गोवा यानी समंदर की लहरें, सुकून के दो पल और खूबसूरत यादें. लेकिन पिछले कुछ सालों में गोवा की ये पहचान बदलने लगी है. अब गोवा का नाम आते ही दिमाग में रील्स, हुड़दंग और बीच पर दौड़ती महिंद्रा थार की तस्वीरें घूमने लगती हैं. इसी हुड़दंग और दबंगई पर लगाम लगाने के लिए गोवा सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है.
गोवा में रेंट पर नहीं मिलेगी थार! वजह सिर्फ 'रोड रेज' और हुडदंग ही नहीं कुछ और भी है
Goa Bans Rental Thar: गोवा सरकार ने राज्य में पर्यटकों द्वारा रेंटल थार और एसयूवी गाड़ियों से मचाए जा रहे हुड़दंग के बाद नए लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी है. जानिए रील्स बनाने की सनक और सिविक सेंस की कमी ने कैसे गोवा के पर्यावरण और स्थानीय लोगों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है.


‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक सरकार ने राज्य में किराए पर मिलने वाली 'हाई-रिस्क' रेंटल एसयूवी (विशेषकर महिंद्रा थार) के नए लाइसेंस जारी करने पर रोक लगा दी है. ये फैसला अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे स्थानीय लोगों का गुस्सा, पर्यावरण की तबाही और सोशल मीडिया पर 'भौकाल' काटने की वो सनक है जिसने गोवा के सिविक सेंस को घुटनों पर ला दिया है.
जब समंदर की लहरों के बीच डूबने लगी 'थार'
आखिर ऐसा क्या हुआ कि गोवा सरकार को इतना सख्त कदम उठाना पड़ा? इसका जवाब छुपा है सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले उन वीडियोज में, जिन्हें देखकर किसी का भी सिर चकरा जाए. कुछ महीने पहले अंजुना बीच का एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसमें दिल्ली के कुछ टूरिस्ट किराए की थार को सीधे समंदर के पानी के अंदर ले गए. नतीजा ये हुआ कि गाड़ी रेत और पानी के बीच फंस गई. स्थानीय मछुआरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर उस गाड़ी को बाहर निकाला.
'हिंदुस्तान टाइम्स' के मुताबिक ऐसी ही एक और घटना मोरजिम बीच पर हुई, जहां एक रेंटल एसयूवी को ऑलिव रिडले कछुओं के अंडों के घोंसले वाले सेंसिटिव जोन में दौड़ाया गया. स्थानीय लोगों का कहना है कि टूरिस्ट्स को न तो गोवा के पर्यावरण की परवाह है और न ही यहां के कायदे-कानूनों की. मोरजिम की एक ‘बीच-शॉक’ (समंदर किनारे बांस और लकड़ी से बने अस्थाई रेस्त्रां) मालिक मीशा फर्नांडीस बताती हैं,
ये लोग रेंटल गाड़ी लेकर खुद को सड़क का राजा समझने लगते हैं. जब हम इन्हें बीच पर गाड़ी लाने से मना करते हैं, तो ये मारपीट पर उतारू हो जाते हैं. हमारे लिए ये सिर्फ ट्रैफिक का मुद्दा नहीं है, बल्कि हमारी सुरक्षा और रोजी-रोटी का सवाल बन चुका है.
रील वर्सेस रीयल लाइफ: 4000 रुपये में 'भौकाल' काटने की सनक
इस पूरी समस्या की जड़ में है सोशल मीडिया का वो कीड़ा, जो युवाओं को 'रील' बनाने के लिए कुछ भी करने पर मजबूर कर देता है. 'द नवहिंद टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक गोवा में 3,000 से 4,000 रुपये प्रति दिन के किराए पर थार जैसी दमदार एसयूवी आसानी से मिल जाती है. दिल्ली, पंजाब, हरियाणा या मुंबई से आने वाले युवाओं के लिए ये रकम बहुत बड़ी नहीं होती. गाड़ी हाथ में आते ही शुरू होता है 'भौकाल' काटने का खेल.
काउंसलर और लाइफ कोच कोमल चड्ढा के मुताबिक ये एक खास तरह का 'सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स' है. लल्लनटॉप से बात करते हुए कोमल कहती हैं,
जो लोग अपने शहरों में ट्रैफिक और पाबंदियों के बीच दबे रहते हैं, वो गोवा आते ही खुद को पूरी तरह आजाद और कानून से ऊपर समझने लगते हैं. खुली जीप या थार में तेज म्यूजिक बजाना, खिड़कियों से बाहर निकलकर स्टंट करना और स्थानीय लोगों पर रौब गालिब करना एक ट्रेंड बन गया है.
सोशल मीडिया पर लाइक्स और व्यूज पाने की ये भूख गोवा की सड़कों को जानलेवा बना रही है. गोवा ट्रैफिक पुलिस के एक सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
रेंटल गाड़ियों से होने वाले एक्सीडेंट्स का ग्राफ पिछले तीन सालों में दोगुनी रफ्तार से बढ़ा है. इनमें से 80 फीसदी मामलों में ड्राइवर रील बनाने या नशे की हालत में स्टंट करने की कोशिश कर रहे थे.

