समंदर की लहरों का तूफान में तब्दील होना तो देखा था. मगर इन दिनों सागर के पानी में बारूद और ड्रोन्स की गूंज भी समाई हुई है. अब तक पूरी दुनिया की निगाहें सिर्फ लाल सागर (Red Sea) और अदन की खाड़ी पर टिकी थीं. जहां यमन के हूती व्रिदोहियों ने कई इंटरनेशनल जहाजों को निशाना बनाया. लेकिन अब सारा खेला ही बदल चुका है. भारत के नजरिये से बात करें तो खतरा हमारे बेहद करीब आ गया है.
ईरान की जंग में क्यों मर रहे हैं इंडियावाले? लाल सागर के बाद अरब सागर बना 'डेंजर जोन'
US-Iran War: ओमान के तट पर हुए हालिया हमले ने क्या अरब सागर को नया 'वार जोन' बना दिया है? समंदर की इस जियो-पॉलिटिकल जंग में 30 फीसदी भारतीय नाविकों की जान दांव पर लगी है. सवाल ये है कि इंडियन नेवी इसका क्या जवाब दे रही है.


ओमान के तट से बेहद करीब अरब सागर (Arabian Sea) में कॉमर्शियल जहाजों पर हाल के दिनों में हुए हमलों ने भारतीय नौसेना समेत पूरी दुनिया की मेरीटाइम सिक्योरिटी एजेंसियों के कान खड़े कर दिये हैं. इस पूरे में का टेंशन देने वाला पहलू ये है कि नया 'डेंजर जोन' भारत की समुद्री सीमा (Indian Coastline) से काफी करीब है.
इससे पहले कि आप ये कहें कि जंग तो अमेरिका- इजरायल और ईरान के बीच चल रही है, तो सान्नू की? मगर यहीं तो हम मात खा जाते हैं. लड़ाई भरे ही किसी भी देश या संगठनों के बीच हो रही हो. पानी के बीच जान की बाजी लगाकर कार्गो शिप ले जाने का काम करने वाले नाविकों में अच्छी खासी तादाद भारतीय नागरिकों की है. ऐसे में जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर अरब सागर में भड़की इस चिंगारी के मायने हमारे देश के लिए क्या हैं?
लाल सागर से अरब सागर तक, कैसे खिसका 'वार जोन'?
दरअसल हुआ ये कि जब से ईरान वाली जंग छिड़ी, तब से जहारों के लिए लाल सागर पार करना खतरनाक हो गया. इस रास्ते से गुजरने वाले कार्गो शिप्स पर बड़ी तादाद में घातक ड्रोन और मिसाइल अटैक हुए. नतीजा ये हुआ कि दुनिया की बड़ी-बड़ी शिपिंग कंपनियों ने भी अपना रास्ता बदल लिया. (वो कहते हैं ना जान है तो जहान है.)
समुद्री व्यापार का जो नया रूट तय हुआ, उसके तहत कार्गो जहाज, स्वेज नहर (Suez Canal) की जगह "केप ऑफ गुड होप" (पूपा अफ्रीका महाद्वीप घूमकर) से गुजरने लगे. ये बात और है कि इसकी वजह से समय भी ज्यादा लग रहा है और खर्चा भी लगभग दोगुना पड़ रहा है. मगर अब तक इसके जहाज सुरक्षित तो आ ही जा रहे थे.
मगर अब इस रास्ते को भी अमन के दुश्मनों की नजर लग गई है. पिछले कुछ दिनों में अरब सागर के रास्ते खाड़ी देशों, भारत और साउथ ईस्ट एशिया की तरफ आने वाले जहाजों को ओमान के तट के पास निशाना बनाया जा रहा है. हमलावर अब अपनी रेंज बढ़ा रहे हैं. डिप्लोमेटिक थिंक टैंक 'इंडिया मैटर्स' के रोहित शर्मा इस मुद्दे को डिटेल से समझाते हुए कहते हैं,
जहाजों को निशाना बनाने वाले अब लंबी दूरी तक मार करने वाले सुसाइड ड्रोन्स (Kamikaze Drones) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के मुहाने तक पहुंच सकते हैं. ओमान का तट भारत के पश्चिमी किनारे (मुंबई और गुजरात) से ज्यादा दूर नहीं है, इसलिए वहां होने वाली हर हलचल का सीधा असर भारत की समुद्री सुरक्षा पर पड़ता है.
