शादी के बाद ज्यादातर महिलाओं के घर और जगह बदल जाते हैं. लेकिन गुजरात के एक अधिकारी ने इस दस्तूर को योग्य महिला उम्मीदवार को नियुक्ति नहीं देने के कुतर्क की तरह पेश किया. महिला ने अधिकारी के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. अब अदालत ने अधिकारी के फैसले की जमकर आलोचना की है.
अधिकारी ने महिला को नौकरी नहीं दी, कोर्ट में बोला- 'शादी करके चली जाती हैं'
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी अविवाहित महिला को सिर्फ इसलिए नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता कि ‘वह शादी करने के बाद दूसरी जगह चली जाएगी’. कोर्ट ने नियुक्ति करने वाले अधिकारी के इस रवैये को मनमाना और संविधान के खिलाफ बताया. साथ ही ऐसा तर्क देने वालों को पक्षपाती और संविधान के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाला बताया.
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हाई कोर्ट ने कहा कि किसी अविवाहित महिला को सिर्फ इसलिए नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता कि ‘वह शादी करने के बाद दूसरी जगह चली जाएगी’. कोर्ट ने नियुक्ति करने वाले अधिकारी के इस रवैये को मनमाना और संविधान के खिलाफ बताया. साथ ही ऐसा तर्क देने वालों को पक्षपाती और संविधान के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करने वाला बताया.
मामला संगदा हंसाबेन मालाभाई नाम की महिला से जुड़ा है. उन्होंने दाहोद जिले के झालोद में सरकारी कुक की नौकरी के लिए अप्लाई किया था. हंसाबेन का दावा है कि वे इस पद के योग्य थीं, लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई. उनके मुताबिक नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े राजस्व अधिकारी ने दूसरी महिला शिवानी जे बरोत की नियुक्ति कर दी.
बाद में हंसाबेन ने हाई कोर्ट में गजेटेड ऑफिसर के नियुक्ति के फैसले को चुनौती दी. कहा कि संबंधित पद की सही हकदार वो हैं, न कि शिवानी. लेकिन नियुक्ति करने वाले अधिकारी ने उस समय हंसाबेन के अविवाहित होने को ही अपने फैसले का आधार बता डाला.
जस्टिस मौलिक जे शेलट मामले की सुनवाई कर रही थीं. Live Law की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने पाया कि मामले की जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे साबित हो कि शिवानी उस पद के लिए हंसाबेन से अधिक योग्य हैं. फैसला सुनाते हुए जस्टिस मौलिक शेलट ने कहा,
‘यह मामला तत्कालीन अधिकारी की ओर से किए गए खुलेआम पक्षपात को दिखाता है. किसी अविवाहित ग्रामीण लड़की को सिर्फ इसलिए नियुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह भविष्य में शादी के बाद किसी दूसरे गांव में जा सकती है. यह तर्क न केवल मनमाना और बेतुका है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का घोर उल्लंघन भी है.’
कोर्ट में हंसाबेन की पैरवी करने वाले वकील जापन वी दवे ने हंसाबेन के ग्रेजुएशन की मार्कशीट सबमिट की. इसमें उन्हें 68% मिले हैं. जबकि, शिवानी जे बरोत को ग्रेजुएशन में 48.94% अंक मिले. दोनों कैंडिडेट्स के मेरिट में इतना अंतर होने के बावजूद हंसाबेन की जगह बरोत को नियुक्त की गई. दवे ने कोर्ट को यह भी बताया कि शिवानी के एप्लिकेशन में बताए गए नंबर और मार्कशीट के नंबर में काफी अंतर है.
वहीं शिवानी की ओर से वकील पृथ्वीराज जडेजा और सरकार की ओर से सहायक वकील के तौर पर सिद्धार्थ रामी दलील दे रहे थे. रामी ने कोर्ट में हंसाबेन के याचिका के खिलाफ दलील दी,
‘उस समय याचिकाकर्ता की ओर से उनके ग्रेजुएशन की मार्कशीट नहीं सबमिट की गई थी. जिसके कारण अधिकारी ने दूसरे कैंडिडेट को नियुक्त कर दिया था. अगर कोर्ट आदेश दे, तो संबंधित कार्यालय उनकी मार्कशीट की दोबारा जांच कर सकता है.’
शिवानी के वकील पृथ्वीराज जडेजा ने हंसाबेन की मार्कशीट को संदिग्ध बताया. लेकिन जांच के बाद कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जो हंसाबेन को शिवानी के सामने अयोग्य घोषित कर सके. कोर्ट ने ये भी पाया कि हंसाबेन के अलावा कई अन्य उम्मीदवार शिवानी की तुलना में ज्यादा योग्य हैं. इस आधार पर कोर्ट ने शिवानी की नियुक्ति को रद्द कर दिया.
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हालांकि हाई कोर्ट ने हंसाबेन की मार्कशीट की दोबारा जांच करने के आदेश दिए हैं. साथ ही कहा कि अगर मार्कशीट में कोई समस्या नहीं है, तो उन्हें उस पद पर नियुक्त किया जाए. अगर डॉक्युमेंट में कमियां पाई जाती हैं, तो उनके बाद के योग्य उम्मीदवार की नियुक्ति की जाए. यह सारी प्रक्रिया महीने भर के अंदर पूरी की जानी चाहिए.
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