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अब नहीं रुकेगी डिफेंस डील, रक्षा मंत्रालय ने तय की समयसीमा, सेनाओं को और जल्द मिलेंगे हथियार

Defence Deals और Contracts का समय घटाने के लिए Field Evaluation Trial की जगह पर Digitalization और Simulation का इस्तेमाल करना शामिल है.

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सेना को मिलने वाले साजो-सामान में देरी कम होगी (PHOTO-AajTak)

रक्षा मंत्रालय ने ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) से पहले और बाद में वित्त मंत्रालय के साथ हुई बैठकों में रक्षा उत्पादों की खरीद (Defence Procurement) पर बड़ा फैसला लिया है. मंत्रालय ने डील्स की समयसीमा को कम करने, कॉन्ट्रैक्ट्स को तेजी से पूरा करने और निजी विक्रेताओं को जल्द पेमेंट करने जैसे कुछ खास कदम उठाए हैं. रक्षा मंत्रालय द्वारा बताए गए खास उपायों में फील्ड इवैल्यूएशन ट्रायल (Evaluation Trial) की जगह पर डिजिटलीकरण (Digitisation) और सिमुलेशन (Simulation) का इस्तेमाल करना शामिल है. इसमें कई बार कुछ साल या उससे भी ज्यादा का समय लग जाया करता है.

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इंडियन एक्सप्रेस के सूत्रों के मुताबिक खरीद में तेजी लाने के लिए बातचीत को तेज करना, और एंटी-ड्रोन सिस्टम्स और स्मार्ट गोला-बारूद जैसे जरूरी चीजों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्राइवेट सेक्टर को प्रोत्साहित करना शामिल है. अधिकारियों ने बताया कि खरीद की समयसीमा को इस साल के अंत तक बढ़ाने के लिए काम को तेज किया गया है. इसमें घरेलू रक्षा उद्योग, खास तौर पर प्राइवेट प्लेयर्स को बढ़ावा देने और सशस्त्र बलों की तमाम सर्विसेज़ के बीच साझा तौर पर इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की खरीद पर विशेष ध्यान दिया गया है. 

यह आदेश मुख्य रूप से उन खरीदों पर फोकस करेगा जिनमें मंत्रालय द्वारा निजी विक्रेताओं को गोला-बारूद की आपूर्ति बढ़ाने के लिए निर्देश जारी किए गए हैं. इसमें एंटी-ड्रोन सिस्टम्स, स्मार्ट गोला-बारूद के साथ-साथ बख्तरबंद वाहन जैसे उपकरण शामिल हैं. इन्हें लॉइटरिंग म्यूनिशन (जैसे कामिकाज़ी ड्रोन) और गाइडेड मिसाइल्स के साथ इंटीग्रेट किया जा सकता है.

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हालांकि, अधिकारियों ने बताया कि इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट पावर्स के साथ 40,000 करोड़ रुपये तक की खरीद व्यवस्था लागू है. इस पावर के तहत आपातकाल में सेना तुरंत 40 हजार करोड़ तक की डील कर सकती है. उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों की अतिरिक्त मांग अब सिर्फ बजट में अलॉट राशि तक सीमित नहीं होगी. एक अन्य अधिकारी ने कहा

मुझे नहीं लगता कि रक्षा खर्च में बहुत अधिक वृद्धि होनी चाहिए. व्यापार और इमरजेंसी उपायों के लिए पर्याप्त राशि है. भले ही हमें बहुत बड़ी मांग की उम्मीद नहीं है, लेकिन रणनीतिक आवश्यकताओं की मांग सीमित नहीं होगी.

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कुलजमा बात ये है कि ये चर्चा रक्षा सौदों और कॉन्ट्रैक्ट्स के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है. मकसद है कि डिलीवरी शेड्यूल को पूरा किया जा सके. सीएजी (Controller General of Accounts) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष के पहले महीने अप्रैल में अपने कुल बजट आवंटन 6.81 लाख करोड़ रुपये का 9 प्रतिशत या 64 हजार 221 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

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