समंदर की गहराई और वो भी ऐसी कि सूरज की किरणों को भी वहां तक पहुंचने के लिए टॉर्च जलाना पड़े. उन गहराइयों में पानी का दबाव इतना भयंकर की मजबूत लोहे से बनी सबमरीन भी पापड़ की तरह पिचक जाए. समुद्र तल से लगभग 4 से 6 किलोमीटर इस पाताल लोक को वैज्ञानिकों ने नाम दिया है- 'एबिसल प्लेन' (Abyssal Plain).
समंदर के नीचे 'ब्लैक गोल्ड' की जंग: जानिए क्यों हिंद महासागर के खजाने पर टिकी हैं भारत और चीन की नजरें!
India vs China: हिंदी महासागर में चीन के जासूसी जहाजों का नजर आना सिर्फ सैन्य कारणों से नहीं है. बल्कि इसके पीछे समंदर की गहराईयों में मिलने वाला वो रेयर अर्थ मैटेरियल भी है. जिसे वैज्ञानिक Polymetallic Nodules कहते हैं. भारत भी अपने 'डीप ओशन मिशन' के जरिए ड्रैगन को रोकने की पूरी तैयारी कर चुका है.


अब तक ज्यादातर लोग यही सोचते आ रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े खनिज भंडार या तो खाड़ी देशों के पास तेल के कुओं की शक्ल में हैं या फिर अफ्रीका के पास, सोने की खदान की शक्ल में. लेकिन जरा रुकिये बॉस. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि अब दुनिया का अगला सबसे बड़ा कोटोपैक्सी यानी 'खजाना' समंदर की इसी अगाध गहराई में कीचड़ के बीच दबा पड़ा है. और इस खजाने का नाम है- पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स (Polymetallic Nodules).
ये कोई आम पत्थर नहीं है जनाब, ये तो वो 'ब्लैक गोल्ड' हैं जिनके बगैर फ्यूचल की सारी टेक्नॉलजी हड़ताल पर चली जाएंगी. बोले तो पूरी तरह ठप. शायद यही वजह है कि आज हिंद महासागर (Indian Ocean) के इंटरनेशनल वाटर्स में चीन और भारत के बीच एक बेहद खामोश लेकिन खतरनाक अंडरवाटर जंग शुरू हो चुकी है.
हिंद महासागर में आये दिन नजर आने वाले चीन के जासूसी और खोजी जहाजों के पीछे भी यही खजाना है. वहीं भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है. देश का 'डीप ओशन मिशन' (Deep Ocean Mission) इस क्षेत्र को ड्रैगन को खदेड़ने की पूरी कोशिश में जुटा है.
तो आइये हम भी इस टॉपिक की गहराई में उतरते हैं और जानते हैं कि इस पूरी रस्साकसी के पीछे क्या है.
क्या हैं ये 'पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स' और क्यों इनके पीछे दुनिया पागल है?
अगर शक्ल ओ सूरत की बात करं तो'पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स' दिखने में ये बिल्कुल आलू के आकार के काले-भूरे रंग के पत्थर जैसे दिखते हैं. समंदर के तल पर ये ऐसे बिखरे पड़े हैं जैसे किसी ने खेतों में आलू बो दिए हों. लेकिन इनके भीतर जो माल छिपा है, उसे जानकर आपके होश उड़ जाएंगे. इन नोड्यूल्स के अंदर मुख्य रूप से चार बेशकीमती धातुएं पाई जाती हैं:
- कोबाल्ट (Cobalt)
- निकेल (Nickel)
- तांबा (Copper)
- मैंगनीज (Manganese)
अब आप पूछेंगे कि गुरु, इन धातुओं में ऐसा क्या स्पेशल है? तो भाई, आज की तारीख में दुनिया जिस 'ग्रीन एनर्जी' और 'इलेक्ट्रिक व्हीकल' (EV) क्रांति की बात कर रही है, उसकी बुनियाद यही धातुएं हैं. स्मार्टफोन की बैटरी से लेकर ईवी की लिथियम-आयन बैटरी, विंड टर्बाइन, सोलर पैनल और मिलिट्री के एडवांस्ड वेपन्स तक- सब कुछ इन्हीं पर टिका है.