सिर्फ गोवा नहीं, पहाड़ों से लेकर पैंगोंग त्सो तक यही हाल है
ये एसयूवी कल्चर और गैर-जिम्मेदाराना टूरिज्म (Irresponsible Tourism) सिर्फ गोवा तक सीमित नहीं है. अगर आप उत्तर भारत की तरफ रुख करें, तो लद्दाख की खूबसूरत पैंगोंग त्सो झील के किनारे भी दिल्ली-एनसीआर के नंबर वाली गाड़ियां पानी में स्टंट करती मिल जाएंगी. कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक एसयूवी को पैंगोंग झील के पवित्र और इको-सेंसिटिव पानी में दौड़ाया जा रहा था, और गाड़ी के अंदर बैठे लोग शराब की बोतलें लहरा रहे थे.

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक यही कहानी हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और उत्तराखंड के पहाड़ों की भी है. पहाड़ों के संकरे रास्तों पर भारी-भरकम एसयूवी गाड़ियां लेकर जाना और फिर वहां ट्रैफिक जाम लगाना आम बात हो चुकी है. ये टूरिस्ट ये भूल जाते हैं कि वो जिस जगह पर घूम रहे हैं, वो एक नाजुक इको-सिस्टम है. पहाड़ों में गाड़ियों का बढ़ता दबाव लैंडस्लाइड और प्रदूषण को न्यौता दे रहा है, तो गोवा में ये समंदर के तटीय पर्यावरण (Coastal Ecology) को तबाह कर रहा है. भारत में 'रिस्पॉन्सिबल टूरिज्म' की भारी कमी है, जहां लोग घूमने तो जाते हैं लेकिन उस जगह के प्रति कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं करते.
लोकल इकोनॉमी पर क्या होगा असर?
गोवा सरकार के इस फैसले का एक दूसरा पहलू भी है, जो सीधे तौर पर वहां के बिजनेस से जुड़ा है. गोवा में 'रेंट-ए-कैब' और 'रेंट-ए-बाइक' एक बहुत बड़ा उद्योग है. हजारों स्थानीय परिवार इसी बिजनेस के भरोसे अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं. थार और अन्य एसयूवी गाड़ियों की डिमांड सबसे ज्यादा रहती है, क्योंकि टूरिस्ट इनके लिए मोटा किराया देने को तैयार रहते हैं.
नए लाइसेंस पर रोक लगने से इस बिजनेस से जुड़े स्थानीय लोगों में थोड़ा डर जरूर है. लल्लनटॉप से बात करते हुए नॉर्थ गोवा के एक रेंटल कार ऑपरेटर सुदेश नाइक कहते हैं,
सरकार का फैसला हुड़दंगियों को रोकने के लिए सही है, लेकिन नए लाइसेंस पूरी तरह बंद करने से छोटे ऑपरेटर्स को नुकसान होगा. होना ये चाहिए कि सरकार कड़े नियम बनाए, गाड़ियों में जीपीएस अनिवार्य करे और अगर कोई टूरिस्ट कानून तोड़ता है, तो गाड़ी मालिक के बजाय सीधे उस टूरिस्ट पर भारी जुर्माना और जेल की सजा का प्रावधान हो.
इस पाबंदी से आने वाले दिनों में गोवा में रेंटल गाड़ियों का किराया बढ़ सकता है, जिससे बजट टूरिस्ट्स की जेब पर थोड़ा असर पड़ना तय है.
बदलाव की शुरुआत खुद से करनी होगी
गोवा सरकार का ये कदम एक वेक-अप कॉल है. ये चेतावनी है उन सभी टूरिस्ट्स के लिए जो मनोरंजन और बदतमीजी के बीच का अंतर भूल चुके हैं. कानून और पाबंदियां अपनी जगह हैं, लेकिन जब तक देश के युवाओं में सिविक सेंस और घूमने वाली जगह के प्रति सम्मान की भावना पैदा नहीं होगी, तब तक कोई भी कानून पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकता. गोवा का मजा लीजिए, लेकिन ये याद रखते हुए कि वो किसी का घर भी है.
ये भी पढ़ें: लॉरेंस बिश्नोई बना नया दाऊद? तिहाड़ से टोरंटो तक महा-एक्शन के बाद क्या सुधरेंगे भारत-कनाडा रिश्ते?
वीडियो: गोवा में धारा 39A के खिलाफ सड़कों पर लोग, क्या हरी-भरी ज़मीनों को काटा जाएगा?















