मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने तलाक के एक मामले में पति को बच्चे का DNA टेस्ट कराने की इजाजत दे दी. शख्स की पत्नी यानी बच्चे की मां पर एक्स्ट्रा मैरिटल संबंध बनाने का आरोप है. पति ने शक जताया है कि यह बच्चा उसका नहीं है. इसके बाद कोर्ट ने DNA टेस्ट की अनुमति दे दी.
पत्नी पर बेवफाई का शक, हाई कोर्ट ने पिता को दी बच्चे का DNA टेस्ट कराने की इजाजत
MP High Court Verdict: पत्नी ने निजता के अधिकार के तहत DNA टेस्ट का विरोध किया. पत्नी ने कोर्ट में कहा कि फैमिली कोर्ट ने टेस्ट का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है. लेकिन हाई कोर्ट ने कुछ कारण गिनाते हुए टेस्ट करवाने का आदेश दे दिया


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इससे पहले फैमिली कोर्ट से भी पति को बच्चे का DNA टेस्ट कराने की इजाजत मिल गई थी. पत्नी ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. हाई कोर्ट ने भी फैसला पति के पक्ष में सुनाया.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा,
पत्नी ने किया था विरोधतलाक की याचिका व्यभिचार (Adultery यानी एक्स्ट्रा मैरिटल संबंध) के आधार पर दायर की गई है. यह ऐसा मामला नहीं है, जहां पति बच्चे का पिता जानना चाहता है, या फिर वह बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से बचना चाहता है. या किसी और मकसद से ऐसा कर रहा है.
कोर्ट का कहना है कि पति केवल पत्नी के Adultery के आरोप को साबित करने के लिए बच्चे का DNA टेस्ट कराना चाहता है. हालांकि इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इस मामले पर पत्नी ने निजता के अधिकार के तहत DNA टेस्ट का विरोध किया है. पत्नी ने कोर्ट में कहा कि फैमिली कोर्ट ने टेस्ट का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है. कहा कि इससे बच्चे की गरिमा और निजी स्वायत्तता को ठेस पहुंचेगी.
वहीं पति का कहना था कि जिस समय पत्नी प्रेग्नेंट हुई थी, उस दौरान उसका उससे संबंध ही नहीं बना था. इसलिए उसे संदेह है. साथ ही पति ने आरोप लगाया है कि मेडिकल सबूत भी प्रेग्नेंसी के टाइमलाइन से मेल नहीं खाते. ऐसे में Adultery के आरोपों को साबित करने के लिए DNA टेस्ट कराना जरूरी है. इस मामले पर कोर्ट ने फैसला दिया कि जब शादी से बाहर संबंध बनाने के पर्याप्त सबूत मौजूद हों, तब सच का पता लगाना, निजता से ज्यादा महत्वपूर्ण है.
कोर्ट का कहना है कि जब बच्चे की नाजायज़ता पर कोई जानकारी नहीं मांगी गई है, बल्कि सिर्फ पत्नी के Adultery से संबंधित है, तो उचित मामलों में DNA टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी माना कि इस मामले में तलाक की याचिका में पर्याप्त दलीलें मौजूद हैं. रिपोर्ट के अनुसार यह तलाक की तीसरी याचिका है. इससे पहले की याचिका पत्नी ने यह कहकर खारिज करवा दी थी कि वह आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है.
फिर आपसी सहमति के लिए फिर से आवेदन दायर किया गया, लेकिन इसमें दूसरी सुनवाई में पत्नी पेश नहीं हुई. अब यह तीसरी तलाक की याचिका दायर की गई है, जो साल 2021 से लंबित है. रिपोर्ट के अनुसार पति ने पहली बार 2019 में पत्नी की बेवफाई के आधार पर तलाक की अर्जी दायर की थी. पति ने बताया था कि वह अक्टूबर 2015 में बाहर की ड्यूटी से घर लौटा था. तब उसकी पत्नी ने चार दिन बाद उसे बताया था कि वह प्रेग्नेंट है.
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पति के मुताबिक इसके आठ महीने के अंदर बच्चा पैदा हुआ था. लेकिन उसे मेडिकल सलाह पर पता चला था कि प्रेग्नेंसी का पता चार दिनों के अंदर नहीं चल सकता. यह बात महिला को गर्भ धारण करने से कम से कम 20 से 30 दिन बाद पता चल सकती है. कोर्ट ने पति की दलील मानते हुए तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली.
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