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झारखंड के एयर एंबुलेंस क्रैश की वजह कभी पता नहीं चलेगी? विमान में ब्लैक बॉक्स ही नहीं था

Jharkhand Air Ambulance Crash: शुरुआती जांच में पता चला है कि प्लेन में ‘ब्लैक बॉक्स’ मौजूद नहीं था. यह किसी भी विमान हादसे की जांच में सबसे अहम सबूत माना जाता है. क्यों नहीं था ब्लैक बॉक्स?

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झारखंड में हुए एयर एंबुलेंस क्रैश की जांच जारी है. (फोटो: ITG)
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अमित भारद्वाज

झारखंड में हुए एयर एंबुलेंस क्रैश की शुरुआती जांच में पता चला है कि प्लेन में ‘ब्लैक बॉक्स’ ही मौजूद नहीं था. यह किसी भी विमान हादसे की जांच में सबसे अहम सबूत माना जाता है. इस बॉक्स में कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) या फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) होता है, जो पायलट और उसके सहयोगियों के बीच की बातों को और प्लेन के कई सारे डेटा को रिकॉर्ड करता है.

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क्यों नहीं था ब्लैक बॉक्स?

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, हादसे का शिकार हुआ प्लेन ‘रेडबर्ड एयरवेज प्राइवेट लिमिटेड’ का ‘बीचक्राफ्ट C90’ (Beechcraft C90) था. इसे साल 1987 में बनाया गया था और इसका मैक्सिमम टेक-ऑफ वजन 4,583 किलोग्राम था. इसका पहला ‘सर्टिफिकेट ऑफ़ एयरवर्दीनेस’ उसी साल जारी किया गया था. यानी साल 1987 में ही. जबकि CVR और FDR को लेकर नियम बाद में जारी हुए. इसलिए, सर्टिफिकेशन के वक्त प्लेन में CVR या FDR इंस्टॉल करने की कोई जरूरत नहीं थी.

नियमों के मुताबिक, CVR उन प्लेनों के लिए जरूरी है, जिनका टेक-ऑफ वजन 5,700 किलोग्राम से ज्यादा है. चूंकि ‘बीचक्राफ्ट C90का वजन इससे कम है, इसलिए यह CVR के नियमों में नहीं आता. ऐसे ही कुछ नियम FDR को लेकर हैं. नियम कहते हैं कि 1 जनवरी, 1990 को या उसके बाद जारी प्लेनों में FDR होना जरूरी है. लेकिन ‘बीचक्राफ्ट C90’ 1987 में जारी हुआ था. इसलिए यह FDR के नियमों में भी नहीं आता था. इसी वजह से प्लेन में ‘ब्लैक बॉक्स’ नहीं था.

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ब्लैक बॉक्स क्या होता है?

यह स्टील और टाइटेनियम से बनी एक रिकॉर्डिंग डिवाइस है. इसमें कई तरह के सिग्नल, बातचीत और तकनीकी डेटा रिकॉर्ड होते रहते हैं. ब्लैक बॉक्स में दो तरह के रिकॉर्डर होते हैं. फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) और कॉकपिट वॉइस रिकॉर्डर (CVR).

कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) 

यह कॉकपिट में होने वाली, पायलट और उसके सहयोगियों के बीच की बातों को और कॉकपिट की बाकी आवाजों को रिकॉर्ड करता है. यह रेडियो में हो रही उन बातों को भी रिकॉर्ड करता है जो कॉकपिट और एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) के बीच होती हैं. एयर ट्रैफिक कंट्रोल मतलब ग्राउंड का वो स्टाफ जो फ्लाइट को उड़ाने में पायलट की मदद करता है. ये रेडियो के माध्यम से पूरी उड़ान के दौरान पायलट के संपर्क में रहता है.

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फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR)

FDR कई सारे डेटा जैसे विमान की स्पीड, ऊंचाई, प्लेन का वर्टिकल मोशन, उड़ान के ट्रैक को रिकॉर्ड करता है. साथ ही ये इंजन की जानकारी जैसे ईंधन का फ्लो, और थ्रस्ट (धक्का) जैसी जानकारियां भी स्टोर रखता है. इसके अलावा फ्लाइट कंट्रोल, दबाव, ईंधन आदि लगभग 90 प्रकार के आंकड़ों की 24 घंटों से अधिक की रिकॉर्डेड जानकारी भी FDR में ही होती है.

‘ब्लैक बॉक्स’ उपलब्ध न होने की वजह से, एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) को जांच में कई दिक्कतें आ सकती हैं. AAIB को एयर ट्रैफिक कंट्रोल के साथ हुई आखिरी बातचीत और क्रैश साइट से मिले सबूतों पर ही निर्भर रहना होगा.

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क्या हुआ था?

सोमवार, 23 फरवरी को एयर एंबुलेंस रांची से दिल्ली के लिए रवाना हुई थी. शाम करीब 7 बजे प्लेन का एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) से संपर्क टूट गया. यह प्लेन चतरा जिला के सिमरिया थाना इलाके में स्थित जंगल में क्रैश हो गया. बताया गया कि प्लेन में मरीज के अलावा एक डॉक्टर, एक पैरामेडिक, दो अटेंडेंट और एक को-पायलट समेत 7 लोग सवार थे. हादसे में सभी लोगों की मौत हो गई.

वीडियो: झारखंड में हुआ एयर एम्बुलेंस प्लेन क्रैश, मौके पर ही 7 लोगों की मौत, क्या पता चला?

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