झारखंड हाई कोर्ट ने एक पिता की DNA टेस्ट की मांग को ख़ारिज करते हुए कहा, ‘अब बहुत देर हो चुकी है, तुम्हारा बेटा 24 साल का है.’ पिता को शक है कि उसका बेटा, उसका बायोलॉजिकल बेटा नहीं है. इसी शक के चलते उन्होंने DNA टेस्ट की मांग की थी, जिसे पहले ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया था. अब हाई कोर्ट ने भी यही रुख अपनाया है.
पत्नी पर शक के चलते बेटे के DNA टेस्ट की मांग की, HC ने पति से कहा- अब बहुत देर हो गई
Jharkhand High Court: झारखंड हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है. पिता को शक है कि उसका बेटा उसका बायोलॉजिकल बेटा नहीं है. इसलिए उसने DNA जांच की मांग की, लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी है.


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, शख्स का उसकी पत्नी के साथ डाइवोर्स केस अभी चल रहा है. इसी दौरन उसने DNA टेस्ट की मांग की. कोर्ट ने साफ़ कहा कि अब बच्चा अडल्ट हो गया है. वो अपने फैसले खुद ले सकता है. अगर वो DNA टेस्ट के लिए मना कर रहा है तो अदालत उसे मजबूर नहीं कर सकती. और साथ ही महिला पर भी कोई गलत आरोप नहीं लगाए जा सकते. लेकिन आखिर इस शक का बीज कहां से उपजा?
कहानी 2000 से शुरू हुई थीसाल 2000 में शख्स की शादी हुई थी. जिसके बाद 2001 में वो काम के सिलसिले में सूरत (गुजरात) चला गया. लेकिन जब वो मई 2002 में लौटा तो उसने पाया कि उसकी बीवी प्रेग्नेंट है, वो भी एडवांस स्टेज. इसके बाद उसका माथा ठनका और उसने पंचायत बुला ली. उसका दावा है कि उस पंचायत में उसकी पत्नी और उसके ससुरालवालों ने माना कि महिला का कथित अफेयर चल रहा था.
फिर साल 2008 में शख्स ने तलाक की अर्जी डाल दी. इसके बाद 2010 में उसने अपने बेटे का DNA टेस्ट कराने की मांग की. लेकिन ट्रायल कोर्ट ने उसकी याचिका ख़ारिज कर दी. शख्स ने अपनी पत्नी पर अफेयर का आरोप लगाया था.
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कोर्ट ने क्या कहा?कोर्ट ने कहा कि जिस दौरान महिला प्रेग्नेंट हुई थी उस वक़्त शख्स उससे नहीं मिला, ये बात साबित नहीं हो पाई है. इसलिए महिला पर लगाए गए आरोपों को सही नहीं माना जा सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने साफ़ कहा कि ट्रायल कोर्ट के दौरान बच्चा माइनर था. लेकिन अब वो एक अडल्ट है. उसे DNA टेस्ट के लिए फ़ोर्स नहीं कर सकते.
कोर्ट ने एक और बात पर गौर किया. कोर्ट ने बताया कि बच्चे की मां ने गार्डियन होने का अधिकार खो दिया है. अगर कोर्ट DNA जांच की मंजूरी भी दे, तो इस टेस्ट को सही से कंडक्ट करवाने वाला कोई नहीं है. कोर्ट ये मानता है कि चूंकि बच्चा अडल्ट हो गया है, इसलिए उसे भी केस में एक पार्टी बनाना चाहिए था. केवल शक के चलते बच्चे को वैध या अवैध करार नहीं कहा जा सकता है.
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