क्या आप अपनी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी की सर्विसेज से दुखी हैं? क्या आपकी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी हर साल प्रीमियम बढ़ा रही है, लेकिन कवरेज वही पुराना है? क्या क्लेम के समय आपकी बीमा कंपनी नए डॉक्यूमेंट्स की मांग और क्लेम फाइल करने में लंबी प्रक्रिया से परेशान हैं? अगर हां, तो अब ये सब सहने की जरूरत नहीं है. अब मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की तरह अपनी हेल्थ बीमा पॉलिसी को दूसरी कंपनी में आसानी से ट्रांसफर कर सकते हैं. हम आपको बताएंगे कि बीमा कंपनी कैसे बदलें? किन बातों का ध्यान रखें और नियम -कायदे क्या हैं, ताकि आप सही फैसला ले सकें और अपने स्वास्थ्य के साथ समझौता न करें.
अपनी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी से दुखी हैं? जानें बिना नुकसान झेले कैसे बदलें
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नियमों के मुताबिक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्टेबिलिटी केवल पॉलिसी रिन्यूबल के समय ही संभव है. इससे सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि पिछली पॉलिसी में मिलने वाले फायदे बने रहेंगे.


हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी में आपको बिना बीमा कंपनी बदलने की सुविधा मिलती है. आप किसी तरह का नुकसान उठाए बिना इस सुविधा का लाभ ले सकते हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसमें पहले से मौजूद बीमारियों (Pre-existing diseases) के लिए जो वेटिंग पीरियड आपने पूरा कर लिया है, वो फिर से शुरू नहीं होता. इसके अलावा नो क्लेम बोनस और दूसरे लगातार मिलने वाले फायदे भी जारी रहते हैं.
इसका मतलब ये कि अगर आपने बीमा क्लेम नहीं किया और बोनस कमाया है, तो वह भी नई पॉलिसी में ट्रांसफर हो जाता है. इस तरह से देखें तो हेल्थ इंश्योरेंस पोर्टेबिलिटी में आपको पुराने फायदे खोए बिना बेहतर बीमा कंपनी चुनने की आजादी मिलती है.
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) के नियमों के मुताबिक हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पोर्टेबिलिटी केवल पॉलिसी रिन्यूबल के समय ही संभव है. इससे सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि पिछली पॉलिसी में मिलने वाले फायदे बने रहेंगे.
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर किसी पॉलिसीधारक ने अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को लगातार 4 साल या उससे ज्यादा समय तक बिना किसी ब्रेक के जारी रखा है, तो उसे पॉलिसी पोर्ट कराने में खासा फायदा मिलता है. ऐसे मामलों में नई बीमा कंपनी आमतौर पर दोबारा पूरी मेडिकल अंडरराइटिंग नहीं करती. साथ ही पॉलिसीधारक को उसकी मौजूदा बीमा राशि (सम इंश्योर्ड) और अब तक मिले सभी फायदे, जैसे कि वेटिंग पीरियड पूरा होना या बोनस वगैरा नई कंपनी में भी जारी रहते हैं.
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यदि कोई पॉलिसी होल्डर अपनी मौजूदा बीमा कंपनी से संतुष्ट नहीं है, तो उसे अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को पोर्ट करने पर विचार करना चाहिए. मौजूदा बीमा कंपनी से सतुंष्ट न होने के कई कारण हो सकते हैं. जैसे कि आपकी बीमा कंपनी सीमित बीमा कवरेज दे रही है लेकिन प्रीमियम मोटा वसूल रही है. सेवाएं खराब है. बीमा क्लेम सेटलमेंट रेशियो कम है. बीमा कंपनी के पैनल में मौजूद अस्पतालों का नेटवर्क कम है.
हेल्थ पॉलिसी को पोर्ट करने से कब बचना चाहिए?इंश्योरेंस एडवाइजर रमेश शर्मा ने लल्लनटॉप से बातचीत में बताया कि अगर आपने इलाज के दौरान या कुछ दिन पहले ही क्लेम किया तो बीमा कंपनी बदलने से बचना चाहिए. इसके अलावा अगर पॉलिसीधारक मौजूदा पॉलिसी के तहत वेटिंग पीरियड पूरा करने के करीब है तो बीमा पोर्टेबिलिटी से बचना चाहिए. आप अपनी ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी को व्यक्तिगत पॉलिसी में पोर्ट कर सकते हैं.
हालांकि, ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस प्लान से व्यक्तिगत पॉलिसी में पोर्ट करते समय पॉलिसीधारकों को समय, कवरेज जारी रहता है और लागत पर विचार करना चाहिए. व्यक्तिगत पॉलिसी के तहत बीमित राशि अलग हो सकती है. अंडरराइटिंग लागू हो सकती है. साथ ही, व्यक्तिगत पॉलिसियों के प्रीमियम आमतौर पर ग्रुप पॉलिसियों की तुलना में ज्यादा होते हैं.
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हेल्थ बीमा को पोर्ट करते समय बचने योग्य गलतियांहेल्थ इंश्योरेंस पोर्ट करते समय लोग अक्सर कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिससे फायदे कम हो सकते हैं या आवेदन भी रिजेक्ट हो सकता है. सबसे आम गलती यह है कि लोग पॉलिसी एक्सपायरी के बहुत करीब पोर्टिंग की प्रक्रिया शुरू करते हैं. ऐसा करने पर अगर ग्रेस पीरियड निकल जाए, तो आपको लगातार मिलने वाले फायदे खत्म हो सकते हैं.
दूसरी बड़ी गलती यह मान लेना है कि नई बीमा कंपनी आपकी पुरानी पॉलिसी के सभी फायदे अपनेआप वैसा ही दे देगी. हकीकत में रूम रेंट लिमिट, नो क्लेम बोनस या बीमारी से जुड़ी कुछ शर्तें अलग-अलग कंपनियों में काफी बदल सकती हैं.
तीसरी गलती है अपनी पिछली क्लेम हिस्ट्री या मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति को सही तरीके से न बताना. अगर आपने जानकारी छिपाई, तो अंडरराइटिंग के दौरान आपका आवेदन खारिज हो सकता है या बाद में क्लेम के समय विवाद खड़ा हो सकता है.
अंडरराइटिंग में बीमा कंपनी तय करती है कि आपको बीमा क्लेम देना है या नहीं. एक तरह से भविष्य के जोखिम का आकलन करती है. इसके अलावा, पुराने और नए दोनों बीमा कंपनियों के साथ सही और स्पष्ट बातचीत बनाए रखना भी जरूरी है. कम्युनिकेशन में कमी से प्रक्रिया में देरी या गड़बड़ी हो सकती है.
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