भारतीय लोकतंत्र के लिए 6 मार्च एक ऐतिहासिक दिन है. इस तारीख को लोकतंत्र की भाषा थोड़ी और समृद्ध हुई. गरिमा और प्रतिनिधित्व बरतने में संसद थोड़ा और उदार हुआ. विविधता के सम्मान में हम एक कदम और आगे बढ़े हैं. डॉ. मेनका गुरुस्वामी के रूप में देश की संसद को ‘Openly LGBTQIA+’ समुदाय की पहली प्रतिनिधि मिली हैं. डॉ. मेनका गुरुस्वामी को तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा के लिए नॉमिनेट किया था. राज्यसभा चुनाव में वो निर्विरोध चुनी गईं. सोमवार, 6 मार्च को उन्होंने राज्यसभा सांसद के तौर पर शपथ ली.
मेनका गुरुस्वामी कौन हैं? LGBTQ+ समुदाय की पहली सांसद बनकर इतिहास रच दिया
मेनका गुरुस्वामी ने 6 मार्च को राज्यसभा सांसद के तौर पर शपथ ली है. इसके साथ ही वो देश की संसद में जाने वाली पहली LGBTQ+ समुदाय की पहली सदस्य बनी हैं. मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं. सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कई बड़े मामलों की पैरवी की है. इसमें धारा 377 को निरस्त कराना शामिल है.


कौन हैं मेनका गुरुस्वामी?
मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट हैं. साल 2017 से 2019 तक वो न्यूयॉर्क के कोलंबिया लॉ स्कूल में बीआर अंबेडकर रिसर्च स्कॉलर और लेक्चरर थीं. सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कई बड़े मामलों की पैरवी की है. इसमें धारा 377 को निरस्त कराना शामिल है. धारा 377 समलैंगिक संबंधों को अपराध करार देता था.
मेनका गुरुस्वामी का जन्म 27 नवंबर 1974 को हुआ. उनके पिता मोहन गुरुस्वामी साल 1998 में तब के वित्तमंत्री और पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा के स्पेशल एडवाइजर के तौर पर काम कर चुके हैं. उनकी मां का नाम मीरा गुरुस्वामी है. मेनका गुरुस्वामी ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वर्ड लॉ स्कूल और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री ली है. मेनका की शुरुआती पढ़ाई हैदराबाद पब्लिक स्कूल में हुई. दिल्ली के सरदार पटेल स्कूल से उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई की.
इसके बाद मेनका ने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु से B.A. LLB की डिग्री ली. उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से BCL और फिर हार्वर्ड लॉ स्कूल से LLM किया. LLB करने के बाद साल 1997 में मेनका बार काउंसिल से जुड़ीं. उन्होंने तत्कालीन अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के साथ काम शुरू किया. वहीं ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड से डिग्री लेने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में भी प्रैक्टिस की.
धारा 377 को खत्म करने की लड़ाई
मेनका गुरुस्वामी की पार्टनर अरुंधति काटजू हैं. वो भी एक वकील हैं. धारा 377 के खिलाफ केस लड़ने वालों में दोनों पार्टनर का नाम शामिल है. साल 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने धारा 377 को निरस्त कर दिया था. फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. इस दौरान मेनका और अरुंधति ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की. साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया. धारा 377 फिर से लागू कर दिया गया लेकिन दोनों ने संवैधानिक पीठ के सामने इस मामले को चुनौती दी. साल 2018 में तब के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से धारा 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया.
इस फैसले की पूरी दुनिया में तारीफ हुई. साल 2019 में टाइम मैग्जीन ने दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में मेनका गुरुस्वामी और अरुंधति काटजू को भी शामिल किया था.

कई चर्चित मुकदमों की कर चुकी हैं पैरवी
मेनका गुरुस्वामी इसके अलावा भी कई बड़े मुकदमों की पैरवी कर चुकी हैं. उन्होंने सलवा जुडूम के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की है. इस कानून को रद्द कराने में उनकी अहम भूमिका रही है. सलवा जुडूम के तहत छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी युवाओ को विशेष पुलिस अधिकारी (SPOs) के तौर पर भर्ती किया जाता था, जिसका मकसद नक्सलियों से लड़ना था. मणिपुर में सेना और सिक्योरिटी फोर्सेज से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 'एमिकस क्यूरी (पीठ का सलाहकार) नियुक्त किया है.
मेनका नौकरशाही से जुड़ा एक केस भी जीत चुकी हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नौकरशाह जनप्रतिनिधियों के मौखिक आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं. उन्हें लिखित आदेश ही मानना चाहिए. उन्होंने ‘राइट टू एजुकेशन’ से जुड़े केस में भी पैरवी की है. इस कानून के तहत प्राइवेट स्कूल में गरीब और वंचित समुदाय के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करने का प्रावधान है. मेनका गुरुस्वामी अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में पूर्व एयर चीफ मार्शल एसपी त्यागी के लिए स्पेशल कोर्ट में पैरवी कर चुकी हैं. उन्होंने त्यागी को जमानत दिलवाई थी.
इसके अलावा मेनका साल 2023 में एक मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पैरवी भी कर चुकी हैं. तमिलनाडु में RSS के रूट मार्च के खिलाफ दायर राज्य सरकार की याचिका के खिलाफ मेनका दिवंगत वकील राम जेठमलानी के साथ RSS का पक्ष रखा था. 9 अगस्त 2024 को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में एक महिला डॉक्टरी का रेप हुआ था और उसकी हत्या कर दी गई थी. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था.
मेनका गुरुस्वामी ने इस मामले में बंगाल सरकार और खास तौर पर पूर्व पुलिस कमिश्नर विनीत गोयल की पैरवी की थी. इसको लेकर विवाद भी हुआ क्योंकि गोयल ने रेप पीड़िता की पहचान सार्वजनिक कर दी थी. जनवरी 2026 में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी I-PAC के कोलकाता स्थित ऑफिस पर ईडी की रेड हुई. तृणमूल कांग्रेस ने कलकत्ता हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दिया. मेनका गुरुस्वामी इस मामले में तृणमूल कांग्रेस का पक्ष रखा.
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