भारत-यूरोपियन यूनियन (EU) के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर वॉशिंगटन की तरफ से पहली प्रतिक्रिया सामने आई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बिजनेस प्रमुख ने कहा है कि इस डील में भारत सबसे ज्यादा फायदे में है. US ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने कहा है कि भारत को डील से यूरोप में ज्यादा मार्केट एक्सेस मिलेगा.
भारत-EU ट्रेड डील पर अमेरिका की पहली प्रतिक्रिया, बताया भारत को ज्यादा फायदा होगा
India-EU trade deal: समझौते से भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को बूस्ट मिलेगा. निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा.


फॉक्स बिजनेस को दिए इंटरव्यू में ग्रीर ने कहा,
"मुझे लगता है कि भारत इस डील में टॉप पर आया है. भारत को यूरोप में ज्यादा मार्केट एक्सेस मिलेगा. ऐसा लगता है कि भारतीय वर्कर्स के लिए कुछ अतिरिक्त इमिग्रेशन राइट्स भी हैं. यूरोपीय कमीशन प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भारतीय वर्कर्स की मोबिलिटी की बात की है. कुल मिलाकर, भारत इसका खूब फायदा उठाएगा क्योंकि उसके पास लो-कॉस्ट लेबर है."
ये डील दो दशकों की लंबी बातचीत के बाद मंगलवार, 27 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में फाइनल हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूरोपीय काउंसिल प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा और यूरोपीय कमीशन प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने हैदराबाद हाउस में इसकी घोषणा की. इसे मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है. इस समझौते से भारत के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को बूस्ट मिलेगा. निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा. साथ ही सिक्योरिटी, डिफेंस और मोबिलिटी पार्टनरशिप पर भी डील हुई है.
ग्रीर ने रणनीतिक नजरिए से समझाया कि ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता दी है और दूसरे देशों से मार्केट एक्सेस के लिए फीस वसूलना शुरू किया है. इससे यूरोप जैसे देशों की ओवरप्रोडक्शन का सामना करना पड़ रहा है और वो भारत जैसे बाजारों की ओर मुड़ रहे हैं. ग्रीर ने कहा,
"EU इतना ट्रेड-डिपेंडेंट है कि उसे अमेरिका के अलावा दूसरे आउटलेट चाहिए. इसलिए EU भारत की ओर बढ़ा है."
उन्होंने EU पर तंज कसा, और कहा कि वो ग्लोबलाइजेशन पर डबल डाउन कर रहा है. जबकि अमेरिका ग्लोबलाइजेशन की समस्याओं को घरेलू स्तर पर ठीक करने की कोशिश में है.
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर पिछले साल अगस्त से 50% टैरिफ लगा रखा है, जिससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो रहा है. खासकर लेबर-इंटेंसिव सेक्टर जैसे टेक्सटाइल, अपैरल इससे प्रभावित हैं. अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी बाजार का अचानक नुकसान स्थायी ग्राहक छिनने का कारण बनेगा और वियतनाम, बांग्लादेश जैसे प्रतियोगी इसका फायदा उठाएंगे. मार्केट डाइवर्सिफिकेशन में 2-3 साल लगते हैं, जिससे जॉब लॉस और निवेश प्रभावित हो सकता है.
वहीं, US ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने EU की आलोचना की. उन्होंने कहा कि EU ने भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर दबाव नहीं डाला. अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत ने रूसी ऑयल इंपोर्ट घटाया, लेकिन यूरोप ने भारत से रिफाइंड प्रोडक्ट्स खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से युद्ध को फंड किया है.
ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से US-EU संबंध भी तनावपूर्ण हैं. पिछले साल अमेरिका ने EU पर टैरिफ 15% तक घटाया था, लेकिन ग्रीनलैंड विवाद के बाद ट्रंप ने इसे 30% तक बढ़ाने की धमकी दी थी. ये बाद में फ्रेमवर्क एग्रीमेंट से टाला गया. टेक रेगुलेशन पर भी दोनों पक्षों में टकराव है.
ये डील ट्रंप की अमेरिका फर्स्ट पॉलिसी के दबाव में हुई मानी जा रही है, जहां भारत और EU दोनों ही वॉशिंगटन के सबसे बड़े एक्सपोर्ट मार्केट होने के कारण वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं. भारत के लिए ये मौका है कि लो-कॉस्ट लेबर और बड़े मार्केट से फायदा उठाकर ग्लोबल ट्रेड में मजबूत स्थिति बनाए.
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