिक सहायता देनी होगी, नहीं तो जुर्माना लगेगा, साथ ही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने मामले में अस्पतालों की गलती पाई।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में स्थित 2 प्राइवेट अस्पतालों और उनके डॉक्टरों को जमकर फटकार लगाई है. दोनों अस्पतालों और उनके डॉक्टरों पर आरोप है कि उन्होंने एक 4 साल की रेप पीड़ित बच्ची को सही समय पर इलाज 'नहीं' दिया, जिससे उसकी मौत हो गई. कोर्ट ने अस्पतालों को आदेश दिया है कि वह पीड़िता के परिवार की कुछ आर्थिक मदद करें. ऐसा न करने पर उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है.

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शुक्रवार, 17 जुलाई को चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच ने इस केस पर सुनवाई की. NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि अस्पतालों और उनके डॉक्टरों ने बच्ची को इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि वह गरीब थी. कोर्ट ने डॉक्टरों के इस रवैये से नाराजगी जाहिर करते हुए कहा,

‘अपने नाम से डॉक्टर शब्द हटा दें. क्योंकि आप अपना फर्ज निभाने में नाकाम रहे. अगर आप अपना फर्ज नहीं निभाते हैं, तो आपको अपने नाम के साथ ‘डॉक्टर’ लिखने का कोई हक नहीं है. अगर आप में संवेदनशीलता होती, तो सुविधा न होने पर भी आप बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाते. आपने उसे इसलिए नजरअंदाज कर दिया क्योंकि वह गरीब थी और आपकी फीस नहीं दे सकती थी.’

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आर्थिक मदद करने का आदेश

बेंच ने दोनों अस्पतालों को निर्देश दिया कि वो पीड़ित परिवार को अपनी मर्जी से कुछ पैसे दें. साथ ही यह चेतावनी भी दी कि अगर ऐसा नहीं किया गया, तो उन पर जुर्माना लगाया जाएगा.

इस केस पर सुप्रीम कोर्ट पहले भी सुनवाई कर चुका है. तब कोर्ट ने कहा था कि मुआवजे से भी ज्यादा जरूरी एक चीज है, जिसे ठीक करने की जरूरत है, वो है ‘जवाबदेही’. आरोप ये भी है कि घटना के फौरन बाद पीड़िता के परिजनों ने पुलिस को सूचना दी थी, लेकिन पुलिस ने मामले पर ध्यान नहीं दिया. कथित तौर पर पुलिस ने पीड़िता के परिवार के साथ ही मारपीट की.

इसके बाद हंगामा हुआ तब जाकर पुलिस ने घटना के एक दिन बाद FIR दर्ज की. अगले दिन आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. पीड़िता नाबालिग थी. बावजूद इसके FIR में POCSO या धारा 376 को नहीं जोड़ा गया. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अधिकारियों को ‘लापरवाही’ और ‘संवेदनहीनता’ पर फटकार लगाई थी. साथ ही पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारियों को केस रिकॉर्ड के साथ तलब किया था.

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शुक्रवार की सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि इस अपराध में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दो प्राइवेट अस्पतालों और स्थानीय पुलिस पूरी तरह से लापरवाह हैं और उनका रवैया असंवेदनशील है.

चॉकलेट का लालच देकर बच्ची से रेप

मामला गाजियाबाद की एक 4 साल की बच्ची के रेप और ‘हत्या’ से जुड़ा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपी बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर उसे घर से ले गया था. काफी समय तक जब वो घर नहीं लौटी तो परिजनों ने उसे खोजना शुरू किया. वो घर के पास बेहोशी की हालत में खून से लथपथ पड़ी हुई मिली. परिजन उसे इलाज के लिए 2 प्राइवेट अस्पतालों में ले गए. आरोप है कि अस्पतालों ने बच्ची को एडमिट करने से इनकार कर दिया.

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इसके बाद बच्ची को गाजियाबाद जिला अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. बच्ची के पिता का दावा है कि उसके मिलने के बाद वो 2 घंटे तक जिंदा थी. अगर उसे समय पर इलाज मिल जाता, तो उसकी जान बचाई जा सकती थी. बाद में मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई गई थी. जांच में आरोप सही पाए गए.

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