भारतीय नाविकों की जान दांव पर क्यों?
पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाले इस मुद्दे की सबसे चिंताजनक बात ये है कि इंटरनेशनल रूट्स पर चलने वाले मर्चेंट शिप्स (Merchant Ships) में करीब 30 फीसदी क्रू मेंबर्स भारतीय होते हैं. दुनियाभर के मर्चेंट नेवी सेक्टर में भारतीय नाविकों की मांग सबसे ज्यादा होती है.
खतरे के बीच काम: तो अगली बार आप किसी कार्गो शिप पर हमले की खबर सुने तो भले ही उस पर झंगा पनामा, लाइबेरिया या मार्शल आईलैंड्स कहीं का भी लगा हो, लेकिन उसके अंदर इंजन रूम से लेकर डेक तक, उस जहाज को संभालने वाले जांबाज नाविकों में अच्छी खासी संख्या भारतीयों की होती है.
बंधक बनने का डर: आंकड़े बताते हैं कि हाल फिलहाल जितने भी कार्गों शिप हाईजैक किए गए. या जिन पर ड्रोन अटैक हुए. उनमें से ज्यादातर पर भारतीय कैप्टन और क्रू मेंबर्स मौजूद थे. यानी समंदर में छिड़ी इस जियो-पॉलिटिकल (भू-राजनीतिक) जंग में अनजाने ही हमारे लोग सबसे आगे की कतार में खड़े हैं.
अरब सागर में एक्शन में इंडिया नेवी
इस बढ़ते खतरे को भांपते हुए भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने मूकदर्शक बने रहने के बजाय 'फ्रंट फुट' पर खेलने का फैसला किया. इंडियन नेवी ने अरब सागर और मध्य पूर्व के समुद्री रास्तों पर अपने कई फ्रंटलाइन गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर्स (जैसे INS कोलकाता, INS कोच्चि, INS चेन्नई) और सर्विलांस एयरक्राफ्ट तैनात कर दिए.
जब भी किसी जहाज से संकट का संदेश (Distress Call) आता है, भारतीय नौसेना के मरीन कमांडोज (MARCOS) और हेलीकॉप्टर्स बिना वक्त गंवाए रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर देते हैं. भारत ने समंदर में दादागिरी करने वालों को साफ संदेश दे दिया है कि उत्तरी अरब सागर को किसी भी कीमत पर अराजकता का अड्डा नहीं बनने दिया जाएगा.
कॉमर्शियल रूट पर मंडराता संकट
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भारत के आगे चुनौतियां?
मॉरल ऑफ द स्टोरी ये है कि समुद्र का ये खेला महज दो देशों की दुश्मनी तक सीमित नहीं रह गया. अब ये सीधे-सीधे दुनियाभर की सप्लाई चेन को तोड़ता है. जहां तक भारत का सवाल है कि ये हमारे व्यापारिक दबदबे के लिए एक खुली चुनौती है. ओमान के तट पर हुआ हमला इस बात का अलार्म है कि अब हमें अपने समुद्री सुरक्षा घेरे को और ज्यादा मजबूत और आधुनिक बनाना होगा.
हालांकि इंडियन नेवी जिस मुस्तैदी से इस तरह की गतिविधियों का जवाब दे रही है, वो तारीफ के काबिल है. मगर समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी है कि इन हमलों के पीछे छिपे असली चेहरों पर दबाव बनाया जाए. साथ ही इन हमलावरों की ड्रोन सप्लाई चेन को इंटरनेशनल प्रेशर के जरिए तोड़ा जाए. वरना समंदर के पानी में ये खौफ कम होने का नाम नहीं लेगा.
अब एक सवाल आपके लिए: अरब सागर में भारतीय नौसेना की इस कोशिश के बारे में आपको क्या लगता है? क्या और अधिक आक्रामक रुख अपनाने की जरूरत है या फिर कुछ और देशों के साथ जॉइंट टास्क फोर्स बनाकर हमलावरों की कमर तोड़नी चाहिए. अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर दीजिएगा.
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