बैंक खाते में 55 लाख रुपये का हिसाब नहीं दे पाने पर इनकम टैक्स विभाग ने 17 लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगाया. लेकिन, मुंबई की एक ट्रिब्यूनल ने जुर्माना रद्द कर दिया, क्योंकि कानून की धारा सही नहीं लगाई गई थी. ट्रिब्यूनल ने कहा कि जुर्माना लगाने के लिए कानून की सही धारा का इस्तेमाल करना जरूरी है. अगर किसी खास कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू की गई है, तो जुर्माना किसी और धारा के तहत नहीं लगाया जा सकता.
इनकम टैक्स ने लगाया 17 लाख जुर्माना लेकिन कोर्ट ने कर दिया माफ, क्यों मिली ये राहत?
एक व्यक्ति के बैंक खाते में मिले 55.62 लाख रुपये का हिसाब नहीं मिल पाया था. इनकम टैक्स विभाग ने 17.18 लाख रुपये का जुर्माना लगाया. मुंबई की इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) ने जुर्माना रद्द कर दिया. जानिए पूरा मामला.

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दरअसल, एक व्यक्ति ने असेसमेंट ईयर 2016-17 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल नहीं किया था. बाद में उसकी गैर मौजूदगी में आयकर विभाग ने उसकी संपत्तियों की जांच की. पाया कि उसके बैंक में मौजूद 55.62 लाख रुपये का कोई हिसाब नहीं है. पूछने पर शख्स ने कहा कि जिस बैंक खाते में ये रकम है, वो अकाउंट उसका नहीं है. फिर भी आयकर विभाग ने इस 55 लाख से ज्यादा की रकम को ऐसी कमाई के रूप में दर्ज किया, जिसका सही हिसाब नहीं दिया गया.
आरोप लगा कि टैक्स बचाने के लिए ऐसा किया गया है. इसके बाद विभाग ने टैक्स से जुड़ी कार्रवाई की और जुर्माना लगाया. जुर्माना जितना टैक्स बचाने की कथित तौर पर कोशिश की गई रकम के बराबर थी. टैक्स अधिकारी ने संबंधित कानून की धारा 271(1)(c) के तहत शख्स पर 17 लाख 18 हजार 658 रुपये का जुर्माना लगा दिया. ये धारा तब लगती है, जब किसी व्यक्ति ने अपनी कमाई छिपाई हो या गलत जानकारी देकर टैक्स से बचने की कोशिश की हो.
लेकिन विभाग की कार्रवाई में एक पेच था, जिसे लेकर आरोपी शख्स ITAT पहुंच गया.
उस व्यक्ति ने इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) में अपील दाखिल की. उसने ट्रिब्यूनल को बताया कि टैक्स अधिकारी ने जांच के दौरान कानून के जिन प्रावधानों के तहत कार्रवाई की बात कही थी. जुर्माना उससे एकदम अलग धारा के तहत लगाया गया है.
इस पर ट्रिब्यूनल ने कहा कि टैक्स अफसर ऐसा नहीं कर सकते. अगर जांच के आदेश में अधिकारी ने कुछ खास धाराओं में कार्रवाई शुरू करने की बात कही है, तो बाद में बिना किसी उचित आधार के किसी दूसरी धारा के तहत जुर्माना नहीं लगाया जा सकता.
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मामले में असेसमेंट ऑर्डर में धारा 271AAC और धारा 272A(1)(d) के तहत कार्रवाई शुरू करने का जिक्र था. लेकिन अधिकारी ने जुर्माना धारा 271(1)(c) के तहत लगाया था. लिहाजा,
ट्रिब्यूनल ने इसी गड़बड़ी को ध्यान में रखते हुए जुर्माना लगाने के आदेश को रद्द कर दिया.
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