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राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर अपने ही आदेश में क्या बदलाव कर दिया?

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 पर की गई अपनी पिछली टिप्पणियों को हटा लिया है. इन टिप्पणियों को विधेयक के आलोचना के तौर पर देखा जा रहा था. कोर्ट ने अपने पिछले आदेश में संशोधन करते हुए इन टिप्पणियों को हटा दिया है.

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राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर बिल पर दिए गए अपने आदेश में संशोधन किया है. (इंडिया टुडे)

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 30 मार्च को अपने आदेश में ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर क्रिटिकल कॉमेंट किया था. 2 मार्च की सुनवाई में कोर्ट ने अपने आदेश में संशोधन करते हुए उन क्रिटिकल कॉमेंट्स को हटाने का फैसला किया है. हाालंकि कोर्ट ने कहा कि इससे फैसले की मूल भावना पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस अरुण मोंगा ने 30 मार्च के आदेश में ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सेल्फ आईडेंटिफिकेशन के अधिकार को सीमित कर सकता है. हालांकि अब कोर्ट ने उन टिप्पणियों को हटाकर नया स्पष्टीकरण जारी किया है.

जस्टिस मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कमुरा पुरोहित की बेंच ने 2 मार्च को एक आदेश पारित किया. इसके तहत उन्होंने 30 मार्च के फैसले में बदलाव करके उपसंहार (Epilogue) की भाषा को न्यूट्रल फैक्चुअल डिटेल तक सीमित कर दिया. इससे कॉमेंट हटा दिया गया.

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हालांकि इससे कोर्ट के 30 मार्च के फैसले की मूलभावना पर कोई असर नहीं पड़ेगा. कोर्ट ने 30 मार्च को ट्रांसजेंडर समुदाय को सरकारी नौकरियों में 3 प्रतिशत अंक का अतिरिक्त वेटेज देने का फैसला सुनाया था. इसमें कोई बदलाव नहीं होगा. इस फैसले के अंत में एक उपसंहार (Epilogue) जोड़ा गया था उसमें बदलाव किया गया है.

2 मार्च की सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष मांग रखी गई कि उपसंहार को आदेश का हिस्सा नहीं माना जाए. और न ही इसे नजीर के तौर पर इस्तेमाल किया जाए. लेकिन कोर्ट ने इस मांग को नकार दिया. कोर्ट की ओर से साफ कर दिया गया कि उपसंहार फैसले का अभिन्न अंग है और यह भविष्य के मामलों में नजीर के तौर पर पूरी तरह से मान्य रहेगा.

गलती से जुड़े तीन अनुच्छेद हटाए गए

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कोर्ट ने बताया कि उपसंहार को दोबारा पढ़ने पर पता चला कि उसमें गलती से कुछ ऐसे अनुच्छेद (पैरा 3, 4 और 5) शामिल हो गए थे, जो न तो इरादतन थे और न ही जरूरी थे. इन तीनों पैरा में कोर्ट ने ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पर क्रिटिकल कॉमेंट किया था. अपने संशोधित आदेश में हाईकोर्ट ने कहा,

 मूल फैसला उस समय लागू कानूनी स्थिति को ध्यान में रखकर लिया गया. राज्य सरकार का दायित्व है कि वह अदालत के निर्देश पर नीति बनाते समय मौजूदा कानून के दायरे में ही काम करे.

यह फैसला एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है. उन्होंने राजस्थान सरकार की 2023 की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रांसजेंडर समुदाय को ओबीसी (OBC) का दर्जा दिया गया था. 

वीडियो: ट्रांसजेंडर बिल के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, लोगों ने क्या की मांग?

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