भारत में आज तक कोई जज महाभियोग की कार्रवाई से हटाया नहीं गया है. जस्टिस यशवंत वर्मा भी इसमें ‘अपवाद’ बनने से बच गए. महाभियोग लाए जाने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. सवाल है कि क्या उनसे पहले भी किसी जज को महाभियोग के रास्ते में ऐसे इस्तीफा देकर पद छोड़ना पड़ा है. जवाब ‘हां’ है. जस्टिस यशवंत वर्मा इस मामले में अकेले नहीं हैं. उनसे पहले दो और जजों ने महाभियोग से पहले इस्तीफा दिया है.
जस्टिस यशवंत वर्मा अकेले नहीं हैं, इन 2 जजों ने भी महाभियोग से पहले इस्तीफा दे दिया था
जस्टिस यशवंत वर्मा इस मामले में अकेले नहीं हैं. उनसे पहले दो और जजों ने महाभियोग से पहले इस्तीफा दिया है.


ऐसे जजों में जो पहला नाम आता है, वो कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सौमित्र सेन का है. उन पर धन के दुरूपयोग का आरोप लगा था. एक जांच समिति ने उन्हें दोषी भी करार दिया था. इसी बीच साल 2011 में राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव भी पारित हो गया. लोकसभा में ये प्रस्ताव जाता, इससे पहले ही जस्टिस सौमित्र सेन ने इस्तीफा दे दिया. इस वजह से लोकसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की जरूरत खत्म हो गई. हालांकि, जस्टिस सेन को इस्तीफे के बाद भी रिटायरमेंट वाले लाभ मिलते रहे.
ऐसे ही सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण ने भी महाभियोग से पहले इस्तीफा दे दिया था. वह भ्रष्टाचार और गलत आचरण के आरोपों का सामना कर रहे थे. उनके खिलाफ भूमि पर कब्जा करने और आय से ज्यादा संपत्ति के मामले दर्ज थे. राज्यसभा में जस्टिस दिनाकरण को हटाने की कार्यवाही शुरू ही होने वाली थी, इससे पहले ही उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपना त्यागपत्र भेज दिया. दो पन्नों के अपने इस्तीफे में उन्होंने कहा कि संवैधानिक पद पर होने के बावजूद जजों की जांच समिति ने उन्हें अपने बचाव के मौके से वंचित कर दिया. जस्टिस दिनाकरन ने आरोप लगया था कि वो मीडिया ट्रायल के शिकार बने हैं.
जज जिनके खिलाफ लाया गया महाभियोग
जस्टिस यशवंत वर्मा के अलावा भले ही ये दो ही जज ऐसे हों, जिन्होंने इस्तीफा दिया हो लेकिन जिनके खिलाफ महाभियोग लाया गया था, ऐसे जज और भी हैं. हालांकि, किसी भी मामले में महाभियोग प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया.
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जेबी पारदीवाला उन जजों में से एक हैं, जिनके खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश की गई. साल 2015 की बात है. तब वो गुजरात हाईकोर्ट के जज थे. उन पर आरोप लगे कि उन्होंने आरक्षण के खिलाफ कथित तौर पर विवादित टिप्पणी की है. इसके बाद राज्यसभा के 58 सदस्यों ने जस्टिस पारदीवाला के खिलाफ राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी को एक याचिका दी. महाभियोग प्रस्ताव की संभावना को देखते हुए जस्टिस पारदीवाला ने आरक्षण के खिलाफ अपनी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटवा दिया. ऐसे में उनके खिलाफ महाभियोग के नोटिस पर आगे की कार्रवाई रोक दी गई.
2015 में ही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गांगले के खिलाफ भी राज्यसभा में हटाने का प्रस्ताव लाया गया था लेकिन जांच समिति ने उन्हें यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया. इसके बाद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी.
साल 2017 में राज्यसभा सांसदों ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाईकोर्ट के जस्टिस सीवी नागार्जुन रेड्डी के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखा. उन पर प्रताड़ना और वित्तीय कदाचार के आरोप थे. हालांकि, बाद में तकरीबन 21 सांसदों ने प्रस्ताव से अपना हस्ताक्षर वापस ले लिया. इसके बाद ये कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी.
मार्च 2018 में विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर किए. राज्यसभा के सभापति ने प्रारंभिक चरण में ये प्रस्ताव खारिज कर दिया.
कैसे हटाए जा सकते हैं जज
टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 124(4) कहता है कि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है. यह आदेश तब दिया जाता है जब संसद के दोनों सदन प्रस्ताव पास करें, जिसमें उस सदन के कुल सदस्यों का बहुमत और उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई का समर्थन हो.
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: क्या SIR में सिर्फ मुस्लिम वोटर्स के नाम कटे?



















