The Lallantop

विक्रम-1 रॉकेट बनाने वाले पवन चंदना के गणित में 51 नंबर थे, इस कहानी के बाद कोई बहाना नहीं बचेगा

18 जुलाई का दिन भारत के स्पेस सेक्टर के लिए ऐतिहासिक रहा. इस दिन विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग हुई. विक्रम-1 रॉकेट स्पेस में पहुंचने वाला भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट बन गया है. इस लॉन्चिंग के पीछे एक IITian हैं, जोकि इसरो में वैज्ञानिक रह चुके हैं. लेकिन भारत के स्पेस सेक्टर को नई दिशा देने वाले इस शख्स को एक समय मैथ्स से डर लगता था.

Advertisement
post-main-image
पवन कुमार चंदना ने प्राइवेट स्पेस सेक्टर में बड़ी उपलब्धि हासिल की है. (इंडिया टुडे)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • स्काईरूट एयरोस्पेस ने 18 जुलाई 2026 को भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च किया, जिसे पवन कुमार चंदना और उनके सह-संस्थापक ने विकसित किया।
  • पवन चंदना ने IIT की पढ़ाई के बाद ISRO में काम किया, जहां उन्होंने GSLV MK-3 प्रोजेक्ट पर योगदान दिया और भारतीय स्पेस सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों के प्रवेश की संभावनाओं को देखा।
  • इस प्राइवेट लॉन्च से भारत की स्पेस इंडस्ट्री में निजी क्षेत्र की भूमिका मजबूत हुई है, और स्काईरूट ने भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का उद्घाटन भी किया है।

12वीं के एग्जाम में मैथ्स में सिर्फ 51 अंक. आमतौर पर किसी रॉकेट साइंटिस्ट की मार्कशीट इस तरह की नहीं होती. लेकिन पवन कुमार चंदना किसी और ही मिट्टी से बने थे. उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा मार्कशीट की मोहताज भर नहीं होती. अगर आंखों में ब्रह्मांड को छूने का ख्वाब हो तो मार्क्स इसके आड़े नहीं आते.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

विक्रम-1 के जरिए रचा इतिहास

18 जुलाई को पवन चंदना की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस का डेवलप किया हुआ विक्रम-1 रॉकेट स्पेस में पहुंचने वाला भारत का पहला प्राइवेट रॉकेट बन गया है. ये उनकी निजी उपलब्धि भर नहीं है. उससे कहीं बढ़कर ये भारत की स्पेस जर्नी में एक बड़ा माइलस्टोन है.

Advertisement

विक्रम-1 को डेवलप करने वाली कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस के लिए ये बड़ा मकाम है. इस कदम के साथ कंपनी ने खुद को ग्लोबल स्पेस मैप पर स्थापित कर लिया है. लेकिन भारत की सबसे बड़ी रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी के को-फाउंडर और सीईओ बनने की ये जर्नी पवन कुमार चंदना के लिए आसान नहीं रही है.

मैथ्स में वे अच्छे नहीं थे. 12वीं में भी उनका स्कोर अच्छा नहीं था. लेकिन इसकी भरपाई उन्होंने जिज्ञासा, लगन और मशीनों के प्रति अपने लगाव से की. जून 2018 में चंदना और उनके दोस्त ISRO इंजीनियर नागा भरत डाका ने हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की. डाका IIT बॉम्बे से ग्रेजुएट हैं. स्काईरूट एयरोस्पेस इन दोनों इंजीनियरों की कहानी है, जिनके काम ने भारत की स्पेस जर्नी को नया आयाम दिया है.

ISRO में चंदना को किक मिली

Advertisement

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, पवन कुमार चंदना का जन्म हैदराबाद में हुआ. शुरुआती पढ़ाई लिखाई भी यहीं हुई. शुरुआत से ही उनकी रुचि मशीनों और टेक्नोलॉजी के रहस्यों को समझने में थी. हालांकि मैथ्स से परेशानी होती थी. लेकिन इस सबके दौरान एक शख्स चट्टान की तरह उनके साथ खड़ा रहा. उनके पिता, जिनके सपोर्ट और भरोसे की बदौलत चीजें बदलीं. जिन सब्जेक्ट्स में परेशानी होती थी उनसे ही आगे की राह निकली.

करीब दो दशक पहले पवन चंदना ने पहली ही कोशिश में आईआईटी की परीक्षा पास कर ली. आईआईटी खड़गपुर में उनका एडमिशन हुआ. इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कैंपस प्लेसपेंट के जरिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) में एंट्री मिली. प्राइवेट नौकरियों के मुकाबले ISRO की नौकरी में वेतन कम था. लेकिन यहां चंदना को स्पेस प्रोग्राम का हिस्सा बनने का मौका मिला.