धरती पर और धरती के नीचे इन धातुओं के भंडार तेजी से खत्म हो रहे हैं. जहां कहीं बचे भी हैं (जैसे कांगो में कोबाल्ट), वहां चीन का पहले से ही कब्जा है. ऐसे में पूरी दुनिया की नजरें अब समंदर के नीचे बिखरे इन अरबों टन 'आलुओं' पर टिक गई हैं. जिसके हाथ ये वाला खजाना लग गया, समझो आने वाले 100 सालों तक पूरी दुनिया की इकोनॉमी और चिप इंडस्ट्री पर उसी की हुकूमत होगी.
हिंद महासागर का पूरा खेल: समझिए ये ग्राउंड विजुअल ब्रेकअप
हिंद महासागर के इस पाताल लोक में ताकत और खजाने का पूरा गणित क्या है, उसे इस ग्राफिक्स के जरिए समझने की कोशिश करते हैं,
Note: AI की मदद से तैयार ग्राफिक्स प्लेट
अंतरराष्ट्रीय नियम क्या कहते हैं?
समंदर के कानून के मुताबिक, किसी भी देश के तट से 200 नॉटिकल मील के बाद का समंदर 'इंटरनेशनल वाटर' (High Seas) कहलाता है. यहां कोई भी देश अपनी मर्जी से खुदाई नहीं कर सकता. इसके लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की संस्था इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) से बाकायदा लाइसेंस लेना पड़ता है.
चीन की 'रिसर्च शिप' वाली चालबाजी और भारत की घेराबंदी
हाल ही में इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (ISA) ने गहरे समंदर में माइनिंग के लाइसेंसों और इनवायरमेंट प्रोटेक्शन को लेकर नए सख्त ड्राफ्ट जारी किए हैं. इन नए नियमों के आते ही ग्लोबल डिप्लोमेसी का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है. चीन इस फिराक में है कि नए कड़े नियम पूरी तरह लागू होने से पहले वो हिंद महासागर के ज्यादा से ज्यादा हिस्से पर अपना माइनिंग का झंडा गाड़ दे.
बस यहीं से शुरू होती है ड्रैगन की शातिर चालबाजी. चीन सीधे तौर पर युद्धपोत नहीं भेजता. वो हिंद महासागर में अपने आधुनिक 'साइंटिफिक रिसर्च शिप्स' (जैसे शियांग यांग होंग सीरीज) भेजता है. कहने को तो ये जहाज समंदर के मौसम और लहरों का अध्ययन करने आते हैं, लेकिन इनका असली काम होता है समंदर के तल का डिजिटल नक्शा (Mapping) तैयार करना, नोड्यूल्स की सही लोकेशन ढूंढना और भारतीय नौसेना की पनडुब्बियों के रूट को ट्रैक करना.
चीन की इस चालबाजी को भांपकर भारत की पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences - MoES) ने अपनी कूटनीति के गियर बदल दिए हैं. भारत के पास सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन में पहले से ही 75,000 वर्ग किलोमीटर का विशाल क्षेत्र माइनिंग की खोज के लिए सुरक्षित है. भारत ने साफ कर दिया है कि वो अपने समुद्री पड़ोस में चीन की इस दादागिरी को बर्दाश्त नहीं करेगा.
भारत का 'डीप ओशन मिशन': पाताल में स्वदेशी ताकत
चीन को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए भारत सरकार ने 'डीप ओशन मिशन' (DOM) की शुरुआत की है. यह मिशन सिर्फ समंदर से पत्थर निकालने का प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह भारत की संप्रभुता और तकनीकी महाशक्ति बनने की हुंकार है.
इस मिशन का सबसे बड़ा हथियार है 'मत्स्य 6000' (Matsya 6000). ये भारत की पहली स्वदेशी इंसानों को ले जाने वाली पनडुब्बी (Manned Submersible) है, जिसे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी (NIOT) विकसित कर रहा है.
