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विकलांग सैनिकों को सरकार ने दो भागों में बांटा, इनको तो टैक्स में छूट ही नहीं मिलेगी

पुराने इनकम टैक्स एक्ट के तहत सेना के जवानों को दी जाने वाली डिसेबिलिटी पेंशन पर 1922 से ही इनकम टैक्स नहीं लगता. साल 2001 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज ने एक सर्कुलर जारी कर इस बात की पुष्टि भी की थी. लेकिन 2019 में, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने एक सर्कुलर जारी करके उन लोगों के लिए यह छूट वापस लेने की कोशिश की.

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कई पूर्व सैनिकों ने भी सरकार के फैसले का विरोध किया है (PHOTO-X)

बजट 2026 में सेनाओं को लेकर एक प्रावधान जारी किया गया था जिसपर बवाल विवाद खड़ा हो गया है. नए प्रावधान के तहत सिर्फ उन सैनिकों को इनकम टैक्स में छूट दी जाएगी, जो सर्विस के दौरान या सर्विस की वजह से बढ़ी हुई डिसेबिलिटी (विकलांगता) के कारण सेना से बाहर किए गए हैं. लेकिन उन सैनिकों को टैक्स छूट से बाहर रखा गया है, जो डिसेबिलिटी के साथ ही अपनी पूरी सर्विस कर के रिटायर हुए हैं. इस बात पर विपक्ष से लेकर कुछ पूर्व सैनिकों ने अपना विरोध व्यक्त किया है. पूर्व सैनिकों का कहना है कि इसकी वजह से विकलांग सैनिक भी दो श्रेणी में बंट गए हैं.

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क्या होती है डिसेबिलिटी पेंशन?

डिसेबिलिटी पेंशन एक तरह का वित्तीय फायदा है जो सेनाओं के जवानों को दिया जाता है. ये उन जवानों को ही दिया जाता है जिन्हें सर्विस के दौरान डिसेबिलिटी हुई है, या सर्विस की वजह से उनकी डिसेबिलिटी बढ़ गई है. इस पेंशन में आम तौर पर दो हिस्से होते हैं. एक को सर्विस एलिमेंट कहा जाता है. ये पेंशन, सर्विस कितनी लंबी है इसके आधार पर तय होती है. इसके अलावा मेडिकल बोर्ड द्वारा तय की गई डिसेबिलिटी के परसेंटेज पर भी ये पेंशन तय की जाती है. यानी जितनी अधिक डिसेबिलिटी होती है, मुआवजा उतना ही अधिक होता है. और अब तक इसी पर टैक्स में छूट मिलती थी.

पुराने इनकम टैक्स एक्ट के तहत सेना के जवानों को दी जाने वाली डिसेबिलिटी पेंशन पर 1922 से ही इनकम टैक्स नहीं लगता. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक साल 2001 में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज ने एक सर्कुलर जारी कर इस बात की पुष्टि भी की थी. लेकिन 2019 में, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने एक सर्कुलर जारी करके उन लोगों के लिए यह छूट वापस लेने की कोशिश की जो 'इनवैलिड आउट' नहीं हुए थे. सेना से इनवैलिड आउट का मतलब है कि किसी सैनिक को सेना से बाहर कर दिया जाता है, क्योंकि मेडिकल बोर्ड ने उन्हें शारीरिक, मानसिक बीमारी या किसी चोट की वजह से आगे मिलिट्री सर्विस के लिए हमेशा के लिए अनफिट मान लिया है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में इस ऑर्डर पर रोक लगा दी, यह कहते हुए कि एक लंबे समय से चली आ रही प्रैक्टिस को सिर्फ एक सर्कुलर से खत्म नहीं किया जा सकता.

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क्या है हालिया विवाद?

1 फरवरी 2026 को पेश किए बजट में सरकार ने फाइनेंस बिल 2026 के तहत डिसेबिलिटी पेंशन के प्रावधानों में बदलाव किया. 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले इन प्रावधानों के मुताबिक अब सिर्फ उन्हीं सैनिकों को टैक्स छूट मिलेगी जिन्हें मेडिकल कंडीशन की वजह से बाहर किया गया है. अगर कोई सैनिक डिसेबिलिटी के बावजूद सर्विस को जारी रखता है, और अपने तय समय पर रिटायर होता है, तो उसे टैक्स में छूट नहीं मिलेगी. सरकार के इसी फैसले को लेकर कई पूर्व सैनिकों ने विरोध जताया है.

इस फैसले को लेकर सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है. लेकिन सूत्र कहते हैं कि सरकार अपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (रक्षा बजट का वो हिस्सा जिससे पेंशन दी जाती है) में कटौती करना चाहती है. वहीं कुछ सूत्रों ने यह भी कहा कि यह कदम कुछ लोगों द्वारा टैक्स छूट के कथित गलत इस्तेमाल की वजह से उठाया गया है. लेकिन एक्सप्रेस से बातचीत में कर्नल गौरव शर्मा कहते हैं कि जितने खर्च में कटौती करने की बात हो रही है, उससे पूरे बजट पर इतना भी प्रभाव नहीं पड़ेगा जिसकी उम्मीद की जा रही है.

पूर्व सैनिकों का क्या कहना है?

इस मामले पर इंडियन आर्मी से रिटायर्ड मेजर जनरल राजपाल पूनिया ने लल्लनटॉप से बात की. जनरल पूनिया ने कहा,

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ये संभव हो सकता है कि कुछ लोग इसका गलत इस्तेमाल कर रहे हों. लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है कि अगर टैक्स में छूट का गलत इस्तेमाल हुआ है, तो सभी को सजा देने के बजाय वेरिफिकेशन प्रोसेस को मजबूत किया जाना चाहिए. सरकार अपने सिस्टम को और पुख्ता करे ताकि कोई इसका गलत इस्तेमाल न कर पाए.

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जनरल वीपी मलिक (रिटायर्ड) की एक्स पोस्ट

वहीं पूर्व आर्मी चीफ जनरल वीपी मलिक ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सरकार जल्द से जल्द अपने इस फैसले को रिव्यू करेगी. उन्होंने एक्स पर लिखा,

अगर सैनिक डिसेबल्ड हैं, तो उन्हें मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के बाद ही सर्विस जारी रखने की इजाजत है. ऐसे कुछ सैनिक, जब युवा ऑफिसर के तौर पर डिसेबल्ड हुए, वो मेजर जनरल और लेफ्टिनेंट जनरल के रैंक तक पहुंचे हैं, जिसमें एक वाइस चीफ भी शामिल हैं. यह नया भेदभाव गलत और गैर-जरूरी है.

इसके अलावा भी कई सैनिकों ने सरकार और मंत्रालय को लेटर लिख कर अपने फैसले पर फिर से विचार करने को कहा है. 

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