GSLV MK-3 प्रोजेक्ट पर काम किया

ISRO में अपने 6 साल के कार्यकाल के दौरान पवन चंदना ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर तिरुवनंतपुरम में भारत के सबसे ताकतवर लॉन्च व्हीकल GSLV MK-3 प्रोजेक्ट पर काम किया. इसके लिए उनको संस्थान के भीतर इनोवेशन अवार्ड भी मिला. लेकिन अब उनके दिमाग में कुछ और ही पकने लगा था. वे रॉकेट बनाने में प्राइवेट सेक्टर की भूमिका पर विचार करने लगे थे.

तब भारत में एक प्राइवेट स्पेस कंपनी शुरू करना आसान नहीं था. सबसे बड़ी चुनौती फंडिंग की थी. इन्वेस्टर्स एक ऐसे सेक्टर में पैसा लगाने को लेकर शंका से भरे थे, जो अभी अपनी शुरुआती अवस्था में था. लेकिन पवन चंदना ने रिस्क लिया. उन्होंने अपने साथी वैज्ञानिक नागा भरत डाका के साथ हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की नींव रखी. 

शुरुआती दौर में उनके विजन में भरोसा दिखाया फ्लिपकार्ट के को-फाउंडर और आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र बिन्नी बंसल ने. उन्होंने इस स्टार्टअप में 1.5 मिलियन डॉलर (लगभग 14 करोड़ 47 लाख रुपये) इन्वेस्ट किया. कोविड-19 महामारी के दौरान फंडिग की रफ्तार सुस्त हो गई. लेकिन बाद में रिन्यूएबल एनर्जी फर्म ग्रीनको की आर्थिक सहायता से कंपनी आगे बढ़ती रही.

लगातार हासिल की की बड़ी उपलब्धियां

जुलाई 2020 में स्काईरूट भारत की पहली प्राइवेट कंपनी बनी, जिसने सफलतापूर्वक रॉकेट इंजन लॉन्च किया. इस इंजन का नाम नोबेल पुरस्कार विजेता सी.वी. रमन के सम्मान में रमन-1 रखा गया. अगले साल भारतीय सरकार ने स्पेस सेक्टर को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिया. इसके बाद स्काईरूट, ISRO के साथ समझौता (MOU) करने वाली पहली प्राइवेट कंपनी बनी. इसके बाद कंपनी ने 51 मिलियन डॉलर (लगभग 4 अरब 92 करोड़ रुपये) की फंडिंग जुटाई. यह तब भारत के डीप-टेक सेक्टर में सबसे बड़े इन्वेस्ट में से एक था.

विक्रम एस से विक्रम एक तक का सफर

18 नवंबर, 2022 को स्काईरूट ने विक्रम एस रॉकेट की लॉन्चिंग की. यह प्राइवेट सेक्टर में विकसित भारत का पहला सब ऑर्बिटल रॉकेट था. ये लॉन्चिंग न सिर्फ कंपनी बल्कि भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए भी एक अहम मोड़ साबित हुआ.

इसके बाद कंपनी लगातार अपने लॉन्च व्हीकल और टेक्नोलॉजी पर काम करती रही. फिर आई 18 जुलाई 2026 की तारीख. इस दिन स्काईरूट ने भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया. यह टेस्ट अपने पहले ही प्रयास में कामयाब रहा. विक्रम-1 को स्काईरूट एयरोस्पेस ने तैयार किया और इसकी लॉन्चिंग भी खुद ही की. सिर्फ लॉन्चपैड ISRO का था.

ये भी पढ़ें - साइंस-मैथ्स में विराट के मार्क्स देख चौंक जाएंगे, खुद शेयर की मार्कशीट

लॉन्च किया रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी

इस साल 7 मई को स्काईरूट ने पीएम मोदी के हाथों भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का उद्घाटन किया. ISRO से निकले दो वैज्ञानिकों के आइडिया से निकला ये स्टार्टअप अब 1,000 लोगों को रोजगार देने वाला एक संगठन बन चुका है.

पीछे मुड़कर देखें तो ये पूरी जर्नी मैथ्स में 51 मार्क्स लाने के बारे में नहीं है. ये कहानी उसके बाद की जो यात्रा है, उसके बारे में है. एक स्टूडेंट जिसे कभी मैथ्स से डर लगता था, उसने आईआईटी एंट्रेस क्लियर किया. भारत के कुछ सबसे महत्वपूर्ण लॉन्च व्हिकल्स पर काम किया. फिर जमी जमाई नौकरी छोड़ी और एक ऐसी कंपनी बनाई, जिसने भारत के प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री को एक नई दिशा दे दी है. 

वीडियो: तारीख: रॉकेट का इतिहास क्या है? टीपू सुल्तान के रॉकेट अमेरिका कैसे पहुंचे?

Advertisement