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डिलीवरी के बाद किडनी फेल, 5 महिलाओं ने मांंगी इच्छामृत्यु, सरकारी अस्पताल को बताया जिम्मेदार

राजस्थान के कोटा के हॉस्पिटल में किडनी फेलियर से जूझ रही पांच प्रसूता महिलाओं का डायलिसिस चल रहा है. इन महिलाओं ने डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ऑफिस को ज्ञापन देकर किडनी ट्रांसप्लांट कराने की मांग की थी. इस ज्ञापन पर कोई जवाब नहीं मिलने के चलते पांचों महिलाओं ने डायलिसिस रोकने का फैसला किया है.

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राजस्थान के कोटा में किडनी फेलियर से जूझ रही महिलाओं ने डायलिसिस कराने से इनकार कर दिया है. (इंडिया टुडे)

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  • पांच महिलाएं जो किडनी फेलियर से जूझ रही हैं, उन्होंने डायलिसिस बंद करने का फैसला किया है और जिला प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम देते हुए किडनी ट्रांसप्लांट या इच्छामृत्यु की मांग की है।
  • ये महिलाएं न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में डिलीवरी के बाद भर्ती हुई थीं, और उनके परिवार का आरोप है कि अस्पताल की लापरवाही और नकली दवाओं के कारण उनकी किडनियां खराब हो गई हैं।
  • अस्पताल प्रशासन ने कहा है कि मेडिकल प्रोटोकॉल के अनुसार डायलिसिस और ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में तीन से छह महीने का समय लगता है और महिलाओं का इलाज निरंतर मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत मुफ्त जारी है।
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चेतन गुर्जर

कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में किडनी फेलियर से जूझ रही पांच महिलाओं का धैर्य अब जवाब देता नजर आ रहा है. लगातार डायलिसिस, बेइंतेहा दर्द और भविष्य को लेकर अनिश्चितता के बीच उन्होंने बड़ा फैसला लिया है. ये महिलाएं अब इच्छामृत्यु मांग रही हैं.

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आजतक से जुड़े चेतन गुर्जर की रिपोर्ट के मुताबिक जिला प्रशासन को दिए 48 घंटे के अल्टीमेटम के बावजूद उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला. इसी के चलते इन्होंने डायलिसिस कराने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी किडनी ट्रांसप्लांट नहीं करवा सकती तो उन्हें इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी जाए.

13 जुलाई को पांच प्रसूताओं और उनके परिवारवालों ने जिला कलेक्टर के ऑफिस पहुंचकर एक मेमोरैंडम सौंपा था. इसमें उन्होंने प्रशासन को उनकी किडनी ट्रांसप्लांट कराने समेत दूसरी मांगों पर जवाब के लिए 48 घंटे का समय दिया था. उन्होंने साफ कहा था कि अगर तय समय में कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वे डायलिसिस बंद कर देंगी. 48 घंटे पूरा होने के बाद कोई जवाब नहीं मिलने के चलते पांचों महिलाओं ने डायलिसिस रोकने का फैसला किया है. उनका कहना है कि हर दो-तीन दिन में डायलिसिस की पीड़ा सहना अब उनके लिए संभव नहीं है.

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ये पांचों महिलाएं 4 से 8 मई के बीच डिलीवरी के लिए ये न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती हुई थीं. उनके परिवारों का आरोप है कि इस दौरान अस्पताल की लापरवाही और नकली दवाओं के इस्तेमाल से उनकी दोनों किडनियां खराब हो गईं.

'ट्रांसप्लांट कराइए या इच्छा मृत्यु दीजिए'

रागिनी मीणा, आरती चौबदार, पिंकी ऐरवाल, सुशील महावर और धन्नी सुमन पिछले दो महीने से ज्यादा समय से अस्पताल में भर्ती हैं. उनके परिवारों का कहना है कि घर लौटने की उम्मीद हर दिन कमजोर होती जा रही है. अस्पताल का बिस्तर ही अब उनका घर बन गया है. धन्नी सुमन ने बताया,

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अगर किडनी ट्रांसप्लांट नहीं होगा तो चाहे हमारी जान चली जाए. लेकिन अब डायलिसिस नहीं करवाएंगे.

पिंकी ऐरवाल ने बताया कि उनको हर हफ्ते तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता है. इसके बाद उनको तेज बुखार, उल्टी और चक्कर आने लगते हैं. वह दो महीने से ज्यादा समय से अस्पताल में भर्ती हैं. उन्होंने आगे बताया, 

अब तो यूरिन भी आना बंद हो गया है. मुझे अब डायलिसिस नहीं करवाना. हर बार इतनी तकलीफ होती है कि सहन नहीं होता.

एक और पीड़ित महिला सुशीला महावर ने बताया कि वह 3 मई से अस्पताल में भर्ती हैं. लगातार डायलिसिस के चलते अब दर्द असहनीय हो चुका है. उन्होंने कहा,

सरकार हमारी किडनी ट्रांसप्लांट कराए. तड़प-तड़प कर जीने से अच्छा है मौत आ जाए. अब डायलिसिस नहीं करवाऊंगी.

अस्पताल प्रशासन का क्या कहना है?

न्यू मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. नीलेश जैन ने कहा कि पांचों महिलाओं की स्थिति फिलहाल स्थिर है और जरूरत के हिसाब से उनका डायलिसिस किया जा रहा है. उन्होंने बताया,

 मीडिया से हमें पता चला कि महिलाएं डायलिसिस बंद कराना चाहती हैं. यदि ऐसा होता है तो उनकी जान बचाने के लिए प्रशासन को इसकी सूचना दी जाएगी. मेडिकल प्रोटोकॉल के मुताबिक किडनी ट्रांसप्लांट पर फैसला लेने से पहले तीन से छह महीने तक इंतजार करना पड़ता है. अभी यह कहना संभव नहीं है कि ट्रांसप्लांट की जरूरत होगी या नहीं.

डॉ. जैन ने आगे बताया कि इन महिलाओं को अब हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किया जा सकता है. वे घर से आकर डायलिसिस करवा सकती हैं. उनका इलाज मुख्यमंत्री आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह से मुफ्त में हो रहा है. आगे भी उनके किसी तरह की फीस नहीं ली जाएगी.

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क्या है पूरा मामला?

कोटा के जेके लोन बेबी हॉस्पिटल और न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में डिलीवरी के बाद कुल 12 महिलाएं बीमार हुई थीं. इनमें से पांच की मौत हो चुकी है. दो महिलाओं को इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया, जबकि पांच का इलाज अब भी न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में चल रहा है. इनके परिवार का आरोप है कि हॉस्पिटल की लापरवाही और नकली दवाओं के चलते इनकी किडनी खराब हुई है. दूसरी तरफ अस्पताल प्रशासन ने इन आरोपों से इनकार किया है. 

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