The Lallantop

सलाम कंचन बाई, वो महिला जो 20 बच्चों और मौत के बीच ढाल बन कर खड़ी हो गई

कंचन बाई अपने परिवार का एक मात्र सहारा थीं. उनके पति शिवलाल को पैरालिसिस है. लिहाजा वो चल-फिर नहीं सकते. कंचन बाई अपने पीछे एक बेटा और दो बेटियां छोड़ गई हैं. पोस्टमॉर्टम के बाद जब उनका शव रानपुर गांव पहुंचा, तो गांव वाले खामोश खड़े थे. सभी लोग उन्हें सलाम कर रहे थे.

Advertisement
post-main-image
कंचन बाई ने कई बच्चों को बचाया लेकिन वो खुद मधुमक्खियों के हमले की चपेट में आ गईं (PHOTO-X)

मध्य प्रदेश के नीमच से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने हौसले की एक नई मिसाल कायम की है. यहां के आंगनवाड़ी में खाना बनाने वाली कंचन बाई मेघवाल ने अपनी जान देकर करीब 20 बच्चों की जान बचाई. लेकिन बच्चों की जान बचाते-बचाते वो खुद अपनी जान गंवा बैठीं. कंचन बाई बच्चों और मौत के बीच ढाल बन कर खड़ी हो गईं. कंचन बाई जैसे लोगों के लिए ही एक अंग्रेजी कहावत बनी है - Not All Heroes Wear Capes

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
क्या है पूरी कहानी?

मध्य प्रदेश के नीमच में रामपुर नाम का एक गांव है. यहां के मंडावड़ा पंचायत के आंगनवाड़ी केंद्र में कंचन बाई मेघवाल, बच्चों के लिए खाना बनाने का काम करती हैं. काम करने के दौरान एक दिन बच्चे आंगनवाड़ी कैंपस में खेल रहे थे. हमेशा की तरह कंचन बाई अपने काम में व्यस्त थीं. तभी कहीं से मधुमक्खियों के एक झुंड ने बच्चों पर हमला कर दिया.

अपनी जान की परवाह किए बिना, कंचन बाई ने पास पड़े तिरपाल और चटाइयां उठा कर बच्चों को कवर करना शुरू किया. एक-एक करके, उन्होंने बच्चों को उनमें लपेटा, फिर उन्हें अपने शरीर की ढाल बना कर बचाया और उन्हें सेंटर के अंदर ले गईं. लेकिन जब वह मधुमक्खियों और बच्चों के बीच खड़ी थी, तो मधुमक्खियों के झुंड ने उन पर हमला कर दिया. सैकड़ों मधुमक्खियों ने उन्हें डंक मारा. फिर भी, जब तक आखिरी बच्चा सुरक्षित नहीं हो गया, वह पीछे नहीं हटी और बच्चों को बचाती रहीं.

Advertisement

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक जब तक गांववाले मदद के लिए पहुंचे, तब तक मधुमक्खियों के डंक मारने की वजह से कंचन बाई बेहोश हो चुकी थीं. मौके पर मौजूद कांस्टेबल कालूनाथ और पायलट राजेश राठौर तत्काल उन्हें पास के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर ले गए, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें वहां मृत घोषित कर दिया.

खुद की जान देकर भी अमर हो गईं

कंचन बाई एक कुक थीं. वह रोज गांव के बच्चों के लिए मिड-डे मील बनाती थीं. साथ ही वो जय माता दी नाम के स्वयंसेवा समूह की प्रेसिडेंट भी थीं. कंचन बाई अपने परिवार का भी एक मात्र सहारा थीं. उनके पति शिवलाल को पैरालिसिस है. लिहाजा वो चल-फिर नहीं सकते. कंचन बाई अपने पीछे एक बेटा और दो बेटियां छोड़ गई हैं. मंगलवार को पोस्टमॉर्टम के बाद जब उनका शव रानपुर गांव पहुंचा, तो गांव वाले खामोश खड़े थे. सभी लोग उस महिला को सलाम कर रहे थे जिन्होंने बच्चों को बचाने के लिए खुद की जान दे दी. वाकई में उनकी हिम्मत को शब्दों में बयां करना संभव नही है.

लेकिन गांव में मधुमक्खियों को लेकर अभी भी डर का माहौल है. आंगनवाड़ी केंद्र के पास पेड़ पर मधुमक्खियों का एक बड़ा सा छत्ता लटका है. उसी जगह पर गांव का एकमात्र हैंडपंप भी है. लोगों ने दूसरे हमले के डर से वहां से पानी लाना बंद कर दिया है. गांव वालों की मांग है कि छत्ते को तुरंत हटाया जाए और कंचन बाई के परिवार को आर्थिक मदद दी जाए.

Advertisement

वीडियो: सेहत: मधुमक्खी के काटने पर दिखें ये लक्षण तो तुरंत जाएं डॉक्टर के पास

Advertisement