बात चल ही निकली है बॉस तो जरा इस सबमरीन की पावर भी देख लेते हैं,
1. ये पनडुब्बी तीन लोगों को लेकर समंदर के नीचे 6,000 मीटर (6 किलोमीटर) की गहराई तक जाएगी.
2. इतनी गहराई पर पानी का दबाव जमीन के मुकाबले 600 गुना ज्यादा होता है, जिसे झेलने के लिए इसमें एक खास टाइटेनियम अलॉय का स्फेयर (गोला) बनाया गया है.
3. इसके साथ ही भारत गहरे समंदर से नोड्यूल्स को ऊपर खींचने के लिए 'इंटीग्रेटेड माइनिंग सिस्टम' और अंडरवाटर क्रॉलर पर भी काम कर रहा है.
जब 'मत्स्य 6000' समंदर की छाती चीरकर नीचे उतरेगा, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन) के एलीट क्लब में शामिल हो जाएगा, जिनके पास इतनी गहराई में इंसानों को भेजने की तकनीक है.
क्या खजाने के चक्कर में तबाह हो जाएगा समंदर?
इस पूरी जंग का एक और काला पहलू है, जिसे लेकर वैज्ञानिक और पर्यावरणविद रात-दिन चेतावनी दे रहे हैं. समंदर का वो पाताल लोक जहां ये नोड्यूल्स पड़े हैं, भले ही वहां अंधेरा हो, पर वो पूरी तरह बेजान नहीं है. वहां कई ऐसे दुर्लभ समुद्री जीव, बैक्टीरिया और स्पंज रहते हैं जो पूरी दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते. ये जीव लाखों सालों से बिना किसी इंसानी दखल के वहां पनप रहे हैं.
जब विशालकाय मशीनें समंदर के तल को खुरचेंगी और उन पत्थरों को ऊपर खींचेंगी, तो वहां कीचड़ का एक भयंकर गुबार (Sediment Plume) उठेगा. ये कीचड़ समंदर के पानी में सैकड़ों किलोमीटर तक फैल सकता है, जिससे वहां रहने वाले जीवों का दम घुट जाएगा और कई प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएंगी.
इसीलिए ISA के नए ड्राफ्ट्स में पर्यावरण सुरक्षा को लेकर कड़ी शर्तें जोड़ी जा रही हैं. भारत के डीप ओशन मिशन की गाइडलाइंस में भी यह साफ लिखा है कि हमारा पूरा प्रोजेक्ट 'सस्टेनेबल' होगा, यानी हम खजाना तो निकालेंगे, लेकिन समंदर के इकोसिस्टम को मटियामेट किए बिना. इसके उलट, चीन का ट्रैक रिकॉर्ड देखते हुए दुनिया डरी हुई है कि वो खजाने की हवस में समुद्री पर्यावरण का कबाड़ा कर सकता है.
भविष्य की जंग जमीन पर नहीं, पानी के नीचे है
तो गुरु, कहानी का निचोड़ ये है कि जो देश आने वाले समय में गहरे समंदर की इस माइनिंग टेक्नोलॉजी पर महारत हासिल कर लेगा, ग्लोबल जिओपॉलिटिक्स का रिमोट कंट्रोल उसी के हाथ में होगा. चीन के पास जमीन पर रिफाइनिंग की ताकत जरूर है, लेकिन हिंद महासागर भारत का अपना इलाका है, हमारा बैकयार्ड है.
भारत की 'डीप ओशन मिशन' कूटनीति केवल चीन को रोकने के लिए नहीं है, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के उस सपने को सच करने के लिए है जहां हमें अपनी चिप इंडस्ट्री, सेमीकंडक्टर और ईवी क्रांति के लिए किसी दूसरे देश के आगे हाथ न फैलाना पड़े. समंदर की गहराइयों में छिपी ये जंग आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है, और भारत इसमें पीछे हटने के मूड में बिल्कुल नहीं है.
अब एक सवाल आपके लिए: क्या आपको लगता है कि भारत को पर्यावरण की चिंता छोड़कर चीन से पहले इस पूरे समुद्री खजाने पर कब्जा कर लेना चाहिए, या फिर पर्यावरण की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखिएगा!
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